घर सस्ता था। इतना सस्ता कि इक़बाल ने दाम दोबारा पूछा। दलाल ने कंधे उचकाए और कहा कि बरसों से बंद पड़ा है, बस इतनी-सी बात। नसीम को गाँव में किसी ने बाद में बताया कि उस घर में रात बिताने की हिम्मत आज तक किसी ने नहीं की। तब तक कागज़ों पर दस्तख़त हो चुके थे। दोनों को इन बातों पर यक़ीन नहीं था। इक़बाल हँसकर कहता था कि पुराने घरों के साथ पुरानी कहानियाँ मुफ़्त में आती हैं।

पहले महीने में कुछ नहीं हुआ, अगर उन दो-तीन बातों को छोड़ दिया जाए जिन्हें कोई भी छोड़ देता। रसोई का दरवाज़ा अपने आप बंद हो जाता था। पिछले कमरे में शाम को ठंड ज़्यादा लगती थी। नसीम ने दोनों की वजहें ढूँढ़ लीं और वजहें ठीक भी थीं।

घर में जो चीज़ें छूट गई थीं, वे भी उन्हें साथ ही मिलीं। एक अलमारी। एक लोहे का पलंग। पिछले कमरे में एक कुर्सी, जिसकी पीठ टूटी हुई थी। नसीम ने कहा कि इन्हें निकलवा देते हैं और इक़बाल ने कहा कि बाद में देखेंगे। बाद में कभी देखा नहीं गया।

आदमी पहली बार जाड़े की शुरुआत में दिखा। वह गेट के बाहर सड़क पर खड़ा था और घर की तरफ़ देख रहा था। उम्र सत्तर के आसपास, कंबल ओढ़े, और वह वहाँ कितनी देर से खड़ा था इसका पता नहीं चला। इक़बाल ने खिड़की से देखा और सोचा कि कोई माँगने वाला होगा।

वह अगले दिन भी आया। उसी वक़्त। फिर उससे अगले दिन भी। वह गेट को हाथ नहीं लगाता था और आवाज़ नहीं देता था। बस खड़ा रहता। अँधेरा होने पर चला जाता।

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एक शाम इक़बाल बाहर निकला और उसने पूछा कि क्या चाहिए। आदमी ने कहा कि वह इस घर को जानता है। इक़बाल ने पूछा कि पहले यहीं रहते थे क्या। आदमी ने इसका जवाब नहीं दिया। उसने सिर्फ़ इतना कहा कि उसे एक बार अंदर देखना है।

इक़बाल ने उससे नाम पूछा। आदमी ने नाम बता दिया, साफ़-साफ़, और उसमें कुछ भी अजीब नहीं था। इक़बाल उस नाम को याद नहीं रख पाया। यह बात उसे उसी रात परेशान करने लगी, क्योंकि नाम उसने ध्यान से सुना था।

इक़बाल ने मना नहीं किया, पर हाँ भी नहीं कहा। उसने कहा कि किसी दिन आ जाइए। आदमी ने कहा कि वह रोज़ आता है। यह बात सही थी और इक़बाल के पास इसका कोई जवाब नहीं था।

उस रात नसीम ने पूछा कि अगर वह इसी घर का है तो अंदर आने के लिए पूछ क्यों रहा है। दरवाज़ा खटखटा भी सकता था। इक़बाल ने कहा कि शायद शर्म आती हो। नसीम ने कहा कि जो आदमी रोज़ शाम को दो घंटे सड़क पर खड़ा रह सकता है, उसे शर्म नहीं आती। उसे इजाज़त चाहिए।

नसीम को यह अच्छा नहीं लगा। उसने कहा कि जो आदमी दो हफ़्ते से रोज़ आ रहा है और गेट नहीं खोलता, वह अंदर आने के लिए बुलावे का इंतज़ार नहीं कर रहा। वह कुछ और इंतज़ार कर रहा है। इक़बाल ने पूछा कि क्या, और नसीम इसका जवाब नहीं दे पाई।

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उन्होंने गाँव में पूछताछ की। दुकान वाले ने कहा कि उसने ऐसे किसी बूढ़े को नहीं देखा। पड़ोस की औरत ने कहा कि उस तरफ़ शाम को वैसे भी कोई नहीं निकलता। दोनों ने यह भी कहा कि उन्होंने उस घर के बारे में कभी कुछ नहीं सुना, और दोनों ने यह बात एक ही तरह से कही, जैसे पहले से तय हो।

जाड़े की उस शाम को याद करते हुए इक़बाल को बाद में सिर्फ़ एक बात साफ़ याद रही। गेट की कुंडी उसने ख़ुद खोली थी। यह उसे इसलिए याद रहा कि आदमी उसके खुलने का इंतज़ार करता रहा था, जबकि वह कुंडी बाहर से भी खुल जाती है। यह बात मामूली है और इसी वजह से वह उसके दिमाग़ से निकली नहीं।

जिस शाम इक़बाल ने गेट खोला, उसकी कोई ख़ास वजह नहीं थी। जाड़ा तेज़ था और आदमी बाहर खड़ा काँप रहा था। इक़बाल ने उसे अंदर बुलाया और उसने चाय के लिए कहा। नसीम रसोई में थी और उसने बर्तन रखने की आवाज़ से अपनी राय ज़ाहिर कर दी।

आदमी अंदर आया और दरवाज़े पर ही रुक गया। उसने कमरे में चारों तरफ़ देखा, धीरे-धीरे, हर दीवार पर रुकते हुए, उस तरह जैसे कोई बहुत पुरानी जगह में लौटा हो और मिलान कर रहा हो। फिर वह पिछले कमरे की तरफ़ मुड़ गया।

इक़बाल ने कहा कि उधर कुछ नहीं रखा। आदमी ने कहा, मालूम है। फिर वह उधर चला गया।

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इक़बाल उसके पीछे नहीं गया, और इसकी कोई वजह उसे बाद में भी समझ नहीं आई। वह वहीं खड़ा रहा। उस तरफ़ से चलने की आवाज़ आई, कुछ देर तक, फिर कुर्सी खिसकने जैसी एक आवाज़, फिर कुछ नहीं। नसीम रसोई से बाहर आ गई और दोनों नीचे खड़े सुनते रहे।

बीस मिनट बाद इक़बाल उस कमरे में गया। कमरा ख़ाली था। कोई नहीं था। उस कमरे में खिड़की थी ही नहीं, सिर्फ़ ऊपर एक रोशनदान था, इतना छोटा कि उसमें से हाथ भी न निकले। अंदर आने का रास्ता एक ही था, और इक़बाल उसी में खड़ा था। कंबल फ़र्श पर पड़ा था। तह किया हुआ।

उस रात के बाद घर में वे दोनों बातें भी बंद हो गईं जिनकी नसीम ने वजहें ढूँढ़ी थीं। रसोई का दरवाज़ा टिका रहने लगा। पिछले कमरे में ठंड बाक़ी घर जितनी ही रहती। घर, जैसा कि दलाल ने पहले दिन कहा था, बस एक बंद पड़ा हुआ पुराना घर था।

वे उसमें चार महीने और रहे। फिर उन्होंने उसे बेच दिया, और सस्ते में बेचा, क्योंकि सस्ते में ही बिकता था। ख़रीदने वाला जोड़ा दाम सुनकर चुप हो गया और उसने दाम दोबारा पूछा। इक़बाल ने कंधे उचकाए और कहा कि बरसों से बंद पड़ा है, बस इतनी-सी बात।