टिन का डिब्बा बजाते हुए चलना पड़ता है, वरना भालू चौंक जाता है, और इधर जो भी हुआ है वह भालू के चौंकने से हुआ है। बुधरी यह बात इतनी बार सुन चुकी थी कि अब सुनती नहीं थी। रात के दो बजे थे। वह डिब्बा बजा रही थी।
होली को तीन दिन हो चुके थे और महुआ गिरना शुरू हो गया था। फूल रात में गिरते हैं और भोर तक ज़मीन पर पड़े रहते हैं। उसके बाद उन्हें हिरन खा जाते हैं, या भालू, या दूसरे घर के लोग बीन ले जाते हैं। इसलिए महुआ बीनने का वक़्त अँधेरा है। इसमें कोई चुनाव नहीं है।
उनके पाँच पेड़ थे। तीन घर के पास वाली ढलान पर, और दो सबसे नीचे, साल के झुरमुट के उस पार, नाले के ऊपर वाली मेड़ पर। नीचे वाले दोनों सबसे अच्छे हैं। बड़े पेड़ हैं और ज़्यादा फूल गिराते हैं, और उन्हीं की वजह से जयमती हर चैत में हाट तक तीस-बत्तीस किलो ले जा पाती है।
पंद्रह दिन पहले तीनों ने पाँचों पेड़ों के नीचे की ज़मीन झाड़कर साफ़ की थी, पत्ते हटाए थे, और किनारे पर पत्थर रखे थे ताकि अँधेरे में हद पता चलती रहे। साफ़ ज़मीन पर फूल दिखता नहीं, हाथ में आता है। रात भर हाथ एक ही तरह चलता रहता है।
अँधेरे में तीनों एक-दूसरे को देख नहीं सकते, इसलिए एक-दूसरे को सुनते हैं। जयमती ऊपर वाले पेड़ों पर रहती है और रुक-रुक कर खाँसती रहती है। ऐतवारू, जो ग्यारह का है, झुरमुट में गाना गाता है, बेसुरा और तेज़। बुधरी डिब्बा बजाती है। तीनों आवाज़ें चलती रहें तो सब ठीक है।
तीन बजे तक ऊपर वाले तीन पेड़ निपट गए थे। बोरी में चार किलो हुआ होगा, इससे ज़्यादा नहीं, क्योंकि ऊपर वाले पेड़ छोटे हैं। असली काम नीचे था। नीचे उतरने में बीस मिनट लगते हैं और ढलान पत्थरीली है, इसलिए रात में एड़ी टिकाकर उतरना पड़ता है।
टॉर्च थी, पर उसकी बैटरी कमज़ोर थी और उसे बचाकर रखना था। रोशनी सिर्फ़ तब जलती है जब पैर रखने की जगह न दिखे। बाक़ी वक़्त अँधेरा ही चलता है। बुधरी को यह रास्ता इतना याद था कि वह बिना टॉर्च के उतर सकती थी, और उतरती भी थी।
जयमती ने ऐतवारू को आगे भेज दिया कि वह नीचे वाले पेड़ों के नीचे से टहनियाँ हटा दे, जो दिन में हवा से गिरी होंगी। यह छोटा काम है और उसे यही मिलता है। वह गाता हुआ आगे निकल गया। उसकी आवाज़ ढलान से नीचे उतरती चली गई।
बुधरी अभी झुरमुट में ही थी जब उसे एक और आवाज़ सुनाई दी। वह तेज़ आवाज़ नहीं थी। नीचे, नाले के ऊपर वाली मेड़ के आसपास, कोई चीज़ फूल खा रही थी और खाते हुए मुँह से हवा खींच रही थी। भालू ऐसे ही खाता है, और यह आवाज़ दूर तक जाती है।
उसने डिब्बा बजाना बंद नहीं किया। उसने खड़े होकर सुना। आवाज़ दाहिनी तरफ़ से आ रही थी, यानी नाले वाले दोनों पेड़ों में से बड़े वाले के पास से। ऐतवारू का गाना बाईं तरफ़ से आ रहा था और नीचे की तरफ़ खिसक रहा था। दोनों आवाज़ें एक ही जगह पर मिलने वाली थीं।
