बुधन के खेत सबसे छोटे थे और उसका काम सबसे पहले ख़त्म हो जाता था। बाकी वक़्त वह दूसरों के खेतों में लगा रहता। कोई बुलाता नहीं था। वह ख़ुद पहुँच जाता, हाथ बँटाता, और शाम को लौट आता। गाँव के कुछ लोग उसकी तारीफ़ करते। कुछ पीठ पीछे हँसते और पूछते कि इससे उसे मिलता क्या है। बुधन ने इस सवाल का जवाब कभी नहीं दिया।

जवाब उसके पास था भी नहीं। बुधन ने कभी यह नहीं सोचा था कि इससे उसे क्या मिलता है। उसके पिता भी यही करते थे और उनके पिता भी, और घर में इस पर कभी बात नहीं हुई थी। जो काम बिना सोचे किया जाता है, उसकी वजह पूछी जाए तो आदमी चुप ही रह जाता है।

मदद का मतलब गाँव में वह नहीं होता जो शहर में होता है। यहाँ इसका मतलब है कि किसी की मेड़ बैठ गई तो दो घंटे मिट्टी डालना, किसी का बैल बीमार हो तो रात में उसके पास बैठना, किसी के यहाँ शादी हो तो तीन दिन पहले से आँगन में रहना। बुधन यही सब करता था और इसका कोई हिसाब उसके पास नहीं था।

चैत में गेहूँ की कटाई सबसे बड़ा काम होता है और उसमें हाथ सबसे कम पड़ते हैं। फ़सल कटकर खेत में पड़ी रहती है और तब तक ख़तरे में रहती है जब तक खलिहान न पहुँच जाए। उन दिनों गाँव में कोई किसी के यहाँ नहीं जाता। हर आदमी अपने खेत में होता है और यह बात किसी को बुरी नहीं लगती।

बुधन उन्हीं दिनों दूसरों के खेत में होता था। अपना खेत सबसे छोटा था, इसलिए उसका अपना काम तीन दिन में निपट जाता। बाक़ी ग्यारह दिन वह किसी न किसी के यहाँ लगा रहता, और इन ग्यारह दिनों की उसे मज़दूरी नहीं मिलती थी।

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फेकू सबसे ज़्यादा हँसता था। वह कहता कि बुधन को खेत में काम नहीं, लोगों में जगह चाहिए। यह बात उसने बुधन के सामने भी कही और बुधन ने सुन ली। फेकू के खेत में भी बुधन दो दिन लगा था, उसी साल।

माँ पिछले दो बरस से चारपाई पर थीं और उन्हें उठाने-बिठाने का काम बुधन ही करता था। कटाई के दिनों में वह दोपहर को एक बार घर आता, उन्हें पानी पिलाता, और वापस चला जाता। उस साल भी यही चल रहा था। उन्होंने उसे कभी किसी काम से नहीं रोका।

उस साल बुधन की फ़सल कटकर खेत में पड़ी थी और बाँधना बाक़ी था। बाँधने में दो दिन लगते। उसी रात माँ चल बसीं।

मौत के बाद तेरह दिन का हिसाब होता है और उसमें घर का आदमी खेत में नहीं जाता। यह नियम कोई नहीं तोड़ता। बुधन ने भी नहीं तोड़ा। वह घर में बैठा रहा और उसे यह मालूम था कि बाहर उसकी कटी हुई फ़सल पड़ी है।

पाँचवें दिन बादल घिरे। छठे दिन कहीं दूर बरसा। सातवें दिन भी घिरे रहे। बुधन आँगन में बैठा रहा और उसने आसमान की तरफ़ नहीं देखा, क्योंकि देखने से कुछ होना नहीं था और न देखने से भी नहीं। उसके यहाँ लोग आते-जाते रहे और किसी ने फ़सल का ज़िक्र नहीं किया, इसलिए कि उन दिनों यह बात करने की नहीं होती।

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तेरह दिन लंबे होते हैं। पहले तीन दिन घर भरा रहता है। फिर लोग कम होते जाते हैं। आख़िर के दिनों में सिर्फ़ घर वाले बचते हैं। इन्हीं दिनों आदमी के पास सोचने का वक़्त सबसे ज़्यादा होता है और करने को सबसे कम। बुधन ने उन दिनों में एक बार भी किसी से यह नहीं कहा कि उसकी फ़सल बाहर पड़ी है।

तेरहवें दिन के बाद वह चौदहवें दिन सुबह खेत गया। रास्ते में उसने अपने आपको यही समझाया कि जो होना था हो चुका, और आदमी को कम में भी गुज़ारा करना आता है।

खेत ख़ाली था।

बुधन खलिहान में बोरियों के पास बैठ गया। उसने एक बोरी खोली और अनाज हाथ में लिया। फिर वापस डाल दिया। दँवरी ठीक हुई थी। भूसा भी सही तरह अलग किया गया था। यह काम जल्दबाज़ी में नहीं हुआ था, इतना उसे देखते ही समझ आ गया।

फ़सल कट चुकी थी, बँध चुकी थी, ढो ली गई थी। खलिहान में उसकी दँवरी भी हो चुकी थी। अनाज बोरियों में भरकर एक तरफ़ रखा था और भूसा अलग ढेर बना हुआ था। किसी ने कुछ लिखकर नहीं छोड़ा और किसी ने बताने की कोशिश भी नहीं की।

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उसने बाद में जोड़-घटाकर देखा तो पता चला कि आदमी तीन थे। इतने काम के लिए तीन बहुत कम होते हैं, इसलिए उन्हें कई दिन लगे होंगे और रात में भी लगना पड़ा होगा। तीनों के अपने खेत भी उन्हीं दिनों कटने थे।

तीनों में एक फेकू था।

बुधन ने उससे इसका ज़िक्र कभी नहीं किया, और फेकू ने भी नहीं। दोनों के बीच जो पहले जैसा था, वैसा ही रहा। फेकू अब भी हँसता है और अब भी वही बात कहता है, कि बुधन को खेत में काम नहीं, लोगों में जगह चाहिए।

गाँव में लोग आज भी वही सवाल पूछते हैं कि इससे उसे मिलता क्या है। बुधन आज भी इसका जवाब नहीं देता। अगले चैत में वह फिर दूसरों के खेतों में लगा हुआ था, और उसमें फेकू का खेत भी था, जहाँ उसने दो दिन काम किया।