उस वीरान घर की सबसे अजीब बात उसके जाले थे। हर पुराने घर में जाले होते हैं। इस घर में वे हर साल और घने हो जाते थे, जबकि वहाँ कोई मकड़ी दिखती नहीं थी। किसी ने कभी उन्हें बुनते नहीं देखा। बस अगली बार जब कोई खिड़की से भीतर झाँकता, तो पहले से ज़्यादा जाले होते।
जाले किसी और को गिनने का शौक़ नहीं था। शिवदयाल को उन्हें गिनना नहीं, हटाना पड़ता था, और यही फ़र्क़ है।
घर रघुनंदन के परिवार का था। वे तीन पीढ़ी पहले यहीं रहते थे और अब कानपुर में रहते हैं। ताला उनका है, चाबी शिवदयाल के पास है, और बदले में उसे साल के तीन सौ रुपये मिलते हैं। काम इतना है कि साल में तीन-चार बार घर खोलो, झाड़ो, और बरसात के बाद देख लो कि छत कहीं से टपकी तो नहीं।
यह कोई डरावना काम नहीं है। बंद घर हर गाँव में हैं और उनकी चाबी किसी न किसी के पास रहती है। शिवदयाल यह ग्यारह साल से कर रहा था।
सावन के बाद वाली सफ़ाई सबसे ज़रूरी होती है, क्योंकि उसी में पता चलता है कि पानी कहाँ से आया। क्वार लगते ही वह ताला खोलता, दोनों दरवाज़े और सब खिड़कियाँ खोल देता, और झाड़ू लेकर ऊपर से शुरू करता। छत, फिर दीवारें, फिर फ़र्श।
वह पूरा झाड़ता था। यह उसकी आदत थी और इसी आदत की वजह से उसे वह चीज़ दिखी जो और किसी को नहीं दिख सकती थी। जो आदमी जाले हटाता नहीं, उसे यह अंदाज़ा भी नहीं होता कि दो महीने में कितने बनते हैं।
उस बरस क्वार में उसने ताला खोला और भीतर जाकर रुक गया।
जाले पूरे घर में थे। हमेशा से ज़्यादा। पर बीच वाले कमरे से पिछले दरवाज़े तक वे टूटे हुए थे। टूटे हुए यानी हटाए नहीं गए थे, बस बीच में से फटे हुए थे, एक सीध में, जैसे कोई उनमें से होकर निकला हो।
रास्ता एक ही चौड़ाई का था। और वह ऊपर से टूटा था, कमर से थोड़ा ऊपर, और नीचे की तरफ़ जाले जैसे के तैसे थे।
पहला ख़याल वही आया जो किसी को भी आता। कोई भीतर आ रहा है।
यह ख़याल बुरा नहीं, अच्छा था। घर में घुसना समझ में आने वाली बात है। शिवदयाल ने दोनों ताले देखे। दोनों बंद थे और दोनों उसी के लगाए हुए थे। पिछले दरवाज़े की चौखट पुरानी थी, इसलिए उसने अपने पैसे से एक नया ताला लाकर वहाँ लगा दिया और चाबी अपनी जेब में रखी।
अगली सफ़ाई फागुन में थी। नया ताला वैसा का वैसा था, बंद, और उस पर ज़ंग तक नहीं आई थी। भीतर वही रास्ता था, बीच वाले कमरे से पिछले दरवाज़े तक, उसी चौड़ाई का, उसी ऊँचाई पर।
शिवदयाल ने उस दिन घर तीन बार देखा। फ़र्श पर धूल थी और उस पर कोई निशान नहीं था। कोई चीज़ खिसकी हुई नहीं थी। खिड़कियों की कुंडियाँ भीतर से लगी थीं।
अगली बार वह रात को गया।
यह उसने सोचकर किया था और किसी को बताकर नहीं गया था, क्योंकि बताता तो लोग साथ आते और साथ आने वालों के होने से चीज़ें नहीं होतीं। वह ग्यारह बजे गया, लालटेन लेकर, और बीच वाले कमरे में दीवार से पीठ लगाकर दो घंटे बैठा रहा।
दो घंटे में कुछ नहीं हुआ। कोई आवाज़ नहीं, कोई ठंडक नहीं, कुछ भी नहीं। एक बार चूहा दौड़ा, और चूहा फ़र्श पर दौड़ा।
वह लौट आया और उस रात उसे अच्छी नींद आई, क्योंकि जो कुछ नहीं होता वह डर को थोड़ी देर के लिए कम कर देता है।
उसके बाद वाली सफ़ाई जेठ में पड़ी।
रास्ता उस दिन भी था। और उस दिन उसके साथ एक और रास्ता था।
दूसरा उसी दिशा में जाता था, बीच वाले कमरे से पिछले दरवाज़े तक, पहले वाले के बराबर-बराबर। फ़र्क़ दो थे। वह पतला था। और वह नीचे था, घुटनों के आसपास।
शिवदयाल ने उस दिन झाड़ू नहीं उठाई। उसने खिड़कियाँ बंद कीं, दोनों ताले लगाए, और चाबियाँ लेकर घर चला आया।
बाहर आकर उसने ताला लगाया और कुछ देर वहीं खड़ा रहा। दोपहर के तीन बजे थे। गली में दो बच्चे खेल रहे थे। उसने उन्हें देखा और आगे बढ़ गया। बताने को था भी क्या। जो उसने देखा था वह जाला था, और जाले के बारे में आदमी कहे भी तो क्या कहे।
रघुनंदन का लड़का उस साल दशहरे पर आया था। शिवदयाल ने उसे दोनों चाबियाँ लौटा दीं और कहा कि अब उससे यह नहीं हो पाएगा, उम्र हो गई है। उसने उस साल के पैसे नहीं लिए। लड़के ने ज़्यादा पूछताछ नहीं की, क्योंकि गाँव में चाबी रखने वाले बदलते रहते हैं।
नया आदमी मुनीर हुआ, जो उसी गली के आख़िर में रहता है। शिवदयाल ने उसे काम समझाया और एक बात पर ज़ोर दिया। हर बार पूरा घर झाड़ना है। फ़र्श से छत तक, हर कमरा, चाहे जाला दिखे या न दिखे।
मुनीर ने पूछा कि इतना क्यों। शिवदयाल ने कहा कि इसलिए कि अगली बार तुम्हें पता चल सके।
तीन सौ रुपये साल के अब मुनीर को मिलते हैं। रघुनंदन के परिवार ने रक़म बढ़ाई नहीं और मुनीर ने माँगी नहीं। काम वही है, और काम में सचमुच कुछ ख़ास है भी नहीं।
मुनीर मान गया। चार साल हो गए हैं। मुनीर हर बार पूरा घर झाड़ता है, फ़र्श से छत तक, और हर बार भीतर घुसते ही सबसे पहले यह देखता है कि पिछली बार का झाड़ा हुआ कहाँ तक टिका है।