रिपोर्ट में एक ख़ाना ऐसा होता है जिसे ज़्यादातर लोग ख़ाली छोड़ देते हैं। उसमें लिखा रहता है, देरी का कारण। रामदुलारी ने अठारह बरस में यह ख़ाना कभी नहीं भरा था, क्योंकि भरने लायक़ कुछ होता ही नहीं था।
उस साल आषाढ़ में उसे भरना पड़ा।
रामदुलारी गाँव की आशा कार्यकर्ता थी। उसका काम यह नहीं है कि वह किसी को बचाए। उसका काम यह है कि वह वक़्त पर फ़ोन करे, गाड़ी बुलाए, और मरीज़ के साथ रहे।
अठारह बरस में उसने इस गाँव के लगभग हर बच्चे को पहला टीका लगवाया है और लगभग हर औरत को अस्पताल तक पहुँचाया है। इस काम में सबसे ज़्यादा वक़्त फ़ोन में जाता है, दवा में नहीं। सिग्नल स्कूल की छत पर आता है और वहाँ तक पहुँचने में छह मिनट लगते हैं, अगर दौड़ा जाए।
गाँव तक पक्की सड़क नहीं आती। ब्लॉक से आने वाली सड़क तीन किलोमीटर पहले ख़त्म हो जाती है, नाले के इस पार, और उसके आगे कच्चा है। बरसात में वह तीन किलोमीटर कीचड़ हो जाते हैं।
एम्बुलेंस उस पार तक आ जाती है। आगे नहीं आती। यह उसकी ग़लती नहीं है, गाड़ी है ही ऐसी।
दिनदयाल को साँप ने काटा, रात के साढ़े नौ बजे, खेत से लौटते हुए। रामदुलारी दस मिनट में पहुँच गई और उसने वही किया जो सिखाया गया है। पैर को हिलने नहीं देना है, कसकर बाँधना नहीं है, और मरीज़ को जल्दी अस्पताल पहुँचाना है।
दिनदयाल पचास का था और उसे मालूम था कि उसे क्या हुआ है। उसने घर आकर ख़ुद बताया और अपने पैर की तरफ़ इशारा किया। इतनी देर तक वह होश में था और बात कर रहा था।
फ़ोन उसने पैंतालीस मिनट में लगा लिया, जो उस इलाक़े में अच्छा माना जाएगा। एम्बुलेंस नाले के उस पार साढ़े ग्यारह बजे आ गई।
बीच में तीन किलोमीटर थे।
खाट पर उठाकर ले जाना पड़ा। छह आदमी लगे, चार उठाने वाले और दो टॉर्च वाले, और बीच-बीच में बदलते रहे। कीचड़ में खाट लेकर चलना धीमा होता है और उस रात बारिश भी हो रही थी।
खाट पर आदमी को ले जाना उतना सीधा नहीं है जितना दिखता है। खाट झूलती है, और झूलने से पैर हिलता है, और साँप के काटे में पैर का हिलना सबसे बुरी चीज़ है। इसलिए रामदुलारी साथ-साथ चलती रही और उसका एक हाथ पूरे रास्ते दिनदयाल की पिंडली पर रहा। कीचड़ में उसकी चप्पल दो बार निकली। दोनों बार उसने उसे छोड़ दिया, क्योंकि रुकने का मतलब सबका रुकना था।
तीन किलोमीटर में एक घंटा दस मिनट लगे।
दिनदयाल एम्बुलेंस तक पहुँच गया। अस्पताल तक भी पहुँच गया। वहाँ पहुँचने के बीस मिनट बाद वह नहीं रहा।
रामदुलारी को अगली सुबह रिपोर्ट भरनी थी।
बाक़ी ख़ाने आसान थे। उम्र, गाँव, समय, दवा। फिर वही ख़ाना आया।
उसने वहाँ लिखा कि तीन किलोमीटर कच्चा रास्ता है और उसमें एक घंटा दस मिनट लगे। यह लिखने के बाद वह रुक गई, क्योंकि यह कारण नहीं था। यह सिर्फ़ हुआ क्या था, यह था।
कारण यह था कि वह रास्ता कच्चा क्यों है।
अगले दो हफ़्तों में उसने यह पता किया, और यह पता करना मुश्किल नहीं था। ब्लॉक के दफ़्तर में कोई कुछ छिपा नहीं रहा था। जो जानकारी चाहिए थी वह माँगने पर मिल गई, क्योंकि किसी को यह लगा ही नहीं कि इसमें छिपाने लायक़ कुछ है।
दो हफ़्तों में उसने ब्लॉक के चार चक्कर लगाए। एक चक्कर का किराया सत्तर रुपये है और वह उसकी अपनी जेब से गया, क्योंकि इस तरह के काम का कोई काग़ज़ नहीं बनता। यह ख़र्च कहीं दर्ज नहीं हुआ।
वह तीन किलोमीटर दो बार मंज़ूर हो चुके थे। एक बार छह साल पहले और एक बार तीन साल पहले।
दोनों बार पैसा आख़िरी वक़्त पर दूसरी सड़क पर चला गया। पहली बार जिस सड़क पर गया, वह ब्लॉक मुख्यालय से प्रधान के अपने गाँव को जोड़ती है। दूसरी बार जिस पर गया, वह उसी सड़क का बचा हुआ हिस्सा था।
रामदुलारी ने महेंद्र प्रधान से यह पूछा नहीं। पूछने की ज़रूरत नहीं थी। उन तीन किलोमीटर के उस पार जो बस्ती है, उसमें चालीस घर हैं, और वे चालीस घर बरसों से दूसरी तरफ़ वोट डालते हैं। यह बात गाँव में कोई भी बता देता है और कोई इसे छिपाता भी नहीं।
किसी ने कोई अपराध नहीं किया था। फ़ाइल में सब सही था। दोनों बार सड़क बनी, दोनों बार पैसा सड़क पर ही लगा, और दोनों बार वह सड़क किसी न किसी गाँव के काम आई।
रामदुलारी ने वह ख़ाना भर दिया। उसने दो लाइनें लिखीं और उनमें दोनों मंज़ूरियों के साल लिखे।
रिपोर्ट ब्लॉक गई और वहाँ से आगे गई। उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, न किसी ने उससे कुछ पूछा। ऐसी रिपोर्टें रुकती नहीं, बस चलती रहती हैं और कहीं रखी रह जाती हैं।
वे तीन किलोमीटर अगले बरस बन गए। काम चार महीने में पूरा हो गया, जो अपने आप में यह बता देता है कि उसमें कभी कोई तकनीकी दिक़्क़त थी ही नहीं।
वजह रिपोर्ट नहीं थी। अगले बरस चुनाव था।
रामदुलारी अब भी उसी गाँव में है और उसी काम पर है। एम्बुलेंस अब गाँव तक आ जाती है, ठीक दरवाज़े तक, और आने में उसे बारह मिनट लगते हैं। यह उसने ख़ुद नापा है। जिस ख़ाने में उसने वे दो लाइनें लिखी थीं, वह अब फिर से ख़ाली जाता है।