गाँव के पश्चिमी छोर पर एक पगडंडी थी, जो टूटी हुई थी और कहीं-कहीं गायब हो जाती थी। वह कब्रिस्तान तक जाती थी। झाड़ियाँ इतनी घनी थीं कि दोपहर में भी वहाँ छाँव रहती। बड़े पेड़ों की जड़ें कई कब्रों के ऊपर से निकल चुकी थीं। दिन में भी लोग वहाँ अकेले नहीं जाते थे। रात की तो बात ही अलग थी।

सुरजीत तेईस का था और उसे यह सब बकवास लगता था।

उसका तर्क ठीक था। गाँव के जिन लोगों ने वहाँ कुछ देखा था, उनमें से किसी ने भी दो बार नहीं देखा था, और सबकी कहानी अलग थी।

उसने यह गिना भी था। सात लोग थे जिनके नाम लिए जाते थे। दो अब गाँव में नहीं रहते। तीन की बात सुनने पर साफ़ लगता था कि उन्होंने वह अपने बाप से सुनी थी और अपने साथ जोड़ ली थी। बचे दो, और उन दोनों में से एक ने वह चीज़ शराब वाली रात में देखी थी। यह सुरजीत ने किसी से कहा नहीं, क्योंकि गाँव में ऐसी गिनती अच्छी नहीं मानी जाती।

वह फागुन की एक रात गया। साथ में टॉर्च थी और मोबाइल था, जिसमें उस तरफ़ सिगनल नहीं आता।

📚 यह भी पढ़ें भूतिया झील
भूतिया झील

क़ब्रिस्तान में जो चीज़ पहले महसूस होती है वह डर नहीं है। वह चाल है। वहाँ ज़मीन बराबर नहीं होती और उस पर घास और पत्ते पड़े रहते हैं, इसलिए हर क़दम पर पैर उतना नहीं धँसता जितना दिमाग़ ने सोचा होता है, या उससे ज़्यादा धँस जाता है।

सुरजीत ने आधा घंटा घूमकर वही पाया जो वहाँ है। पुरानी क़ब्रें, जिनके पत्थर टेढ़े हो चुके हैं, और उन पर से निकली हुई जड़ें।

वह लौटने के लिए मुड़ा और उसी वक़्त उसका दाहिना पैर धँस गया।

धँसना धीरे-धीरे नहीं हुआ। पहले घास बैठी, फिर उसके नीचे की मिट्टी गई, और वह छाती तक अंदर था।

जो हुआ वह यही है और इसमें कुछ भी अलौकिक नहीं है। पुरानी क़ब्र के भीतर की जगह ख़ाली रह जाती है। ऊपर की मिट्टी उस ख़ाली जगह पर टिकी रहती है, बरसों तक, और एक दिन किसी का वज़न पड़ने पर बैठ जाती है। यह क़ब्रिस्तानों में होता है और इसीलिए वहाँ ज़मीन कहीं-कहीं नीची दिखती है।

📚 यह भी पढ़ें अंधेरे में घूमती आत्मा
अंधेरे में घूमती आत्मा

टॉर्च ऊपर गिर गई थी और वह जल रही थी।

यही उस रात की सबसे भारी चीज़ थी।

उस रोशनी में उसे यह दिख रहा था कि किनारा कितनी दूर है। एक हाथ। उसका अपना हाथ उस किनारे तक पहुँच रहा था। पहुँचकर वह मिट्टी पकड़ता और मिट्टी उखड़ आती, क्योंकि वह मिट्टी भी उसी ढीली परत की थी।

उसने चिल्लाने की सोची और उसने एक बार आवाज़ भी दी।

फिर उसने दोबारा नहीं दी।

📚 यह भी पढ़ें भूतिया ट्रेन
भूतिया ट्रेन

वजह सोचने लायक़ है। रात में क़ब्रिस्तान की तरफ़ से किसी की चीख़ आए, तो गाँव में उसका एक ही मतलब निकलता है, और वह मतलब यह नहीं होता कि कोई आदमी गड्ढे में गिरा है। जो लोग सुनते, वे और भीतर हो जाते। यह बात सुरजीत को उसी वक़्त समझ आ गई।

उसने अपने आप निकलने का काम शुरू किया और उसमें उसे डेढ़ घंटा लगा।

डेढ़ घंटा वहाँ खड़े रहने का मतलब समझने लायक़ है। फागुन की रात में ठंड होती है और वह छाती तक ज़मीन के भीतर था, जहाँ हवा नहीं चलती और जहाँ मिट्टी शरीर से गरमी खींचती रहती है। उसकी टाँगें आधे घंटे में सुन्न हो गईं और वह उन्हें हिला नहीं पा रहा था, इसलिए उसे यह भी नहीं पता चल रहा था कि नीचे उसके पैर किस चीज़ पर टिके हैं।

तरीक़ा वही था जो ऐसे मौक़ों पर होता है। ऊपर की ढीली मिट्टी को हाथ से गिराना, ताकि किनारा नीचा हो जाए, और गिरी हुई मिट्टी को पैरों के नीचे दबाना, ताकि नीचे की सतह ऊँची हो जाए। दोनों तरफ़ से दूरी कम होती है।

इसी में उसका हाथ किनारे की मिट्टी के भीतर गया।

📚 यह भी पढ़ें भूतिया झील
भूतिया झील

वहाँ मिट्टी नहीं थी। पहले ईंट थी, कच्ची, जो उँगली से भुरभुरा गई। उसके पीछे कुछ था जो न मिट्टी जैसा था और न पत्थर जैसा। उसमें उँगली दबती थी और दबाने पर वापस नहीं आती थी।

सुरजीत ने वहाँ से हाथ हटा लिया और उसके बाद उसने किनारा उस तरफ़ से नहीं खोदा। उसने दूसरी तरफ़ से खोदा, जिसमें ज़्यादा वक़्त लगा।

उसने भीतर देखा नहीं। टॉर्च ऊपर थी और वह उसे नीचे नहीं ला सकता था।

वह डेढ़ बजे बाहर निकला।

बाहर निकलकर उसने टॉर्च उठाई और उस गड्ढे की तरफ़ रोशनी की। गड्ढा वैसा ही था। ऊपर से देखने पर वह सिर्फ़ एक गड्ढा था और उसमें कुछ नहीं दिखता था, क्योंकि ऊपर की गिराई हुई मिट्टी सब ढक चुकी थी।

📚 यह भी पढ़ें अंधेरे में घूमती आत्मा
अंधेरे में घूमती आत्मा

वह घर पहुँचा और किसी को नहीं जगाया।

अगले दिन गाँव ने उसे देखा और समझ गया कि रात में कुछ हुआ है। उसका चेहरा पीला था और वह किसी की आँख में देखकर बात नहीं कर रहा था। पूछने पर उसने कहा कि गिर गया था।

यह सच था और किसी ने इस पर भरोसा नहीं किया।

गाँव ने अपनी वाली कहानी बना ली और वह कहानी अब भी चलती है, और उसमें एक आकृति है और लाल आँखें हैं।

सुरजीत ने उस रात के कपड़े नहीं धोए। वे तीन दिन कोने में पड़े रहे। चौथे दिन उसकी माँ ने उन्हें उठाकर धो दिया।

📚 यह भी पढ़ें भूतिया ट्रेन
भूतिया ट्रेन

मिट्टी पहली ही धुलाई में निकल गई। पूरी की पूरी। वह मामूली मिट्टी थी और उसमें और कुछ नहीं था।