जंगल के उस हिस्से में सब आंधी का वक़्त जानते थे। दोपहर ढलते ही पत्ते एक तरफ़ मुड़ जाते, चिड़ियाँ नीची डालों पर उतर आतीं, और हिरन पानी छोड़कर झाड़ियों की ओट में चले जाते। आंधी आती, पूरा जंगल हिलता, और चली जाती। उसे यह सब बहुत अच्छा लगता था।
उसी जंगल में एक नन्ही तितली रहती थी। उसका दिन छोटा था और सीधा। सुबह वह पीले फूलों की क्यारी में जाती, दोपहर में नीचे वाली बेल पर सुस्ताती, और शाम को नदी के किनारे तक एक चक्कर लगा आती। आंधी आती तो वह किसी चौड़े पत्ते के नीचे बैठ जाती और उसके गुज़र जाने का इंतज़ार करती। इसमें उसे कुछ भी बुरा नहीं लगता था।
एक दिन आंधी ने उसे देख लिया। वह चक्कर काटती हुई नीचे उतरी और बोली, 'तुम कितनी कमज़ोर हो! देख रही हो, मैं कितनी तेज़ हूँ? मेरी वजह से पूरी दुनिया हिल जाती है। और तुम? तुम बस फूलों के पास तक उड़ सकती हो।'
नई शरारत की शुरुआत
जंगल के बाकी जानवर यह सब सुन रहे थे। खरगोश झाड़ी के पीछे से झाँका और फिर भीतर हो गया। ऊपर वाली डाल पर बैठी गिलहरी ने मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया। सब आंधी से तंग थे, पर कहता कोई कुछ नहीं था। कहने का नतीजा सब जानते थे। अगली बार वह और तेज़ आती।
तितली ने अपने पंख बंद किए और मुस्कुराकर कहा, 'मैं जानती हूँ कि तुम कितनी ताकतवर हो। पर मेरी ताकत कहीं और है। मैं जो कर सकती हूँ, वह तुम नहीं कर सकतीं।'
आंधी ज़ोर से हँसी। पूरे जंगल के पत्ते एक साथ खड़खड़ाए। 'तुम क्या कर सकती हो, नन्ही तितली? तुम सिर्फ़ उड़ सकती हो। मैं तो किसी को भी उड़ा सकती हूँ।'
'मैं तुम्हें दिखाती हूँ,' तितली ने चुपचाप कहा।
उसने उड़ान भरी और सीधे आंधी के रास्ते में आ गई। आंधी ने पूरा ज़ोर लगाया। धूल उठी, टहनियाँ झुकीं, और नीचे की झाड़ियाँ ज़मीन से चिपक गईं। खरगोश ने आँखें बंद कर लीं। गिलहरी डाल से चिपककर नीचे देखती रही। तितली उड़ती रही। जब हवा बाईं ओर से आती, वह दाईं ओर मुड़ जाती। जब हवा नीचे से उठती, वह ऊपर की उस शांत परत में चली जाती जहाँ आंधी पहुँचती ही नहीं थी। एक बार उसका पंख टेढ़ा हुआ और वह गिरते-गिरते बची। पर उसने दिशा नहीं बदली। वह आंधी से लड़ी नहीं। वह उसके साथ-साथ चलती रही।
सबसे अच्छी तरकीब
आंधी ने दोबारा कोशिश की, फिर तीसरी बार। हर बार तितली किसी न किसी दरार से निकल गई। थकी हुई आंधी आख़िर धीमी पड़ गई। जंगल में धूल बैठने लगी।
'देखा?' तितली ने कहा, नीचे उतरते हुए। 'मैंने तुम्हारी ताकत को चुनौती नहीं दी। मैं बस अपनी ताकत से तुम्हारे रास्ते में उड़ती रही।' आंधी कुछ देर कुछ नहीं बोली। उसे यह बात अजीब लगी, और सच भी।
तभी नीचे से एक आवाज़ आई। नदी के किनारे वाले पेड़ पर एक घोंसला आधा लटक गया था। उसमें दो चूज़े थे, इतने छोटे कि उनके पंख भी पूरे नहीं आए थे। वे लगातार चीख रहे थे। आंधी ने वह घोंसला देखा ही नहीं था। तितली फ़ौरन उधर उड़ी और चूज़ों की माँ को बुला लाई, जो नदी के दूसरी तरफ़ दाना ढूँढ़ रही थी। दोनों ने मिलकर घोंसले को डाल की ओट में खिसकाया। आंधी ऊपर रुकी रही, बिना हिले, जब तक काम पूरा नहीं हो गया।
'तुम सही हो, नन्ही तितली,' आंधी ने आख़िर कहा। 'तुम्हें छोटा समझना मेरी ग़लती थी। तुमने वह देखा जो मैंने नहीं देखा।'
तितली मुस्कुराई। 'हर किसी की ताकत अलग होती है, आंधी। तुम बहुत तेज़ हो। मैं छोटी हूँ, इसलिए मुझे हर जगह ध्यान से देखना पड़ता है। हमें बस अपनी ताकत का सही इस्तेमाल करना चाहिए।'
उस शाम जंगल में देर तक बातें होती रहीं। गिलहरी ने कहा कि उसने पहली बार आंधी को रुकते देखा। खरगोश ने कहा कि उसने पहली बार आंधी को सुनते देखा। दोनों को यक़ीन नहीं हो रहा था कि यह सब एक नन्ही तितली की वजह से हुआ। तितली ने कोई जवाब नहीं दिया। वह अपने चौड़े पत्ते के नीचे जाकर बैठ गई, जैसे रोज़ बैठती थी।
आंधी ने वादा किया कि वह अब किसी को कम नहीं समझेगी। इसके बाद जंगल में एक बात बदल गई। आंधी अब भी रोज़ आती, पर आने से पहले ऊपर एक चक्कर लगाती और देख लेती कि नीचे कोई घोंसला तो नहीं लटका। तितली अपनी रोज़ की उड़ान पर निकल जाती, और जब हवा तेज़ होती, वह किसी चौड़े पत्ते के नीचे बैठकर इंतज़ार करती। दोनों को अब एक-दूसरे से कोई शिकायत नहीं थी। और कभी-कभी, वहाँ से गुज़रते हुए, आंधी उस चौड़े पत्ते को ज़रा धीरे से हिला देती थी।