कविता रात को सोने से डरती थी। यह डर किसी एक घटना से शुरू नहीं हुआ था। जब से उसे याद है, तब से है। अँधेरा होते ही उसे लगने लगता कि कमरे में कोई और भी है। कभी हल्की आहट। कभी चादर के सरकने जैसी आवाज़। वह पूरी रात जागने की कोशिश करती और हर बार हार जाती। सुबह माँ पूछतीं तो वह कह देती कि ठीक से सोई।

वे उस मकान में तब आए थे जब कविता चार साल की थी। नीचे का हिस्सा उनका था और ऊपर का बंद रहता था। मकान मालिक शहर में रहते थे और साल में एक बार किराया लेने आते थे। ऊपर जाने की सीढ़ी बाहर की तरफ़ से थी और उस पर एक ताला पड़ा रहता था।

आवाज़ कुर्सी की थी। लकड़ी की कुर्सी को पक्के फ़र्श पर घसीटने की, थोड़ी देर की, फिर बंद। यह आवाज़ ऊपर से आती थी। कविता ने इसे इतनी बार सुना था कि अब वह इससे नहीं डरती थी। वह इस बात से डरती थी कि यह हर रात आती थी।

माँ ने कहा कि ऊपर कबूतर हैं। भाई ने कहा कि पुराने मकानों में लकड़ी रात को चटकती है। दोनों बातें ठीक थीं। दोनों में से किसी से यह नहीं समझाया जा सकता था कि आवाज़ हर बार एक ही जगह से, एक ही तरह की और एक ही देर तक क्यों होती है।

नींद न आने का असर रात में नहीं दिखता, दिन में दिखता है। कविता क्लास में सबसे पीछे बैठती थी और वहाँ से बोर्ड कम दिखता था, पर उसे इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता था, क्योंकि पीछे बैठने पर आँख लग जाए तो कोई टोकता नहीं। नंबर धीरे-धीरे नीचे आते गए और घर में इसकी वजहें ढूँढ़ी जाती रहीं, और जो असल वजह थी वह किसी को कभी नहीं सूझी।

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सत्रह की उम्र में उसके पास एक फ़ोन आ गया और उसके साथ एक घड़ी। उसने एक रात समय देखा। दो बजकर चालीस मिनट। दूसरी रात भी वही। तीसरी रात वह जागती रही और दो बजकर उनतालीस पर उसने फ़ोन हाथ में उठा लिया।

वह मिनट चूका नहीं। ग्यारह रात तक नहीं चूका। कविता ने हर रात का समय लिखा और ग्यारहवीं रात के बाद लिखना छोड़ दिया, क्योंकि लिखने से कुछ बदल नहीं रहा था। जो बदला वह इतना था कि अब उसे नींद और भी कम आती थी।

बारहवीं रात आवाज़ नहीं आई। कविता दो बजकर चालीस पर उठकर बैठ गई और सुनती रही। तीन बजे तक कुछ नहीं हुआ। साढ़े तीन तक भी नहीं। यह पहली रात थी जब उसे सचमुच डर लगा।

उसके बाद तीन रातें और गुज़रीं और आवाज़ एक बार भी नहीं आई। कविता ने पहले यही सोचा कि जो भी था वह ख़त्म हो गया, और उसे इस बात से चैन मिलना चाहिए था। चैन नहीं मिला। जो चीज़ तेरह बरस से हर रात एक ही मिनट पर होती आई हो, उसका अचानक बंद हो जाना उसके होते रहने से ज़्यादा डरावना होता है।

सुबह उसने माँ से ऊपर की चाबी माँगी। माँ ने कहा कि चाबी मकान मालिक के पास रहती है। कविता ने कहा कि ताला पुराना है। माँ ने उसकी तरफ़ देखा और थोड़ी देर बाद सिर्फ़ इतना बोलीं कि दिन में जाना और अकेले मत जाना।

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वह अकेले ही गई, और दिन में नहीं। उसी दिन शाम को गई, क्योंकि शाम को भाई घर पर नहीं होता था और वह नहीं चाहती थी कि कोई साथ हो। ताला एक ही झटके में खुल गया। दरवाज़ा अंदर की तरफ़ खुला और उसके साथ धूल की एक परत नीचे गिरी।

ऊपर एक ही कमरा था और उसमें सामान के नाम पर तीन चीज़ें थीं। एक टूटी अलमारी। एक रोशनदान, जिस पर जाली लगी थी। और लकड़ी की एक कुर्सी।

कुर्सी कमरे के बीचोंबीच रखी थी। फ़र्श पर उसके चारों पायों के निशान बने हुए थे, घिसे हुए और गहरे, इस तरह जैसे उसे बरसों तक एक ही जगह से थोड़ा खिसकाया गया हो और फिर वापस उसी जगह रखा गया हो। कविता ने ऊपर देखा। छत में, ठीक कुर्सी के ऊपर, लोहे का एक कुंडा गड़ा हुआ था।

वह कुंडा पंखे का नहीं था। पंखे का कुंडा भी कमरे के बीच में ही होता है, पर उसमें बिजली का तार आता है। इसमें कोई तार नहीं आता था और न कभी आया था, क्योंकि उस तरफ़ की दीवार पर कोई बटन नहीं था। कविता कुछ देर वहीं खड़ी रही। फिर वह नीचे उतर आई।

उस रात उसने माँ से पूछा कि ऊपर पहले कौन रहता था। माँ ने कहा, मकान मालिक की बड़ी बहन। कविता ने पूछा कि वे कहाँ गईं। माँ ने चौके में बर्तन रखते हुए कहा कि यह उनके यहाँ आने से पहले की बात है और उन्हें कुछ नहीं मालूम। कविता ने दोबारा नहीं पूछा।

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अगली सुबह वह फिर ऊपर गई और साथ में सरिया ले गई। कुंडा पक्का गड़ा हुआ था। उसे निकालने में उसे एक घंटे से ज़्यादा लगा और छत का पलस्तर टुकड़ों में गिरता रहा, उसके कंधों पर, बालों में, कुर्सी पर। जब वह निकल आया तो कविता उसे लेकर नीचे आई और शाम को कबाड़ वाले को दे दिया। पैसे उसने नहीं लिए।

उस रात कविता सो गई। वह नींद इतनी गहरी थी कि सुबह नौ बजे तक वह उठी नहीं। माँ दरवाज़े तक दो बार आईं और हर बार बिना आवाज़ किए लौट गईं। ऊपर वाले कमरे में कुर्सी अब भी उसी जगह रखी है, और छत में एक गड्ढा है जिस पर किसी ने पलस्तर नहीं किया।