बाढ़ आने से दो दिन पहले चींटियाँ ऊपर चढ़ने लगी थीं। बूढ़े हाथी ने यह देखा और बात उसकी समझ में आ गई, पर उसने किसी से कहा नहीं। जंगल में वह सबसे बड़ा था और सबसे भारी भी, और उसे पता था कि भारी होने का मतलब ताक़तवर होना नहीं होता। उसका बच्चा हर वक़्त उसके साथ चलता था और हर चीज़ पर सवाल पूछता रहता था। उस दिन उसने पूछा कि चींटियाँ पेड़ पर क्यों चढ़ रही हैं। हाथी ने कहा कि उन्हें कुछ पता होगा जो हमें नहीं पता।
उसने यह बात दो दिन अपने पास रखी, और इसकी वजह यह नहीं थी कि वह बताना नहीं चाहता था। वजह यह थी कि चींटियों के बारे में कही गई बात कोई नहीं सुनता। जंगल में बात तभी मानी जाती है जब कहने वाले के पास उसका कोई सबूत हो, और चींटियाँ सबूत नहीं मानी जातीं।
इसलिए उसने कहा नहीं, किया। उन दो दिनों में वह दूर वाली खारी मिट्टी तक दो बार गया, जहाँ वह महीने में एक बार जाता था। उसने ज़्यादा खाया। और उसने बच्चे को उस तरफ़ जाने से रोक दिया जहाँ नाले का मुँह था, बिना यह बताए कि क्यों।
पानी रात में आया और उस तरफ़ से आया जिधर से किसी ने सोचा नहीं था। नदी उस साल पीछे से घूमकर आई, खेतों की तरफ़ से, और जब तक आवाज़ सुनाई दी तब तक वह पेड़ों के बीच थी।
पानी पहले पैरों तक आया। फिर घुटनों तक। रात होते-होते वह पेट तक पहुँच गया। हाथी को चलने में ख़ास दिक़्क़त नहीं थी। पर बच्चा हर कुछ क़दम पर लड़खड़ा जाता। हाथी हर बार उसे सूँड़ से सँभाल लेता। चारों तरफ़ आवाज़ें थीं। पक्षियों की। बंदरों की। और कुछ ऐसी भी, जो हाथी ने अपनी पूरी उम्र में कभी नहीं सुनी थीं।
बच्चा चलते हुए सवाल पूछता रहा। कितनी देर और। पानी कहाँ तक आएगा। हम किधर जा रहे हैं। हाथी हर सवाल का जवाब देता रहा, पर छोटे जवाब देता रहा, क्योंकि उसका ध्यान पैरों के नीचे था। पानी में चलते हुए ज़मीन आँख से नहीं, पैर से देखी जाती है।
रात भर पानी चढ़ता रहा। सुबह तक रास्ता ग़ायब हो चुका था। जहाँ कल घास थी, वहाँ अब सिर्फ़ पानी था। हाथी रुक गया। उसने चारों तरफ़ देखा। कोई निशान नहीं पहचाना। बच्चा उसकी अगली टाँग से सटकर खड़ा हो गया और चुप हो गया। यह पहली बार था जब उसने अपने पिता को रुकते देखा था।
फिर उसने वह किया जो बच्चे को सबसे बुरा लगा। वह मुड़ा और उसी रास्ते वापस चलने लगा जिससे वे आए थे।
बच्चा रोने लगा। पानी चढ़ रहा था और वे नीचे की तरफ़ लौट रहे थे, और यह बात किसी भी तरह से ठीक नहीं लगती। हाथी ने उसे समझाया नहीं। वह चलता रहा और बच्चे को साथ खींचता रहा।
वह उस जगह तक लौटा जहाँ उसे आख़िरी बार पक्का पता था कि वह कहाँ है। एक गिरा हुआ महुआ, जिसका तना बीच से फटा हुआ था। वहाँ से उसने पानी को देखा, यह देखने के लिए नहीं कि पानी कितना है, बल्कि यह कि वह किस तरफ़ को बह रहा है। पानी हमेशा नीचे की तरफ़ जाता है। जिधर से वह आ रहा है, उधर ऊँचाई है।
आधी रात इसमें चली गई। बच्चे के लिए वह आधी रात बरबाद हुई थी। बाद में, बहुत बाद में, उसे यह बात दिखी। उस आधी रात के बिना वे दोनों उसी तरफ़ चलते रहते जिधर पानी गहरा होता जा रहा था।
रास्ते में उन्होंने जिन जानवरों को उठाया, उनमें एक बूढ़ी लोमड़ी थी जो चल नहीं पा रही थी, दो बंदर के बच्चे जिनकी माँ कहीं छूट गई थी, और एक साही, जिसे पीठ पर बिठाना आसान नहीं था। हाथी के बच्चे ने पूछा कि इतना बोझ लेकर वे ऊपर तक कैसे पहुँचेंगे। हाथी ने कहा कि उसे नहीं पता, पर छोड़कर चले जाएँ और पहुँच भी जाएँ, तो पहुँचने का फ़ायदा क्या।
बोझ लेने के बाद एक चीज़ बदल गई, और वह चीज़ यह थी कि सूँड़ अब ख़ाली नहीं थी। साही सूँड़ के पास नहीं बैठ सकता था, इसलिए वह पीठ पर था, और लोमड़ी को सूँड़ के सहारे टिकाना पड़ रहा था। बंदर के बच्चे कान पकड़कर लटके थे।
यानी अब जब बच्चा लड़खड़ाता, तो उसे सँभालने के लिए कुछ नहीं था।
वह पहली बार गिरा तो हाथी रुक गया, पर उसने उसे उठाया नहीं। वह उठा। दूसरी बार वह गहरे में गिरा और उसका सिर पानी के नीचे चला गया, और उस बार भी वह ख़ुद ही उठा, खाँसता हुआ। तीसरी बार वह गिरा ही नहीं। उसने चलना बदल लिया था, पैर घसीटकर, टटोलकर, वैसे ही जैसे उसका बाप चल रहा था।
ऊँचाई तब मिली जब उजाला हो चुका था। ज़मीन पहले टख़नों तक हुई, फिर सूखी। किसी ने कुछ कहा नहीं। लोमड़ी को उतारा गया, साही को उतारा गया, बंदर के बच्चे कान से नहीं छूटे और उन्हें छुड़ाना पड़ा। हाथी बैठ नहीं सका, क्योंकि बैठने के बाद उठना मुश्किल होता।
पानी उतरने में कई दिन लगे। जब जंगल दोबारा दिखने लगा तो वह पहले जैसा नहीं था। कई पेड़ गिर चुके थे और कुछ रास्ते ग़ायब हो गए थे। जानवर धीरे-धीरे नीचे लौटे और अपने-अपने ठिकाने ढूँढ़ने लगे। बंदर के दोनों बच्चों की माँ तीसरे दिन मिली, नदी के उस पार। लौटकर वह किसी से नहीं बोली, बस हाथी के पास जाकर काफ़ी देर चुपचाप खड़ी रही।
अगली बरसात से पहले एक दोपहर हाथी के बच्चे ने ज़मीन पर चींटियों की एक लंबी कतार देखी, जो ऊपर की तरफ़ जा रही थी। उसने अपने पिता को नहीं बुलाया। वह ख़ुद उसी तरफ़ चल दिया जिधर जंगल ऊँचा था, और रास्ते में जो भी मिला, उससे कहता गया कि ऊपर चलो।