गुड़िया माँ की थी, और उससे पहले नानी की। लकड़ी का चेहरा, कपड़े का शरीर, और आँखों की जगह दो काले मनके। नेहा को वह पहली नज़र में अच्छी नहीं लगी थी। पर माँ ने कहा कि यह घर में तीन पीढ़ियों से है, तो उसने उसे अलमारी में रख दिया और भूल गई। कई महीने बाद जब उसने अलमारी खोली, तो गुड़िया का मुँह दरवाज़े की तरफ़ था।
वह अलमारी के ऊपर वाले ख़ाने में रहती थी, कपड़े में लिपटी हुई, और साल में एक बार निकाली जाती थी, जब अलमारी की सफ़ाई होती।
नेहा ने एक बार पूछा था कि इसे रखा क्यों जाता है। माँ ने कहा कि नानी की निशानी है।
नानी को नेहा ने नहीं देखा था।
बाद में उसे पता चला कि माँ ने भी उसे कभी पसंद नहीं किया था। यह बात माँ ने कभी सीधे नहीं कही, पर वह गुड़िया को छूती नहीं थी। सफ़ाई के दिन भी वह उसे कपड़े समेत उठाती थी।
और नानी के बारे में उनकी अपनी बड़ी बहन ने एक बार कहा था कि अम्मा उसे देखना भी नहीं चाहती थीं।
तीन पीढ़ियाँ, और तीनों में किसी को वह अच्छी नहीं लगी।
फिर भी वह घर में थी, क्योंकि हर पीढ़ी ने उसे पिछली पीढ़ी के लिए रखा।
घरों में यह चीज़ों के साथ होता है। जिसने रखी वह चली जाती है और चीज़ रह जाती है, और अगली वाली उसे इसलिए नहीं फेंकती कि फेंकने का मतलब कुछ और निकल आएगा। फेंकने के लिए एक वजह चाहिए होती है और ‘मुझे अच्छी नहीं लगती’ वजह नहीं मानी जाती।
इसी तरह उस अलमारी में एक टूटी घड़ी भी थी, और पीतल का एक ऐसा बर्तन जिसका ढक्कन कहीं खो चुका था।
जिस बरस नेहा चौदह की हुई, उस बरस सफ़ाई उसने की।
सफ़ाई साल में एक बार होती है, दिवाली से पहले वाले हफ़्ते में, और उसमें पूरा दिन लगता है। ऊपर वाला ख़ाना सबसे आख़िर में आता है क्योंकि उस तक पहुँचने के लिए चौकी रखनी पड़ती है। उस बरस माँ की कमर ख़राब थी, इसलिए चौकी पर नेहा चढ़ी।
गुड़िया उतारते हुए उसे कुछ महसूस हुआ। बहुत हल्का। जैसे भीतर कोई चीज़ अपनी जगह से हिली हो।
कपड़े के शरीर में हिलने लायक़ कुछ नहीं होता। उसमें रुई भरी होती है और रुई हिलती नहीं।
उसने उसे दो बार और हिलाकर देखा और दोनों बार वही हुआ।
घर में उस वक़्त कोई नहीं था। माँ खेत गई थीं और लौटने में दो घंटे थे।
नेहा उसे अपने कमरे में ले गई और उसने लालटेन जलाई, क्योंकि उस कमरे में बिजली नहीं आती थी।
यह उसने चोरी से नहीं किया। वह माँ से पूछ सकती थी और शायद पूछती भी। बात सिर्फ़ इतनी थी कि दो घंटे पड़े थे और चौदह की उम्र में दो घंटे बहुत होते हैं।
सिलाई कमर के पास थी और वह हाथ की थी, बड़े-बड़े टाँकों वाली। उसने कैंची से तीन टाँके काटे।
भीतर रुई थी।
रुई के बीच में एक चीज़ थी, कपड़े में लिपटी हुई, और वह गुड़िया के भीतर उतनी ही देर से थी जितनी देर से गुड़िया थी।
बाल थे। एक चोटी। बच्चों वाली, पतली, और उसमें एक काला धागा बँधा हुआ था।
बालों के नीचे एक काग़ज़ था, चार तह किया हुआ।
नेहा ने काग़ज़ खोलने के लिए उसे लालटेन के पास किया, क्योंकि लिखावट पुरानी थी और मद्धिम पड़ चुकी थी।
रुई लालटेन से छह इंच दूर थी और वह पुरानी रुई थी।
पुरानी रुई एक ही बार में पकड़ती है। धुआँ नहीं होता, आग सीधी होती है।
गुड़िया का आधा शरीर जलने में जितना वक़्त लगा, उतने में नेहा उठ भी नहीं पाई।
आग चारपाई पर थी और चारपाई की रस्सी सूखी हुई थी और उसके नीचे बिस्तर था।
बाल्टी दूसरे कमरे में थी। दरवाज़ा दस क़दम दूर था।
नेहा ने बाल्टी नहीं ली।
उसने अपनी चादर उठाई और उसे गुड़िया के ऊपर डालकर दोनों हाथों से दबा दिया, और दबाए रखा।
यह सही तरीक़ा है और नेहा को यह मालूम नहीं था। उसने वही किया जो पास था।
आग बुझ गई। उसके दोनों हाथों की कलाइयों के ऊपर, जहाँ चादर पतली थी, खाल जल गई।
गुड़िया बच नहीं सकती थी और नहीं बची।
काग़ज़ आधा बचा। उस पर एक नाम था और एक तारीख़, और लिखावट नानी की थी। नाम एक लड़की का था। तारीख़ नेहा की माँ के जन्म से चार बरस पहले की थी।
माँ ने लौटकर कमरा देखा और नेहा के हाथ देखे।
उन्होंने काग़ज़ पढ़ा और कुछ देर उसे हाथ में लिए खड़ी रहीं। फिर उन्होंने बताया।
उनसे पहले एक और थी। चार बरस की उम्र में गई थी। जो कपड़े उसके थे, उन्हीं से नानी ने वह गुड़िया सिली थी, और उसके बाल भी उसी में रख दिए थे।
माँ को यह मालूम था। यह उन्हें बीस बरस की उम्र में बताया गया था और उन्होंने आगे किसी को नहीं बताया।
नेहा के हाथों के निशान गए नहीं। दो लकीरें, दोनों कलाइयों के ऊपर, हल्की भूरी।
जलने वाले हिस्से का इलाज उस रात हुआ और तीन हफ़्ते में खाल आ गई। हाथ ठीक से काम करते रहे और उँगलियों पर कोई असर नहीं पड़ा, क्योंकि आग कलाई तक ही आई थी। नेहा ने उसके बाद कभी पूरी बाँह वाला कुरता नहीं पहना, और इसकी कोई ख़ास वजह उसने कभी नहीं सोची।
उसकी अपनी लड़की अब नौ की है और पिछले बरस उसने पूछा कि ये क्या हैं।
नेहा ने उसे पूरी बात बता दी। शुरू से आख़िर तक, बिना कुछ छोड़े। यह उस घर में पहली बार हुआ।