रघु के गायब होने के बाद उस घर का दरवाज़ा किसी ने नहीं खोला। तीस साल हो गए। छत बैठ गई, आँगन में घास उग आई, पर दरवाज़ा वैसा का वैसा रहा। गाँव वाले उसे नाम से नहीं पुकारते थे; बस 'वो घर' कहते और बात बदल देते। जो लोग रात को उधर से गुज़रे थे, उनकी बातों में एक चीज़ समान थी। भीतर कोई चल रहा था। धीरे-धीरे, बिना रुके, एक कोने से दूसरे कोने तक।

बिसुनी उस वक़्त पाँच साल की थी और उसे अपने बाप की सिर्फ़ दो बातें याद हैं। एक, कि वे चलते बहुत थे। दूसरी, कि उनके जूते आँगन में उल्टे पड़े मिले थे, दोनों एक साथ, जैसे उतारकर रखे गए हों। इसके आगे उसकी माँ ने कभी कुछ नहीं बताया और बिसुनी ने कुछ पूछा भी नहीं।

माँ उसे लेकर मायके चली गई थीं और फिर लौटीं नहीं। बिसुनी की शादी दूसरे ज़िले में हुई और उस गाँव से उसका नाता उतना ही रह गया जितना काग़ज़ों में लिखा था। ज़मीन उसके नाम थी। घर भी उसी के नाम था। दोनों को उसने कभी देखा नहीं था।

तीस साल बाद सड़क चौड़ी होनी थी और उसी लाइन में वह घर आ रहा था। मुआवज़े के लिए मौक़े पर मालिक का होना ज़रूरी था, नाप के वक़्त, और नाप अंदर से भी होनी थी। बिसुनी को इसीलिए जाना पड़ा। वह अकेली नहीं गई, पर जो उसके साथ गए वे बाहर ही रुक गए।

गाँव पहुँचकर उसे यह भी पता चला कि घर के बारे में लोग आज भी बात नहीं करते। पटवारी के साथ जो चार-पाँच लोग आए थे, वे रास्ते भर बोलते रहे और घर के सामने पहुँचते ही चुप हो गए। अंदर मत जाओ, यह किसी ने नहीं कहा। साथ भी कोई नहीं आया।

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दरवाज़ा तीस साल में एक बार भी नहीं खुला था, इसलिए सबको लगा था कि वह अटका होगा। वह अटका नहीं। कुंडी उठी और वह अंदर की तरफ़ खुल गया, आसानी से, बिना आवाज़ किए। पटवारी ने कहा कि लकड़ी अच्छी रही होगी।

अंदर की हवा में सीलन नहीं थी और यह अजीब बात थी। तीस साल बंद रहे कमरे में सीलन होती है, बदबू होती है, चमगादड़ होते हैं। यहाँ कुछ नहीं था। दीवारें सूखी थीं और हवा में सिर्फ़ पुरानी मिट्टी की गंध थी, वैसी ही जैसी किसी भी खाली कमरे में होती है।

अंदर उतना अँधेरा नहीं था जितना बाहर से लगता है, क्योंकि छत का एक हिस्सा गिर चुका था और वहीं से रोशनी आती थी। कमरा एक ही बड़ा था, ईंट का फ़र्श, और तीन तरफ़ दीवारें। घास सिर्फ़ आँगन में थी। अंदर घास नहीं थी।

नाप लेते हुए पटवारी ने फ़ीता ज़मीन पर रखा और तभी बिसुनी की नज़र फ़र्श पर पड़ी।

एक कोने से दूसरे कोने तक, तिरछे, ईंटें घिसी हुई थीं। बीच में से, दोनों किनारों पर नहीं। पट्टी इतनी चौड़ी थी जितनी एक आदमी के पैर की, और उसमें ईंटें बाक़ी फ़र्श से नीची पड़ चुकी थीं। कहीं-कहीं तो जोड़ का चूना भी घिस गया था।

