किशन के गाँव से सबसे ऊँची चोटी साफ़ दिखती थी। सर्दियों में वह सफ़ेद रहती, और गर्मियों में भी सफ़ेद रहती। गाँव में एक बात चलती थी कि उन बर्फ़ों के बीच कहीं एक ख़ज़ाना है। जो लोग उसे ढूँढ़ने गए, उनमें से आधे रास्ता भटक गए और आधे ठंड से हारकर लौट आए। किशन रोज़ सुबह उठकर उस चोटी को देखता था। उसे ख़ज़ाने में उतनी दिलचस्पी नहीं थी जितनी इस बात में कि इतनी ऊँचाई से नीचे कैसा दिखता होगा।
ख़ज़ाने की बात के पीछे एक चीज़ थी और वह मामूली नहीं थी। गाँव के बूढ़े बताते थे कि उनके बाप-दादा को ऊपर, पेड़ ख़त्म होने के बाद वाली ढलान पर, तराशी हुई लकड़ी मिली थी। लोहे की कीलों वाली लकड़ी। इतनी ऊँचाई पर लकड़ी अपने आप नहीं जाती। किसी को ले जानी पड़ती है, और जो इतना सामान ऊपर ले गया वह ख़ाली हाथ नहीं गया होगा।
यह तर्क सही था। नतीजा ग़लत था। पर तर्क सही था और यही उसे इतने बरस ज़िंदा रखे रहा।
किशन के पास चढ़ने का कोई तरीक़ा नहीं था। पहाड़ पर अकेला आदमी नहीं चढ़ता। उसे रास्ता चाहिए, बीच में रुकने की जगह चाहिए, और सबसे ज़्यादा उसे खाने-पीने का बोझ ढोने वाला चाहिए, जो ख़ुद वही होता है।
जिस तरह से गाँव के लड़के ऊपर जाते थे, वह एक ही था। बोझ ढोना।
हर बरस जून में एक सर्वे वाली टोली आती थी और उसे कुली चाहिए होते थे। मिट्टी के तेल के टिन, तंबू, खाने का सामान, और एक भारी पीतल का यंत्र जिसे तीन आदमी बारी-बारी उठाते थे। मज़दूरी फेरे के हिसाब से मिलती थी।
किशन सोलह का था जब पहली बार लगा।
पहले फेरे में उसे कुछ नहीं दिखा। पूरे मौसम में कुछ नहीं दिखा। आदमी बोझ लेकर चलता है तो उसकी आँखें अपने अगले क़दम पर रहती हैं और कहीं नहीं। ऊपर देखने के लिए रुकना पड़ता है, और रुकने से क़तार टूटती है।
तीसरे बरस तक उसकी चाल बन गई थी और तब उसने ऊपर देखना शुरू किया।
वह जिस चीज़ के लिए गया था, वह उसे चौथे बरस मिली। जुलाई की एक सुबह, बादल नीचे रह गए थे और वे उनके ऊपर थे।
वहाँ से जो दिखा उसे बताने में उसे बरसों लगे।
नीचे तीन घाटियाँ थीं। उसका गाँव उनमें से एक में था और वह इतना छोटा था कि उसे पहचानने में किशन को कुछ समय लगा। छतों की गिनती चालीस के आसपास थी। जिस चोटी को वह बचपन से सबसे ऊँची समझता था, वह उस दिन उसके सामने नहीं, उसके बराबर में थी, और उसके पीछे दो और थीं जो उससे ऊँची थीं और जो गाँव से कभी नहीं दिखतीं।
ख़ज़ाना भी उसी बरस मिला।
सर्वे वाले जिस जगह अपना यंत्र लगाते थे, वह एक पुरानी जगह थी। पत्थरों का एक ढेर, जिसके बीच में एक चौकोर पीतल की तख़्ती ज़मीन में गड़ी थी, जिस पर अंक खुदे थे और एक सन। सन उसके दादा के जन्म से भी पहले का था।
ढेर के पीछे वह पड़ा था जिसकी बात गाँव में सौ बरस से चल रही थी। लकड़ी के टुकड़े, लोहे की कीलों वाले, आधे गले हुए। तंबू गाड़ने वाले खूँटे। दो टूटे टिन। और एक ज़ंग खाया लोहे का छल्ला जिसमें रस्सी बाँधी जाती है।
गाँव की कहानी में इन्हीं छल्लों को चाभी कहा जाता था।
किशन उस दिन वहाँ बैठकर हँसा। ऊपर हवा में हँसने से गला जल्दी सूखता है, इसलिए वह ज़्यादा देर हँसा भी नहीं।
उतरना उस बरस का असली हिस्सा था।
वे तीसरे पहर उतरे और यह सबसे बड़ी ग़लती थी। सुबह की बर्फ़ सख़्त रहती है और उस पर पैर टिकता है। दोपहर की धूप उसे ऊपर से गला देती है और नीचे वाली परत सख़्त रह जाती है। ऐसी ढलान पर आदमी चलता नहीं, फिसलता है, और उसे यह उसी वक़्त पता चलता है जब वह चल रहा होता है।
बादल भी नीचे से चढ़ रहे थे और उसमें रुकने का मतलब रात वहीं काटना था।
दयाराम आगे था। वह सरदार था और उसे यह ढलान बीस बरस से मालूम थी। उसने क़तार रोकी और सबसे ऊपर वाले टिन खुलवाकर रस्सी निकलवाई। आठ आदमी एक रस्सी से बँधे और तिरछे उतरे, सीधे नहीं।
किशन का बोझ पीठ पर था और तिरछे उतरने में बोझ आदमी को बाहर की तरफ़ खींचता है। बीच रास्ते में दयाराम ने चिल्लाकर कहा कि टिन छोड़ दो।
किशन ने नहीं छोड़ा। दो फेरे की मज़दूरी उस एक टिन में थी।
फिर उसका पैर गया और वह छह-सात हाथ नीचे गिरा और रस्सी ने उसे रोक लिया, और रस्सी के दूसरे सिरे पर बँधा आदमी उसके साथ खिंच गया और वह भी गिरा। तब उसने टिन छोड़ा। वह ढलान पर से लुढ़कता हुआ नीचे गया और काफ़ी देर तक उसकी आवाज़ आती रही।
वे उस रात एक चट्टान के नीचे रुके। सुबह उतरे।
मिट्टी का तेल किसी को नहीं मिला। जिस आदमी को किशन ने खींचा था, उसके दाहिने पैर की दो उँगलियाँ उस रात ठंड में गईं और बाद में काटनी पड़ीं। उसका नाम रामसुख था और वह अगले बरस भी बोझ ढोने आया, क्योंकि और कोई काम नहीं था।
किशन ने इसके बाद उन्नीस बरस बोझ ढोया।
अब वह क़तार में आगे चलता है और यही उसका काम है। साल के चार महीने ऊपर, आठ महीने नीचे। मज़दूरी अब भी फेरे के हिसाब से मिलती है और उसमें कोई ख़ज़ाना नहीं है।
उसका लड़का अब बारह का है और पिछले जाड़े में उसने पूछा कि ऊपर क्या है।
किशन ने उसे सच बता दिया। पत्थरों का ढेर, पीतल की एक तख़्ती, कुछ सड़ी लकड़ी और तंबू के खूँटे। लड़के का चेहरा उतर गया। किशन ने उसे देखा और अपना काम करता रहा। लड़का जाएगा। वह ख़ुद भी गया था, और उसे भी सब मालूम था।