किले की दीवार पर एक जगह ऐसी थी जहाँ पत्थर काले पड़ चुके थे। गाँव के बच्चे वहाँ तक जाते और फिर लौट आते। आगे कोई नहीं जाता था। बुज़ुर्ग कहते थे कि उधर जो घूमता है, उसका शरीर पूरा है और सिर नहीं है। किसी ने उसे सचमुच देखा है या नहीं, यह अलग बात है। पर हर घर में यह बात एक ही तरह सुनाई जाती थी।
परमेसर को इस बात से कोई मतलब नहीं था, इसलिए नहीं कि वह बहादुर था, बल्कि इसलिए कि उसे रोज़ उधर से निकलना था। दूध क़स्बे में पहुँचाना होता है और क़स्बा किले के उस तरफ़ है। बीच में एक ही सड़क है। दूसरी सड़क है, पर वह पहले नीचे उतरकर बगड़ गाँव तक जाती है और फिर ऊपर चढ़ती है, और उसमें पचास मिनट का फ़र्क़ पड़ जाता है।
उन्नीस साल से उसका काम एक ही तरह चलता था। तीन बजे उठना, चार बजे निकलना, साढ़े चार तक किले के मोड़ पर, और छह बजे से पहले क़स्बे की पहली दुकान पर। साइकिल के पीछे दो कनस्तर, आगे एक। भूरा हमेशा साथ चलता था। वह परमेसर का कुत्ता नहीं था, बस साथ हो लेता था।
भादों में यह रास्ता सबसे बुरा होता है। पानी सड़क के किनारे की मिट्टी काट देता है और साइकिल बीच में ही रखनी पड़ती है। उजाला भी देर से होता है। उन दिनों साढ़े चार बजे इतना अँधेरा रहता है कि अपनी अगली पहिया नहीं दिखती।
भूरा हमेशा आगे-आगे भागता और पुलिया पर जाकर बैठ जाता। वहाँ वह परमेसर का इंतज़ार करता, फिर उसके साथ हो लेता। यह उसका रोज़ का नियम था, इतना पक्का कि परमेसर उसे देखे बिना जान जाता था कि वह पुलिया पहुँच गया है।
उस हफ़्ते भूरा पुलिया से पहले रुक गया। परमेसर ने सीटी बजाई। वह नहीं आया। वह सड़क के बीचोंबीच खड़ा रहा, कान खड़े किए, और आगे नहीं बढ़ा। परमेसर उसे वहीं छोड़कर चला गया, और उस दिन उसे कुछ ख़ास नहीं लगा।
तीसरे दिन भूरा घर से ही नहीं निकला। चौथे दिन भी नहीं। परमेसर ने उसे बुलाया तो वह उठा, दरवाज़े तक आया, और वहीं बैठ गया। उसके बाद वह कभी उस सड़क पर नहीं आया।
पहली बार परमेसर ने उसे खेत में देखा। काली दीवार से थोड़ा हटकर, धान के बीच, कोई खड़ा था। बारिश हो रही थी और वह भीग रहा था। परमेसर ने साइकिल धीमी की और उधर देखा। कंधे थे। दोनों बाँहें थीं। ऊपर कुछ नहीं था।
उसने पैडल मारे और आगे निकल गया। पूरे रास्ते उसने यही सोचा कि उजाला होते ही लौटकर देखेगा, पर उजाला होते ही आदमी वह नहीं सोचता जो अँधेरे में सोचता है। उस दिन उसने घर पर इसका ज़िक्र तक नहीं किया। कहता तो लोग वही कहते जो वे हमेशा कहते थे।
अगले दिन वह मेड़ पर था। उससे अगले दिन सड़क के किनारे की झाड़ी के पास। हर सुबह वह थोड़ा और पास होता था, और हर सुबह वह उसी तरह खड़ा रहता, बिना हिले। परमेसर के लिए सबसे बुरी बात यह नहीं थी कि उसका सिर नहीं था। सबसे बुरी बात यह थी कि इसका पता ही नहीं चलता था कि वह किधर मुँह किए खड़ा है।
उसने एक हफ़्ते तक साढ़े तीन बजे निकलकर देखा। कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। जिस दिन वह जल्दी निकला, वह भी उतनी ही जल्दी वहाँ था। जिस दिन देर हुई, तब भी वहीं था, उसी जगह, उसी तरह खड़ा। इसके बाद परमेसर ने समय बदलना छोड़ दिया और टॉर्च की रोशनी सड़क से हटाकर सिर्फ़ अपने अगले पहिये पर रखने लगा।
एक सुबह भैंस ने देर करा दी। परमेसर पौने पाँच पर निकला और उस दिन बादल इतने नीचे थे कि टॉर्च की रोशनी लौटकर आँख में लगती थी। मोड़ पर पहुँचकर उसने ब्रेक दबाया। वह सड़क पर था। बीच में, दोनों तरफ़ बराबर जगह छोड़े हुए।
परमेसर ने हिसाब लगाया, और यह हिसाब उसने डर के बीच में भी उतना ही साफ़ लगाया जितना रोज़ लगाता था। लौट जाए तो बगड़ वाली सड़क, पचास मिनट का फ़र्क़। भादों की गर्मी में साठ लीटर दूध उतनी देर नहीं टिकता। दूध फट जाए तो उस दिन की कमाई गई, और दो-तीन दुकानें हमेशा के लिए गईं। उसने पैडल पर पैर रखा।
वह उसके बगल से निकला। इतने पास से कि हैंडल की मुठिया किसी चीज़ से छू गई, कपड़े जैसी किसी चीज़ से, जो गीली नहीं थी। उस पूरे लम्हे में परमेसर ने साँस नहीं ली और आँख नहीं झपकाई और सिर नहीं घुमाया। पीछे कोई आवाज़ नहीं हुई। न पैर की, न पानी की।
क़स्बे की पहली दुकान पर पहुँचकर वह उतरा और कनस्तर उतारने लगा, पर ढक्कन नहीं खुला, क्योंकि हाथ काँप रहे थे। दुकानदार ने ढक्कन खोला और दूध देखा। दूध ठीक था। तीनों कनस्तर ठीक थे।
फिर उसने ऊपर देखा। दुकान की सीढ़ी पर भूरा बैठा था। वह चार दिन से घर से नहीं निकला था, और क़स्बे तक आने का एक ही रास्ता था, वही जिससे परमेसर अभी-अभी आया था। परमेसर ने उसे नहीं छुआ। उस दिन के बाद भूरा फिर उसके साथ चलने लगा, पर पुलिया से आगे कभी नहीं।
परमेसर ने वह सड़क नहीं छोड़ी। छोड़ने का मतलब पचास मिनट होता, और पचास मिनट का मतलब वही होता जो उसने उस सुबह मोड़ पर हिसाब लगाकर निकाला था। उन्नीस साल और गुज़र गए। वह अब भी चार बजे निकलता है।
फ़र्क़ बस इतना आया कि काली दीवार वाली जगह पर वह हर सुबह एक पल के लिए रुकता है, कनस्तर का ढक्कन ज़रा-सा खोलता है, और थोड़ा दूध पत्थरों पर गिरा देता है। फिर ढक्कन बंद करके चल देता है। कोई पूछता है तो वह कहता है कि बर्तन भारी है और मोड़ पर थोड़ा छलक ही जाता है।