आख़िरी फेरा साढ़े नौ बजे का होता है और उसमें सवारी कम मिलती है। दयाल उसे इसलिए चलाता था कि आख़िरी फेरे का किराया डेढ़ गुना होता है और उसमें बहस कोई नहीं करता। जीप में दस बैठते हैं और उस रात सात थे।
दयाल इस रूट पर नौ साल से चल रहा था। उसे मालूम था कि कौन कहाँ उतरता है। कौन रोज़ का है। कौन नया। यह जानकारी किसी काम की नहीं होती, पर वह अपने आप जमा हो जाती है, और उस रात यही काम आई।
बीच के स्टॉप तक पाँच उतर गए। बचे तीन। दो आदमी और एक लड़की, जो सबसे पीछे बैठी थी। उसका स्टॉप सबसे आख़िरी था।
दोनों आदमी नौवें किलोमीटर पर उतर गए, जहाँ सिर्फ़ एक ढाबा है और उसके आगे कुछ नहीं। दयाल ने पैसे लिए और उन्होंने पूरे रास्ते के दिए, यानी आख़िरी स्टॉप तक के। उसने कहा कि आप तो यहीं उतर रहे हैं। एक ने कहा, रहने दो। छुट्टे नहीं हैं।
यह अपने आप में कोई बात नहीं। लोग छुट्टे के चक्कर में ज़्यादा दे भी देते हैं और कम भी। दयाल ने पैसे जेब में रखे और जीप चला दी।
दो किलोमीटर बाद उसे वह बात याद आई जो उसने सुनी तो थी पर उस वक़्त उस पर ध्यान नहीं दिया था। चढ़ते वक़्त उन दोनों में से एक ने उससे पूछा था कि आख़िरी स्टॉप कौन-सा है और वहाँ बस्ती कितनी दूर है।
आख़िरी स्टॉप पर बस्ती डेढ़ किलोमीटर दूर है और बीच में खेत हैं। रात में वहाँ रोशनी सिर्फ़ एक जगह होती है, जहाँ ट्रांसफ़ॉर्मर लगा है, और वह भी तब जब बिजली हो।
दयाल ने शीशे में पीछे देखा। लड़की खिड़की की तरफ़ मुँह किए थी और उसके हाथ में मोबाइल था, जिसकी रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी। उसकी उम्र बीस-बाईस से ज़्यादा नहीं थी।
उसने हिसाब जोड़ा, और उसे जोड़ने में ज़्यादा देर नहीं लगी। दोनों ने आख़िरी स्टॉप तक का किराया दिया। दोनों ने उसके बारे में पूछा भी था। और दोनों वहाँ उतरे थे जहाँ से एक ही चीज़ आगे जाती है, और वह ढाबे के पीछे खड़ी मोटरसाइकिलें हैं।
उसने कुछ देर यह भी सोचा कि शायद वह ग़लत हो। छुट्टे न होना एक वजह है। दूरी पूछना जुर्म नहीं। और ढाबे के पीछे मोटरसाइकिलें रोज़ खड़ी रहती हैं। हर बात की एक सीधी वजह मौजूद थी। चारों एक साथ हों, तब भी वजह मौजूद रहती है, पर तब आदमी उस पर टिकता नहीं।
उसने रफ़्तार वही रखी, क्योंकि रफ़्तार बदलने से पीछे बैठा आदमी सबसे पहले चौंकता है।
आख़िरी स्टॉप से पहले एक कट आता है, जो क़स्बे की तरफ़ मुड़ता है। दयाल ने वह कट लिया।
लड़की ने तुरंत देखा। उसने कहा कि यह रास्ता नहीं है। दयाल ने कहा कि मालूम है। उसने कहा कि गाड़ी रोको। दयाल ने नहीं रोकी।
अब जो हुआ, वह वही था जो होना था। लड़की ने दरवाज़े का हैंडल पकड़ लिया और दयाल ने पीछे देखे बिना कहा कि मत खोलना, गिर जाओगी। उसने मोबाइल उठाया और नंबर मिलाना शुरू किया, और यह देखकर दयाल को थोड़ी राहत हुई, क्योंकि उसे यही चाहिए था कि वह किसी को फ़ोन कर ले।
उसने ज़ोर से, सामने देखते हुए, बिना रुके वह सब कहा जो उसे कहना था। नौवें किलोमीटर पर दो आदमी उतरे थे। किराया उन्होंने पूरा दिया था। बस्ती की दूरी उन्होंने पूछी थी। वह उसे क़स्बे के बस अड्डे पर उतारेगा, जहाँ रोशनी है और लोग हैं, और वहाँ से वह जिसे चाहे बुला ले।
लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया। फ़ोन उसके कान पर लगा रहा और उसकी आवाज़ काँप रही थी और वह किसी को पता बता रही थी, दयाल ने इस बीच शीशे की तरफ़ नज़र तक नहीं उठाई, क्योंकि इस वक़्त वह सबसे बुरी चीज़ होती।
बस अड्डा साढ़े ग्यारह बजे आया। वहाँ दो दुकानें खुली थीं और चार-पाँच लोग बैठे थे और ऊपर एक पीली बत्ती जल रही थी। दयाल ने जीप ठीक उस बत्ती के नीचे खड़ी की और इंजन बंद कर दिया, और फिर वह ख़ुद उतरकर जीप से दस क़दम दूर जाकर खड़ा हो गया।
लड़की पंद्रह मिनट बाद उतरी।
उसका भाई पौने बारह पर पहुँचा। उसने आते ही दयाल की तरफ़ जिस तरह देखा, उससे साफ़ था कि उसे अब तक आधी बात ही मालूम है। लड़की ने उसे रोका और बाक़ी बात बताई। तीनों वहीं खड़े रहे और किसी ने कुछ ख़ास नहीं कहा।
लड़की का नाम उसने नहीं पूछा। न उस रात, न बाद में। जीप वालों को यह पूछने की आदत नहीं होती और उस वक़्त तो बिल्कुल नहीं।
जाते वक़्त भाई ने पैसे निकाले। दयाल ने गिनकर लिए। दयाल ने आख़िरी स्टॉप तक का किराया लिया, जो पहले ही तय था।
भाई ने कहा कि क़स्बे तक का भी लीजिए, आप इतनी दूर आए हैं। दयाल ने कहा कि वह किराया नहीं बनता, क्योंकि क़स्बे तक आना उसका अपना फ़ैसला था और उसका पैसा वह किसी से क्यों ले।
इसके बाद वह ख़ाली जीप लेकर लौटा। रास्ते में नौवाँ किलोमीटर पड़ा। ढाबा बंद हो चुका था। पीछे खड़ी मोटरसाइकिलें वहाँ नहीं थीं। दयाल ने रफ़्तार कम नहीं की और उसने उस तरफ़ देखा भी नहीं। घर पहुँचकर उसने जीप की चाबी खूँटी पर टाँगी और सो गया।