सिद्धार्थ को पढ़ने का शौक़ था और उसे लगता था कि सीखना सिर्फ़ किताबों से होता है। जो हाथ लगता, वह पढ़ जाता। फिर भी उसे लगता रहता कि कुछ छूट रहा है। उसके आसपास ऐसे लोग थे जिन्होंने कभी स्कूल नहीं देखा, और जो अपना काम उससे कहीं बेहतर करते थे। यह बात उसे परेशान करती थी, और वह इसका मतलब नहीं निकाल पाता था।

बलौदाबाज़ार ब्लॉक में उसकी पहली तैनाती थी, कृषि विस्तार अधिकारी के तौर पर। काम यह था कि किसानों को बताए कि कब बोना है, क्या बोना है, कितना पानी देना है। किताबें उसके पास थीं और विभाग की पुस्तिका भी, जिसमें हर फ़सल की तारीख़ छपी हुई थी।

उसके कमरे में किताबें दीवार तक थीं और उनमें से ज़्यादातर उसने पढ़ रखी थीं। तैनाती से पहले उसने इस ब्लॉक के बारे में जो कुछ मिल सका, पढ़ लिया था। मिट्टी का प्रकार, औसत बारिश, फ़सल चक्र। पहुँचने के बाद उसे लगा कि वह तैयार होकर आया है, और शुरू के तीन महीने यह बात सही भी लगती रही।

मदद का हाथ

पहले साल उसने प्रदर्शन खेत के लिए ग्यारह किसान चुने। सबको एक ही सलाह दी, वही जो पुस्तिका में लिखी थी। धान की रोपाई पंद्रह जून के बाद, नहर का पानी आते ही। पुस्तिका में नहर के पानी की तारीख़ भी छपी थी। बीस जून।

बुज़ुर्ग किसान का नाम फ़गुआ था और वह अकेला था जिसने मना किया। उसने कहा कि इस माइनर में पानी बीस को नहीं आता। सिद्धार्थ ने पूछा कि कब आता है। फ़गुआ ने कहा कि जब आता है तब आता है, और दस जुलाई से पहले कभी नहीं आया।

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सिद्धार्थ के पास जवाब था। जवाब छपा हुआ था। उसने पुस्तिका खोलकर तारीख़ दिखाई और यह भी बताया कि नहर विभाग का कार्यक्रम हर साल एक ही रहता है। फ़गुआ ने पुस्तिका देखी, फिर सिद्धार्थ को देखा, और अपना खेत प्रदर्शन में नहीं दिया।

बाक़ी दस ने दे दिया। रोपाई अठारह जून को हुई। पानी आठ जुलाई को आया।

बीच के बीस दिन पौधे खड़े रहे, फिर पीले पड़े, फिर लेट गए। रोपाई के बाद खेत में पानी खड़ा चाहिए ही चाहिए। जिनके पास पंप था उन्होंने डीज़ल फूँका। जिनके पास नहीं था, उनकी फ़सल आधी रह गई। दस में से छह के पास नहीं था।

जब हिम्मत ने साथ दिया

अगस्त में वह उन छह किसानों के पास गया जिनके पास पंप नहीं था। उसने सोचा था कि वे नाराज़ होंगे। कोई नाराज़ नहीं हुआ। एक ने चाय पिलाई और कहा कि साहब, अगली बार पूछ लीजिएगा। यह गुस्से से ज़्यादा बुरा था, और उस रात सिद्धार्थ को नींद नहीं आई।

सिद्धार्थ ने रिपोर्ट लिखी और उसमें कम बारिश का ज़िक्र किया, जो सच था और पूरा सच नहीं था। रिपोर्ट ऊपर चली गई और वहाँ से कोई सवाल नहीं आया।

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उस साल के बाद उसने एक काम शुरू किया जो पुस्तिका में नहीं लिखा था। हफ़्ते में दो दिन वह पैदल निकलने लगा, बिना कागज़ के, और खेत पर जो मिलता उससे पूछता। पूछने में उसे शुरू में तकलीफ़ हुई, क्योंकि उससे सवाल की उम्मीद नहीं की जाती थी। अफ़सर बताता है।

उसने एक कॉपी बनाई। उसमें किसानों के नाम नहीं थे, बातें थीं। किस माइनर में पानी कब आता है, कौन सा खेत बारिश के कितने दिन बाद सूखता है, किस टोले का कुआँ मई में जवाब दे देता है। यह सब कहीं छपा हुआ नहीं था। यह सब किसी न किसी को मालूम था।

एक बात उसने कॉपी में बार-बार लिखी और हर बार अलग आदमी से सुनी। पानी कार्यक्रम से नहीं आता, ऊपर वाले गाँव की ज़रूरत से आता है। जो गाँव माइनर के मुँह पर है वह पहले लेता है, और नीचे वाले को तब मिलता है जब ऊपर वाले का काम हो जाए। यह किसी पुस्तिका में लिखने लायक़ बात नहीं मानी जाती।

अगले साल उसने रोपाई की सलाह पुस्तिका से नहीं, कॉपी से दी। जिन गाँवों में पानी देर से आता था, वहाँ उसने नर्सरी लंबी रखवाई और रोपाई जुलाई में करवाई। उस साल प्रदर्शन खेतों की उपज पूरे ब्लॉक में सबसे ज़्यादा रही।

इनाम फ़गुआ को नहीं मिला। सिद्धार्थ ने उसका नाम रिपोर्ट में नहीं लिखा, क्योंकि रिपोर्ट में किसान का नाम लिखने का ख़ाना ही नहीं होता। उसने उससे इतना ही कहा कि उस साल वह ग़लत था। फ़गुआ ने कहा कि उसे मालूम है।

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विभाग की पुस्तिका में आज भी बीस जून छपा है। सिद्धार्थ अब दूसरे ब्लॉक में है और वह कॉपी उसके साथ गई, हालाँकि यहाँ उसका कोई काम नहीं है। यहाँ का पानी अलग है। उसने नई कॉपी शुरू कर दी है और उसका पहला पन्ना अभी ख़ाली है।