गजराज हाथी जब जंगल में चलता, तो उसके पैरों की आवाज़ दूर तक जाती थी। छोटे जानवर उसे सुनकर रास्ते से हट जाते। यह डर की वजह से नहीं था, बस आदत थी। गजराज ने आज तक किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया था। पर उसका आकार उसकी नीयत से पहले पहुँच जाता था, और इस बात का उसे कोई इलाज नहीं मिला था।

जेठ की गर्मी में जंगल का बड़ा तालाब सिकुड़कर बीच के हिस्से भर रह गया। बाक़ी सब कीचड़ थी। पानी अब भी था, पर उस तक पहुँचने के लिए कीचड़ पार करनी पड़ती थी, और छोटे जानवरों के लिए यह आसान नहीं था। उन्होंने अपना तरीक़ा निकाल लिया था। किनारे पर एक चौड़ा पत्थर पानी में उतरा हुआ था और वे उसी पर से झुककर पीते थे, जहाँ पानी साफ़ रहता था। यह तरीक़ा उस दिन तक ठीक चलता रहा जब तक गजराज पीने नहीं आया।

गजराज कीचड़ में उतरता था, क्योंकि उसे उतरना ही पड़ता था। पत्थर उसका वज़न नहीं उठाता। उसके पैर घुटनों तक धँसते और नीचे बैठी सारी मिट्टी ऊपर आ जाती। वह पीकर चला जाता, और उसके जाने के बाद तीन-चार घंटे तक पानी भूरा रहता। खरगोश फुदकू ने एक दिन बैठकर गिना। गजराज दिन में चार बार आता था। चार बार, तीन-तीन घंटे। छोटे जानवरों के हिस्से में साफ़ पानी बचता ही नहीं था।

किसी ने गजराज से यह बात नहीं कही। कहने में डर नहीं था, झिझक थी। वह कभी किसी से ऊँची आवाज़ में बोला नहीं था और उसने आज तक किसी का नुक़सान नहीं किया था। ऐसे जानवर से यह कहना कि तुम्हारे आने से नुक़सान होता है, आसान नहीं होता। गजराज को ख़ुद भी पता नहीं था। वह पानी पीकर लौटता, रास्ते में जानवर हट जाते, और वह इसे वही पुरानी आदत समझकर आगे बढ़ जाता था। एक-दो बार उसने पीछे मुड़कर तालाब की तरफ़ देखा भी। पानी भूरा था, पर उसे यह याद नहीं आया कि आने से पहले वह कैसा था।

उन दिनों छोटे जानवरों ने पीने का वक़्त बदलकर देखा। वे भोर में जाने लगे, गजराज के पहले चक्कर से पहले। यह दो दिन चला। तीसरे दिन गजराज भी भोर में आ गया, क्योंकि गर्मी में प्यास सबको जल्दी उठा देती है।

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गर्मी बढ़ती गई। तीतर के दो बच्चे एक ही दोपहर में मर गए। गिलहरियाँ तालाब छोड़कर दूर वाले नाले तक जाने लगीं, जो ख़ुद सूख रहा था। फुदकू ने हिसाब लगाया कि इस रफ़्तार से नाला दस दिन और चलेगा। उसके बाद कुछ नहीं था। यह हिसाब उसने अपने तक रखा, क्योंकि बताने से पानी नहीं आता।

आख़िर एक दिन फुदकू ने कह ही दिया। गजराज ने पूरी बात सुनी और उस दिन पानी नहीं पिया। अगली सुबह वह बहुत धीरे उतरा, एक-एक पैर सँभालकर रखते हुए। मिट्टी फिर भी ऊपर आ गई। उसने दूसरी तरफ़ से उतरकर देखा, जहाँ कीचड़ ज़्यादा गहरी थी, और पानी पहले से ख़राब हुआ। तीसरे दिन उसने पीना बंद कर दिया। पूरे दिन कुछ नहीं। दोपहर तक उसके कान लटक गए और चाल लड़खड़ाने लगी, क्योंकि हाथी को दिन भर में बहुत पानी चाहिए होता है।

उसी दोपहर फुदकू गजराज के पीछे-पीछे चल रहा था, इस डर से कि वह कहीं गिर न जाए। रास्ते में वह अचानक रुक गया। गजराज के पैरों के निशान गहरे थे, कटोरी जैसे, और पिछली रात की हल्की बूँदाबाँदी का पानी उनमें भरा हुआ था। ऊपर की मिट्टी रात भर में नीचे बैठ चुकी थी। नीचे का पानी साफ़ था। फुदकू ने झुककर पिया। पानी ठंडा था। तालाब के पानी से भी ठंडा, क्योंकि निशान छाँव में थे और गहरे थे। फुदकू वहीं बैठकर उन निशानों को देखता रहा। एक निशान में इतना पानी था कि उसके जैसे चार खरगोश पी लेते।

फुदकू दौड़कर आगे गया और गजराज को रोका। उसने उससे एक काम करने को कहा जो सुनने में बेवक़ूफ़ी लगता था: तालाब से दूर, छाँव वाली नरम ज़मीन पर, एक सीधी लाइन में चलना। बीस क़दम। फिर वापस उसी लाइन पर, ठीक उन्हीं निशानों में पैर रखते हुए, ताकि गड्ढे और गहरे हो जाएँ। गजराज ने कुछ जानना नहीं चाहा। उस वक़्त उसमें इतनी ताक़त भी नहीं थी। वह चला। ज़मीन नरम थी और निशान गहरे बने। लौटते हुए उसने दो बार पैर ग़लत जगह रखा और फुदकू ने उसे टोक दिया।

रात को पानी उन गड्ढों में जमा हुआ और सुबह तक मिट्टी नीचे बैठ गई। फुदकू सबसे पहले पहुँचा, फिर गिलहरियाँ, फिर तीतर, फिर वे चिड़ियाँ जो कीचड़ में उतर ही नहीं सकती थीं। बीस छोटे-छोटे कुंड, एक कतार में, छाँव के नीचे। बड़े जानवरों ने उनकी तरफ़ देखा तक नहीं, क्योंकि हर कुंड में एक-दो घूँट पानी था और उसके लिए घुटने मोड़ने पड़ते। जो पानी हाथी के किसी काम का नहीं था, वही खरगोश का पूरा दिन था। गजराज उस दिन तालाब में उतरा और जी भरकर पिया, और उस दिन किसी को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा।

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बारिश आने तक वह कतार चलती रही। गजराज हर दूसरे दिन उसी लाइन पर बीस क़दम चलता और लौट आता। इससे ज़्यादा उसने कभी नहीं किया, और उससे ज़्यादा की ज़रूरत भी कभी नहीं पड़ी। अब भी जब वह जंगल में चलता है तो उसके पैरों की आवाज़ दूर तक जाती है, और छोटे जानवर उसे सुनकर रास्ते से हट जाते हैं। यह आदत नहीं बदली। बस अब वे हटकर उसी के छोड़े हुए निशानों में से पानी पीते हैं।