ऐतवारू को वह आवाज़ सुनाई नहीं देगी, क्योंकि वह ख़ुद गा रहा है। गाते हुए आदमी को अपनी ही आवाज़ सुनाई देती है। बुधरी चिल्ला सकती थी। पर चिल्लाने से भालू भी चौंकता, और चौंका हुआ भालू आवाज़ की तरफ़ नहीं जाता, वह अपने सामने जो पड़े उस पर पड़ता है। सामने ऐतवारू था।
नाले तक जाने के दो रास्ते हैं। एक वही ढलान वाला, जिस पर ऐतवारू था। दूसरा ऊपर वाली पगडंडी, जो मेड़ के ऊपर से घूमकर जाती है और जिस पर कोई नहीं चलता, क्योंकि उसमें दस मिनट ज़्यादा लगते हैं। वह पगडंडी भालू के पीछे की तरफ़ निकलती है।
बुधरी ने बोरी वहीं छोड़ दी। उसने ऊपर वाली पगडंडी पकड़ी।
चढ़ाई में साँस फूलती है, और चढ़ते हुए डिब्बा बजाना मुश्किल है, क्योंकि हाथ पत्थर पकड़ने के काम आता है। उसने डिब्बा कमर में खोंस लिया और वह हर क़दम पर अपने आप बजता रहा, बेतरतीब। बेतरतीब आवाज़ ज़्यादा दूर तक जाती है, यह उसे उसी रात पता चला।
पगडंडी के सिरे पर, मेड़ के ठीक ऊपर, वह रुकी। नीचे वह आवाज़ अब भी थी। बाईं तरफ़ से गाना अब बहुत क़रीब आ चुका था। बुधरी ने टॉर्च जलाई, कमर से डिब्बा निकाला, और उसे पत्थर पर मारना शुरू किया।
उसने चीख़कर नहीं, लगातार आवाज़ की। डिब्बा, पत्थर, डिब्बा, पत्थर। इससे पहले उसने कभी जान-बूझकर अपने आप को किसी ऐसी चीज़ के सामने खड़ा नहीं किया था। नीचे खाने की आवाज़ रुक गई। उसके बाद चुप्पी रही। यह सबसे लंबा हिस्सा था।
फिर नीचे घास हिली। कोई भारी चीज़ मेड़ से उतरकर नाले के पानी में गई, और पानी की आवाज़ नाले के साथ-साथ दाहिनी तरफ़ दूर होती चली गई। बुधरी ने भालू को देखा नहीं। उसने उसे जाते हुए सुना, और यह देखने से बेहतर था।
ऐतवारू नीचे पहुँच चुका था और अब भी गा रहा था। बुधरी उतरकर उसके पास गई और उसे सब बता दिया। फिर उसने ऊपर की तरफ़ मुँह करके जयमती को बताया, ज़ोर से, क्योंकि जयमती अभी झुरमुट में थी। छिपाने की कोई बात नहीं थी। भालू का होना अनहोनी नहीं है, वह वहीं रहता है।
उस रात उन्होंने नीचे वाले दोनों पेड़ नहीं बीने। भोर होने में जितना वक़्त बचा था उसमें एक ही पेड़ बीना जा सकता था, और तीनों का साथ रहना ज़रूरी था। तो वे साथ रहे और एक ही पेड़ बीना। उस हफ़्ते हाट में सत्रह किलो गया, इक्कीस नहीं।
अगले चैत से उन्होंने पेड़ों का क्रम बदल दिया। अब वे सबसे पहले नीचे वाले दो पेड़ बीनते हैं, डेढ़ बजे, जब भालू अभी नाले के उस पार होता है, और ऊपर वाले तीन आख़िर में, भोर के उजाले में। इसमें चढ़ाई ज़्यादा पड़ती है और थकान भी ज़्यादा होती है। महुआ उतना ही रहता है।
पत्थर पर मारने से डिब्बे की सीवन फट गई थी और उसका तार भी टूट गया था। जयमती ने कहा कि हाट से नया ले लेना। बुधरी नया नहीं लाई। फटा हुआ डिब्बा पहले से ज़्यादा ज़ोर से बजता है, और अब हर रात वही उसकी कमर में खुँसा रहता है।