कांटा घर की खिड़की से जाजमऊ की पूरी सड़क दिखती थी। रामाशंकर सुबह छह बजे बैठता और रात नौ बजे उठता, और इस बीच जो भी ट्रक टैनरी के भीतर गया या बाहर निकला, उसका वज़न उसकी कॉपी में दर्ज हुआ। भीतर जाते वक़्त एक वज़न, बाहर निकलते वक़्त दूसरा। दोनों का फ़र्क़ माल होता है। यही पूरा हिसाब है। रामाशंकर इकत्तीस साल से यही फ़र्क़ लिखता आया था।

जाजमऊ में चमड़े की गंध ऐसी है कि बाहर वाले पहले दिन उल्टी कर देते हैं और भीतर वाले उसे सूँघना बंद कर देते हैं। रामाशंकर को अब कुछ नहीं आता था। न चमड़ा, न रसायन, न वह पानी जो कारख़ाने के पीछे से गुज़रता था। उसकी दुनिया लोहे का एक चबूतरा थी और उस पर चढ़ते-उतरते ट्रक। और एक कॉपी।

उसका बेटा दिनेश उसी टैनरी में सिलाई विभाग में लगा था, अभी कच्चा, तीन साल की उस्तादी बाक़ी। रामाशंकर ने यह जगह उसके लिए माँगी थी, और माँगते वक़्त सिर झुकाया था। यह बात वह किसी को नहीं बताता था।

भरोसा टूटने लगा

पूस के बाद रात वाले ट्रक बढ़ गए। दिन में जो गाड़ियाँ शोधन संयंत्र तक जाती थीं, वे अब ग्यारह बजे के बाद निकलने लगीं। रामाशंकर को रात में बैठने के अलग पैसे मिलने लगे, तीन सौ रुपये रात के। पहले महीने उसने सोचा कि काम बढ़ गया है। दूसरे महीने उसने कॉपी देखी।

भीतर आने वाला कीचड़ और बाहर जाने वाला कीचड़ बराबर नहीं थे। हर रात लगभग चार टन कम। चार टन कोई छोटी चीज़ नहीं होती। वह कहीं तो जाता होगा। एक रात उसने ट्रक के पीछे साइकिल दौड़ाई और डेढ़ किलोमीटर बाद हाँफकर रुक गया, पर उतने में वह देख चुका था कि ट्रक संयंत्र की तरफ़ मुड़ा ही नहीं।

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अगले इतवार वह उधर पैदल गया। रेत में गड्ढे खुदे थे और भरे जा चुके थे, और ऊपर से मिट्टी डाल दी गई थी। पर मिट्टी का रंग अलग था। नीचे वाला कीचड़ हरा था, वह हरा जो चमड़े के रसायन का होता है। बरसात में यह सब ऊपर आ जाएगा। रामाशंकर को यह पता था, क्योंकि बचपन इसी किनारे बीता था।

कांटा घर की पर्ची तीन कापियों में छपती है। एक ड्राइवर को, एक दफ़्तर को, और कार्बन वाली रामाशंकर के पास। इकत्तीस साल की कार्बन कापियाँ उसके घर में एक टीन के बक्से में रखी थीं। उसने रात वाली पर्चियाँ निकालीं, और तब उसे वह चीज़ दिखी जो सबसे पहले दिखनी चाहिए थी। हर पर्ची पर उसका दस्तख़त था। ख़ाली वज़न वही लिखा था जो उसे लिखने को कहा गया था, और उसने बिना गिने लिखा था, क्योंकि इकत्तीस साल में उससे कभी किसी ने झूठ नहीं बुलवाया था। काग़ज़ पर यह पूरा काम क़ानूनी दिखता था, और क़ानूनी उसने बनाया था।

बोर्ड का सालाना निरीक्षण फागुन के दूसरे हफ़्ते में था। निरीक्षण के दिन कागज़ मिलाए जाते हैं, और कागज़ पूरे थे। जो कमी थी वह ज़मीन के नीचे थी और उस पर मिट्टी पड़ी थी। बारिश जून में आती। बीच में चार महीने थे। चार महीने में मिट्टी बैठ जाती है। उस पर घास उग आती है।

परतें उतरने लगीं

मैनेजर ने उसे बुलाया और सीधे कुछ नहीं कहा। उसने दिनेश की उस्तादी की बात की। कहा कि लड़का मेहनती है और तीन साल बाद पक्का हो जाएगा, अगर सब ठीक चलता रहा। फिर उसने रामाशंकर को चाय पिलाई और जाने दिया। पूरी बातचीत में एक बार भी ट्रक का ज़िक्र नहीं आया।

रामाशंकर के पास दो रास्ते थे और दोनों उसी टीन के बक्से से होकर जाते थे। बक्सा जला देता तो कुछ साबित नहीं होता, और उसका नाम भी कहीं नहीं आता। बक्सा दे देता तो साबित हो जाता, और सबसे पहले उसी का नाम आता, क्योंकि हर पर्ची पर वही था। उसने ग्यारह दिन सोचा।

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बारहवें दिन उसने बक्सा उठाया और बोर्ड के दफ़्तर में जमा कर दिया। साथ में एक काग़ज़ लिखा जिसमें उसने वह जगह बताई जहाँ गड्ढे थे, और यह भी लिखा कि पर्चियों पर दस्तख़त उसी के हैं। लिखने में दो घंटे लगे। हाथ काँप रहा था और अक्षर बड़े बनाने पड़ रहे थे।

खुदाई अप्रैल में हुई। ग्यारह गड्ढों में से नौ में वही हरा कीचड़ निकला। अख़बार में टैनरी का नाम छपा और रामाशंकर का नाम नहीं छपा, पर जाजमऊ में सबको पता चल गया। दिनेश की उस्तादी उसी हफ़्ते ख़त्म कर दी गई, बिना कोई वजह लिखे। रामाशंकर को नौकरी से नहीं निकाला गया। कांटा घर बंद कर दिया गया, इसलिए निकालने की ज़रूरत नहीं पड़ी।

तीन महीने बाद वही कारख़ाना दूसरे नाम से खुल गया। रामाशंकर को किसी ने काम पर नहीं बुलाया और उसने माँगा भी नहीं। दिनेश दिल्ली चला गया, किसी और लाइन में, और महीने में एक बार फ़ोन करता है। फ़ोन पर वह अपनी नौकरी की बात करता है, मौसम की, किराए की। रामाशंकर हर बार पूछना चाहता है कि उसने माफ़ किया या नहीं। हर बार वह फ़ोन रख देता है।