क़स्बा इतना छोटा था कि लोग एक-दूसरे की गाड़ियों की आवाज़ पहचान लेते थे। कोई अजनबी आता तो शाम तक ख़बर पूरे मोहल्ले में फैल जाती थी। बरसों से यहाँ कोई बड़ी वारदात नहीं हुई थी, और थाने में सबसे संगीन मामला पिछले साल का एक ज़मीनी झगड़ा था। फिर धनतेरस की शाम बाबूलाल की लाश हलवाई वाली गली में मिली।

वह गली उस शाम क़स्बे की सबसे भरी हुई जगह थी। दोनों तरफ़ दुकानें खुली थीं, बीच में लोग चल रहे थे, और हलवाई के यहाँ कड़ाही चढ़ी हुई थी। ऐसी जगह पर किसी को मारकर निकल जाना मुमकिन नहीं लगता। फिर भी किसी ने कुछ नहीं देखा।

पुलिस ने पहला सवाल यही पूछा कि बाहर से कौन आया था। जवाब किसी के पास नहीं था। लोग छिपा नहीं रहे थे। उस दिन सचमुच कोई बाहर से नहीं आया था।

रामऔतार का इससे कोई लेना-देना नहीं था। वह दूध बेचता था और शाम को उसका फेरा पाँच बजे शुरू होता था। साइकिल के पीछे दो केन, हैंडिल पर एक छोटा डिब्बा, और उनतालीस घर। सात बजे तक फेरा ख़त्म।

उनतालीस घरों में किसे कितना दूध जाता है, यह उसे याद नहीं करना पड़ता था। वह उसके हाथ में था। किस गेट पर आधा लीटर, किस पर एक, किस पर सवा। नाप उठाते ही हाथ अपने आप रुक जाता था।

📚 यह भी पढ़ें एक मर्डर की कहानी
एक मर्डर की कहानी

कार्तिक में यह हिसाब हिल जाता है। दिवाली से पहले घरों में लोग आने लगते हैं, और जिस घर में दो लोग हों वहाँ छह हो जाते हैं। तब रामऔतार को हैंडिल वाला डिब्बा भी भरकर लाना पड़ता है, और लौटते वक़्त वह ख़ाली होता है।

यह हर साल होता है और यह उसका सबसे अच्छा महीना है। बढ़ा हुआ दूध पंद्रह-बीस दिन चलता है, फिर मेहमान लौट जाते हैं और नाप वापस अपनी जगह आ जाती है। भैया दूज के दो-तीन दिन बाद तक सब पुराने हिसाब पर आ जाते हैं।

बाबूलाल सर्राफ़ा नहीं थे, पर ब्याज पर पैसा चलाते थे, और धनतेरस से पहले वाले हफ़्ते में उनके पास सबसे ज़्यादा नक़दी रहती थी। यह क़स्बे में कोई छिपी बात नहीं थी। पुलिस ने भी यहीं से शुरू किया।

तीसरे दिन उन्होंने रामसनेही को उठा लिया। ज़मीन वाला झगड़ा उसी का था। रामसनेही के घर से कुछ नहीं निकला, गवाह कोई था नहीं, पर थाने में एक नाम होना ज़रूरी था और वह नाम पहले से लिखा हुआ था।

रामऔतार का फेरा चलता रहा। दिवाली निकली, भैया दूज निकला, और नाप एक-एक करके पुरानी होने लगी। सवा वाले घर एक पर आ गए। दो वाले सवा पर। यह हर साल की बात है और इसमें सोचने को कुछ नहीं होता।

📚 यह भी पढ़ें कूटनीति का क़ातिल
कूटनीति का क़ातिल

फिर एक शाम, फूलमती के गेट पर नाप उठाते हुए उसका हाथ रुका।

फूलमती अकेली रहती थी। उसका बेटा लखनऊ में था और साल में दो बार आता था। उन्नीस साल से उस गेट पर आधा लीटर जाता था। आधा लीटर, रोज़, बिना बदले।

इस बार भी आधा ही जा रहा था। बात यह नहीं थी। बात यह थी कि उसने कब से आधा जाना शुरू किया था।

रामऔतार ने खड़े-खड़े पीछे की तरफ़ गिना। फूलमती का दूध धनतेरस के अगले दिन आधा हुआ था। भैया दूज के बाद नहीं। बाक़ी उनतालीस में से किसी का भी उस दिन नहीं हुआ था।

और आगे की तरफ़ गिनने पर दूसरी बात निकली। उसका दूध बढ़ा भी सबसे पहले था। क़स्बे में सबसे पहला घर, दिवाली से ग्यारह दिन पहले, जब किसी और के यहाँ मेहमान नहीं आए थे। उन ग्यारह दिनों में वहाँ रोज़ डेढ़ लीटर गया था।

📚 यह भी पढ़ें मरे हुए सवाल
मरे हुए सवाल

यानी उस घर में कोई था। दिवाली से ग्यारह दिन पहले आया, ग्यारह दिन रहा, और धनतेरस की रात के बाद वहाँ नहीं था।

रामऔतार उस गेट पर उन्नीस साल से दूध डाल रहा था। उसे यह भी मालूम था कि फूलमती का बेटा उस बार आया ही नहीं था, क्योंकि आता तो गली में दिख जाता।

अगली शाम फूलमती गेट पर ही खड़ी थी। उसने पूछा कि इस बार दिवाली पर दूध महँगा हुआ या नहीं। रामऔतार ने कहा कि नहीं हुआ। उसने नाप उठाई, आधा लीटर डाला, और डिब्बा वापस साइकिल पर रख दिया। हाथ काँपा नहीं। यह बात उसे बाद में याद आई और इस पर उसे ख़ुद हैरानी हुई।

उसने वह शाम पूरी की। बाक़ी घर, बाक़ी नाप, सात बजे तक। रात को वह किसी के पास नहीं गया। अगली शाम उसने फिर वही फेरा किया और उसी गेट पर रुका। फेरा छोड़ना फेरा करने से ज़्यादा दिखता है।

दो दिन बाद वह थाने गया। दूध की नाप सबूत नहीं होती। यह उसे भी पता था। पर उसने जो बताया वह एक तारीख़ थी, और तारीख़ के साथ एक पता था, और पुलिस को इतना ही चाहिए था। फूलमती के पिछले कमरे से एक बैग निकला और उसमें बाबूलाल के काग़ज़ात थे। आदमी सीतापुर में उसकी बहन का लड़का था।

📚 यह भी पढ़ें एक मर्डर की कहानी
एक मर्डर की कहानी

क़स्बे को यह बात हज़म नहीं हुई कि बाहर का आदमी ग्यारह दिन से भीतर था और किसी को पता नहीं चला। सच यह है कि पता चलने का कोई तरीक़ा भी नहीं था। कार्तिक में हर घर में कोई न कोई आया हुआ होता है।

रामसनेही ग्यारह दिन बाद छूटकर आया। उसके बाद उसने गेट पर बर्तन रखना बंद कर दिया। अब वह ख़ुद बाहर खड़ा मिलता है, हाथ में बाल्टी लिए, शाम के छह बजे। रामऔतार नाप उठाता है और दूध गिरता है। दोनों चुप रहते हैं। रामसनेही को अब छह बजे के बाद घर के अंदर रहना अच्छा नहीं लगता।