गाँव में जो भी मरता है, उसके दसवें दिन मुन्नीलाल का काम निकलता है।
वह नाई है। दसवें पर घर के मर्दों के सिर मुँड़ते हैं और यह काम उसी के घर का है, उसके बाप का था और उससे पहले उसके बाप का।
इस काम की एक बात है जो बाहर से नहीं दिखती। मुन्नीलाल हर घर के भीतर तक जाता है, और वह उस दिन जाता है जब घर सँभला हुआ नहीं होता।
बत्तीस बरस में उसने इस गाँव में और आसपास के तीन गाँवों में यह काम किया था। मौतें उसे तारीख़ से याद नहीं रहतीं। उसे घर याद रहते हैं, और घरों में वह चीज़ याद रहती है जो उस दिन बाक़ी दिनों से अलग थी। किसने रोया और किसने नहीं। किस घर में दसवें दिन तक बहू रसोई सँभाल चुकी थी और किसमें नहीं।
यह सब वह किसी को बताता नहीं। बताने वाला नाई दूसरी बार नहीं बुलाया जाता।
उस बरस अगहन में सोमवती गुज़र गई।
घर वालों ने कहा कि साँप ने काटा था। रात में हुआ, खेत के पास, और सुबह होने से पहले ही सब ख़त्म हो गया।
साँप का काटा हुआ आदमी गाँव में उसी दिन जला दिया जाता है और इसमें किसी को कुछ अजीब नहीं लगता।
साँप के काटे में पोस्टमार्टम की बात कोई नहीं उठाता। उठाई भी जाए तो अस्पताल तीस किलोमीटर है और लाश को वहाँ ले जाना, रखवाना, और दो दिन इंतज़ार करना, यह सब एक घर के लिए भारी पड़ता है, ख़ासकर उस घर के लिए जिसमें अभी-अभी कोई गया हो।
इसलिए यह रास्ता खुला रहता है। किसी ने उसे बनाया नहीं है। वह बस खुला है।
मुन्नीलाल दसवें दिन उस घर गया।
मुँड़ाने वाले तीन थे। सोमवती का आदमी, उसका छोटा भाई, और एक चचेरा।
पहले दो निपट गए।
तीसरा सोमवती का आदमी था और मुन्नीलाल ने उस्तरा उठाते ही देख लिया।
गर्दन के पीछे, बालों के नीचे, दो लकीरें थीं। एक कान के पास तक जाती थी। खुरचन थी, नाख़ून की, और वह भर चुकी थी पर उसके किनारे अभी गुलाबी थे।
उसने कोई सवाल नहीं किया और काम पूरा कर दिया।
पूछता भी तो जवाब मौजूद था। घर में खुरचन कई तरह से लगती है और गाँव में इसकी सैकड़ों वजहें होती हैं।
जो जवाब मौजूद नहीं था, वह उम्र का था। ऐसी खुरचन दस-बारह दिन में भर जाती है और किनारे बीस दिन तक गुलाबी रहते हैं। यह मुन्नीलाल जानता था, क्योंकि उसके अपने काम में रोज़ खाल कटती है।
सोमवती को गुज़रे दस दिन हुए थे।
मुन्नीलाल ने यह हिसाब उसी वक़्त नहीं लगाया। उसने उस्तरा चलाया, काम पूरा किया, पैसे लिए, और घर चला गया। हिसाब उसे रात में समझ आया, जब वह लेटा हुआ था, और यही उसे सबसे बुरा लगा। उस पूरे वक़्त उसका हाथ उस गर्दन पर था और उसे कुछ नहीं लगा था।
अब सोचने लायक़ यह है कि उसके पास था क्या।
लाश जल चुकी थी। साँप किसी ने देखा नहीं था। रिपोर्ट कोई हुई नहीं थी, क्योंकि साँप के काटे में रिपोर्ट नहीं होती।
उसके पास दो लकीरें थीं जो अगले दस दिन में ग़ायब हो जातीं।
और उसके पास वह चीज़ थी जो उसके काम की जड़ है। हर घर उसे बुलाता है और हर घर उसे पैसा देता है। जिस दिन एक घर उससे नाराज़ हो जाए, उस दिन बाक़ी घर भी सोचने लगते हैं।
नाई की गवाही कोई नहीं लेता।
सोमवती का भाई तेरहवीं पर आया था और अगले दिन लौट रहा था। वह दूसरे ज़िले में रहता था।
मुन्नीलाल उसे बस अड्डे पर मिला।
उसने उसे वह बता दिया जो उसने देखा था। दो लकीरें, कहाँ थीं, कितनी पुरानी थीं। उसने यह नहीं कहा कि इसका मतलब क्या है।
भाई ने पूरी बात सुनी।
फिर उसने पूछा कि लड़कियों का क्या होगा।
सोमवती की दो लड़कियाँ थीं, ग्यारह और सात की, और वे उसी घर में थीं।
रिपोर्ट होती तो पुलिस आती। लाश नहीं थी। गवाह नहीं था। मुक़दमा चलता तो बरसों चलता और उसमें एक नाई की बात पर कुछ टिकता नहीं।
और उन बरसों में लड़कियाँ उसी घर में रहतीं, उस आदमी के साथ, जिस पर उनके मामा ने रिपोर्ट कराई हो।
भाई अपने साथ भी नहीं ले जा सकता था। ले जाने के लिए घर वालों की मर्ज़ी चाहिए और वह मिलती नहीं। अदालत से ले जाने में भी वही बरस लगते।
भाई ने रिपोर्ट नहीं कराई।
उसने मुन्नीलाल से जाते-जाते इतना कहा कि वह इसे किसी और से न कहे, और मुन्नीलाल ने नहीं कहा।
यह कहानी का सबसे ठंडा हिस्सा है और इसमें कोई खलनायक नहीं है। भाई ने हिसाब लगाया और उसका हिसाब सही था।
मुन्नीलाल उस घर में इसके बाद भी जाता रहा। जाना पड़ता है। उस गाँव में उसके अलावा कोई नहीं है और उस घर में उसके बाद तीन बार काम निकला। एक बार बूढ़ी सास के जाने पर। दो बार शादियों में।
लकीरें भर गईं।
उन तीन बरसों में गाँव में इस बात का कोई ज़िक्र नहीं उठा और उठने की कोई वजह भी नहीं थी। सोमवती का नाम धीरे-धीरे उन नामों में चला गया जो साल में एक बार लिए जाते हैं।
बड़ी लड़की की शादी तीन बरस बाद हुई। घर में शादी होती है तो नाई का काम फिर निकलता है, हल्दी वाले दिन और बारात वाले दिन।
मुन्नीलाल उस शादी में था।
काम ख़त्म होने पर उसे नेग मिला, जैसा मिलता है, और वह उसी हाथ से मिला।