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ईंट पत्थर नहीं होती, पर वह घिसती धीरे-धीरे ही है। बिसुनी ने पटवारी से पूछा कि इतना घिसने में कितना लगेगा। पटवारी ने पहले मज़ाक़ में कुछ कहा। फिर वह झुककर देखने लगा। फिर वह सीधा खड़ा हो गया और उसने बात बदल दी।

नाप के लिए उस लाइन पर चलना ज़रूरी था। फ़ीता एक कोने से दूसरे कोने तक जाता था और वही सबसे लंबी नाप थी। पटवारी ने बिसुनी से कहा कि वह उधर वाला सिरा पकड़ ले।

वह उस पट्टी पर चली। घिसी हुई ईंटें पैर के नीचे थोड़ी नीची थीं और चलते हुए यह महसूस होता था, हर क़दम पर, जैसे कोई हल्का-सा गड्ढा हो जो पैर को अपनी जगह पर बिठा देता हो। बीस क़दम में वह दूसरे कोने पर थी। बीस क़दम। यह उसने गिने नहीं थे, ये अपने आप गिन गए।

उस कोने में दीवार पर, कमर की ऊँचाई पर, चूना काला पड़ा हुआ था। एक जगह, हथेली भर। वैसे ही जैसे किसी जगह पर बार-बार हाथ रखा जाए, मुड़ने से पहले, टिकने के लिए।

बाहर आकर उसने पटवारी से यह नहीं पूछा कि उसने भी वह देखा या नहीं। पटवारी ने भी नहीं बताया। काग़ज़ पर नाप वही लिखी गई जो फ़ीते से निकली थी, और उसके नीचे दोनों के दस्तख़त हो गए। इसके बाद वह आदमी जल्दी में लगने लगा और उसने वहाँ और रुकना नहीं चाहा।

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लौटते वक़्त गाड़ी में बिसुनी को वे दो बातें फिर याद आईं जो उसे अपने बाप के बारे में याद थीं। कि वे चलते बहुत थे। और कि जूते आँगन में उतारकर रखे मिले थे, दोनों साथ-साथ, सीधे। जूते उतारकर आदमी घर के अंदर जाता है।

बिसुनी ने वहाँ हाथ नहीं रखा। वह उल्टे पाँव लौटी, उसी पट्टी पर, और बाहर आ गई। पटवारी ने पूछा कि क्या हुआ, तबीयत ठीक है क्या। उसने कहा कि ठीक है और उसने काग़ज़ बाहर बैठकर भरे।

मकान दो हफ़्ते बाद गिरा। जेसीबी को आधा दिन लगा। गिराने वाले ठेकेदार ने बिसुनी को फ़ोन करके पूछा कि पुरानी ईंटें बचाकर रखनी हैं क्या, कई लोग रख लेते हैं, दोबारा काम आ जाती हैं।

उसने पूछा कि फ़र्श वाली भी। ठेकेदार ने कहा कि फ़र्श वाली में से बीच की एक लाइन ख़राब है, घिसी हुई, वे किसी काम की नहीं। बिसुनी ने कहा कि कोई भी मत रखो।

फ़र्श तोड़ते वक़्त नीचे कुछ नहीं निकला। न हड्डी, न कपड़ा, न कोई डिब्बा, कुछ भी नहीं। ठेकेदार ने यह बात इसलिए बताई क्योंकि गाँव में लोग पूछ रहे थे और उसे लगा कि मालिक को मालूम होना चाहिए। नीचे बस भरी हुई मिट्टी थी, वैसी ही जैसी हर पुराने फ़र्श के नीचे होती है।

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सड़क अगले बरस बन गई और अब वहाँ से रात-दिन गाड़ियाँ गुज़रती हैं। उस हिस्से की कोई बात आज तक नहीं चली, न ड्राइवरों में, न गाँव में। तीस साल में उस घर से कोई चीज़ बाहर नहीं आई थी, और आख़िर में भी कुछ नहीं निकला।