कसौटी पर लकीर खींचने के बाद मूलचंद उसे तीन सेकंड देखता था, फिर तेज़ाब की बूँद रखता था, और फिर आगे बोलता था। तीस साल में उसने यह क्रम कभी नहीं तोड़ा। दुकान गिरवी का काम करती थी, यानी लोग गहना रखकर पैसा ले जाते थे और तय महीनों में छुड़ा ले जाते थे। शहर छोटा था। छुड़ाने कौन आएगा और कौन नहीं, यह उसे अक्सर उसी दिन मालूम हो जाता था।
उसका असली हुनर यह नहीं था। वह गहना देखकर घर बता देता था। कौन-सा सुनार, कौन-सा ज़माना, और अक्सर कौन-सा घर। हर कारीगर का जोड़ लगाने का अपना ढंग होता है, हर पुराने गहने पर मरम्मत के अपने निशान होते हैं, और शहर में सुनार कुल जमा नौ थे।
अक्टूबर में एक आदमी दो चूड़ियाँ लेकर आया। मूलचंद ने उन्हें उठाया और उसे तुरंत पता चल गया कि वे किसकी हैं। ग्यारह साल पहले उसी दुकान में उन चूड़ियों का जोड़ दोबारा लगाया गया था और तब उसने काम ख़ुद देखा था। जोड़ पर एक हल्की लकीर रह जाती है, जो पॉलिश के बाद भी दिखती है अगर आपको मालूम हो कि कहाँ देखना है।
चूड़ियाँ रामप्यारी की थीं। पूरे मोहल्ले की रामप्यारी, जो अड़सठ की थीं, जिनके पति को गुज़रे नौ साल हो चुके थे, और जिनका बेटा राकेश बर्तन की दुकान चलाता था। लाने वाला उनके भाई का लड़का था और उसके पास लिखा हुआ अधिकार-पत्र भी था, जो सही था। मूलचंद ने पैसे दे दिए।
इक्कीस दिन बाद एक दूसरा आदमी आया। एक हार और दो अँगूठियाँ। नाम अलग था। हस्ताक्षर अलग थे। अधिकार-पत्र फिर सही था। हार पर वही घिसाव था जो एक ही तरह से पहने जाने वाले हार पर पड़ता है और मूलचंद उसे भी पहचान गया।
तीसरी बार दिसंबर के पहले हफ़्ते में हुआ, और इस बार लाने वाला रामप्यारी का सगा भाई था, जो सत्तर पार का था और जिसे मूलचंद बचपन से जानता था।
पाँच हफ़्ते, तीन बार, तीन नाम। मूलचंद ने अपने हिसाब की चीज़ें जोड़नी शुरू कीं और चार बातें अजीब लगीं।
पहली, सोना हर बार धुला हुआ आता था। साबुन से धुला हुआ, कहीं-कहीं ब्रश के निशान तक। चुराया हुआ सोना कोई नहीं धोता। दूसरी, वज़न हर बार गोल संख्या से थोड़ा नीचे रहता, बाईस दशमलव चार, अठारह दशमलव छह, जैसे किसी ने पहले से जोड़कर तय किया हो कि कुल कितना चाहिए। तीसरी, तीनों में से किसी ने भाव नहीं पूछा और कोई मोल-भाव नहीं किया।
चौथी बात वह थी जो सबसे भारी पड़ती है। मंगलसूत्र कभी नहीं आया। जो आदमी किसी बुढ़िया के बक्से में हाथ डालता है, वह सबसे ऊपर रखी चीज़ उठाता है, और मंगलसूत्र हमेशा सबसे ऊपर रखा होता है।
मूलचंद ने चारों को उल्टा पढ़ा। उसे लगा कि कोई बहुत सफ़ाई से काम कर रहा है और घर को भनक नहीं है। धुलाई उसे सफ़ाई लगी, गोल संख्या से नीचे रहना उसे चालाकी लगी, और मंगलसूत्र न आना उसे यह लगा कि आदमी शक से बचना चाहता है।
दस दिसंबर को राकेश की दुकान पर बर्तनों की सालाना पूजा थी और मोहल्ला वहीं इकट्ठा था। मूलचंद वहाँ गया और राकेश को एक तरफ़ ले जाकर तीनों बार का हिसाब बता दिया। तारीख़ें, नाम, वज़न। साथ में उसने इतना जोड़ा कि माँ जी से पूछ लेना, बिना शोर किए।
शोर उसी शाम मच गया। वह राकेश ने नहीं मचाया। पूजा में चालीस लोग थे और उनमें से किसी ने आधी बात सुन ली।
सच वह नहीं था जो मूलचंद ने पढ़ा था। रामप्यारी ख़ुद भिजवा रही थीं। तीनों आदमी उनके अपने थे और तीनों को मालूम था। पैसा राकेश की दुकान के उस उधार में जा रहा था जो दो साल से बढ़ रहा था और जिसकी भनक राकेश ने घर में किसी को नहीं लगने दी थी। रामप्यारी को दो साल पहले पता चल गया था और उन्होंने बेटे को यह जताया भी नहीं। तीन नाम इसीलिए थे, ताकि एक ही नाम बार-बार दुकान पर न आए और बात न फैले।
जो चीज़ वे ख़रीद रही थीं वह सोना नहीं था। वह यह था कि किसी को पता न चले। पाँच हफ़्ते और तीन नाम उसी एक चीज़ पर ख़र्च हुए थे, और मूलचंद ने उसे दस मिनट में ख़त्म कर दिया।
उसके बाद जो हुआ वह मोहल्ले भर ने देखा। उधार की बात खुल गई और जिन लोगों का पैसा फँसा था वे इकट्ठे आ गए। बर्तन की दुकान मार्च तक बंद हो गई। राकेश ने अपनी माँ से लगभग एक साल बात नहीं की। सोना देने पर नहीं। इस पर कि उन्हें दो साल से मालूम था और वे रोज़ उसी तरह पेश आती रहीं।
मूलचंद ने कोई ग़लत काम नहीं किया था और यह बात उससे कई लोगों ने कही। गहना पहचानना उसका काम है और शक होने पर घर को बताना भी उसका काम है। शहर के बाक़ी आठ सुनारों में से किसी ने उससे इस बारे में बात नहीं की, क्योंकि उनमें से हर एक ने सोचा कि वह भी यही करता।
अठारह महीने बाद रामप्यारी ख़ुद आईं, अकेले, और सब कुछ छुड़ाकर ले गईं। पैसा कहाँ से आया, यह उन्होंने नहीं बताया और मूलचंद ने नहीं पूछा। उसने बक्सा निकाला, चूड़ियाँ, हार, अँगूठियाँ, सब उनके सामने रखा और तौलकर बताया। रामप्यारी ने सुना, फिर तराज़ू अपनी तरफ़ खिसकाया, और एक-एक चीज़ ख़ुद तौली। तीस साल में उन्होंने यह कभी नहीं किया था।