पिछले कई महीनों से उस गाँव में शाम जल्दी हो जाती थी। सूरज तो अपने वक़्त पर ही डूबता था, पर लोग उससे पहले घर लौट आते। गलियाँ खाली हो जातीं। बत्तियाँ जल्दी बुझ जातीं। किसी ने इसका कारण खुलकर नहीं बताया, क्योंकि बताने के लिए पहले मानना पड़ता, और कोई मानना नहीं चाहता था।
यह आदत उस रात से शुरू हुई थी जब भोला की माँ गुज़रीं और उनका बेटा शहर से देर से पहुँचा। शव सुबह से रखा था। बड़े-बूढ़ों ने कहा कि अब सुबह का इंतज़ार नहीं होगा, और घाट रात में ही जाना पड़ेगा। गाँव में इस पर बहस नहीं हुई। रात में क्यों नहीं जाना चाहिए, यह सवाल किसी ने उठाया नहीं, हालाँकि वह सबके मन में था।
घाट गाँव से दो किलोमीटर है और रास्ता खेतों के बीच से जाता है। दिन में यह रास्ता कुछ भी नहीं है। लोग इससे रोज़ गुज़रते हैं, साइकिल से, पैदल, बकरियाँ लेकर। रात में इससे कोई नहीं गुज़रता, और इसकी वजह किसी ने कभी लिखी नहीं, बस माँएँ बच्चों को इतना बता देती हैं कि पीछे से कोई नाम लेकर बुलाए तो जवाब मत देना।
यह बात इतनी पुरानी है कि उसे मानने वाले भी उस पर हँसते हैं। और उस रात, जब बाईस आदमी अर्थी लेकर निकले, तो किसी को यह याद भी नहीं थी। बाईस आदमियों के साथ चलते हुए किसी को कुछ याद नहीं रहता।
हरिया की उम्र उस वक़्त अड़तीस थी और वह गाँव के उन लोगों में था जो ऐसी बातों पर सबसे कम यक़ीन करते थे। वह मानता था कि रात में लोग इसलिए नहीं निकलते क्योंकि रास्ता ख़राब है और साँप निकलते हैं। यह बात ग़लत भी नहीं थी। रास्ता सचमुच ख़राब है और साँप सचमुच निकलते हैं।
आगे चार लोग कंधा दिए हुए थे और बाक़ी पीछे। हरिया सबसे पीछे था। पीछे रहने का उसका इरादा नहीं था; वह देर से पहुँचा था और भीड़ के पीछे ही लग गया। उसके पीछे कोई नहीं था। यह उसे उस वक़्त पता भी नहीं था।
अर्थी के साथ चलने में एक बात यह होती है कि कोई बात नहीं करता। सिर्फ़ राम-नाम की आवाज़ चलती है, और वह भी आगे वालों की। पीछे वालों तक वह टुकड़ों में पहुँचती है, कभी सुनाई देती है और कभी नहीं। हरिया को शुरू के पंद्रह मिनट यह अच्छा लगा था।
आधे रास्ते पर, जहाँ नहर की पुलिया आती है, उसे पीछे से आवाज़ आई।
आवाज़ ने उसका नाम लिया। पूरा नाम, जैसे घर में लिया जाता है, और उस लहजे में जिसमें कोई पुराना आदमी बुलाता है।
हरिया ने वही किया जो कोई भी करता। उसने कहा, हाँ।
फिर वह मुड़ा।
पीछे रास्ता ख़ाली था। दोनों तरफ़ खेत थे और खेतों में उस वक़्त गेहूँ खड़ा था, कमर तक ऊँचा, और चाँदनी में वह भूरा दिखता है। इतना ही दिखता था। और कुछ नहीं।
उसने आगे देखा तो अर्थी काफ़ी आगे निकल चुकी थी। बीस-पच्चीस क़दम का फ़ासला हो गया था, इतने में ही, हालाँकि वह रुका सिर्फ़ एक पल के लिए था।
वह तेज़ चला। फ़ासला कम नहीं हुआ। वह और तेज़ चला और तब भी कम नहीं हुआ, और यह उस वक़्त उसे अजीब नहीं लगा, क्योंकि अर्थी के साथ चलने वाले तेज़ चलते हैं और अकेला आदमी उन्हें पकड़ नहीं पाता।
फिर उसे लगा कि उसके पीछे कोई चल रहा है।
पैरों की आवाज़ नहीं थी। रास्ता कच्चा था और उस पर किसी के भी पैरों की आवाज़ ठीक से नहीं आती। जो चीज़ थी वह यह थी कि उसके अपने क़दमों की आवाज़ हर बार दो बार सुनाई देती थी। एक बार जब पैर पड़ता, और एक बार उसके तुरंत बाद, बहुत हल्की।
हरिया ने रुककर देखने के बारे में नहीं सोचा। वह चलता रहा और उसने आगे देखना जारी रखा, और उसे यह भी मालूम था कि जिस चीज़ का उसने जवाब दे दिया है, उससे अब वह जान-पहचान वाला हो चुका है।
घाट पर पहुँचकर वह भीड़ में घुस गया और सबसे बीच में जाकर खड़ा हुआ। किसी ने उससे कुछ नहीं पूछा। दाह-संस्कार में सब अपने आप में रहते हैं और किसी के चेहरे पर कोई ध्यान नहीं देता।
बाद में, बहुत बाद में, उसने एक बार यह हिसाब लगाने की कोशिश की कि आवाज़ किसकी हो सकती थी। जो लोग उस रात साथ थे, उनमें से कोई पीछे नहीं था। और जिस लहजे में उसका नाम लिया गया था, उस लहजे में उसे सिर्फ़ दो लोगों ने बुलाया था, और वे दोनों बरसों पहले जा चुके थे।
लौटते वक़्त वह सबसे आगे चला और उसने एक बार भी पीछे नहीं देखा। गाँव पहुँचकर, अपनी गली में मुड़ते हुए, उसे अपने क़दमों की आवाज़ फिर सुनाई दी। इस बार एक ही बार सुनाई दी।
उसने किसी को यह बात नहीं बताई। जिस चीज़ को गाँव ने कभी माना नहीं, उसे मानने वाला पहला आदमी बनना आसान नहीं होता।
पर उस दिन के बाद वह शाम को जल्दी घर लौटने लगा। खेत से जल्दी, बाज़ार से जल्दी, बारात से भी जल्दी। लोगों ने पहले मज़ाक़ किया, फिर पूछना छोड़ दिया, और फिर, बिना किसी बात के, एक-एक करके वे भी जल्दी लौटने लगे।
आदतें इसी तरह फैलती हैं, बिना बताए, बिना माने। कुछ महीनों में गाँव की गलियाँ सूरज डूबने से पहले ख़ाली हो जाने लगीं और इसकी वजह किसी ने किसी से नहीं पूछी। हरिया से भी नहीं।