बैजू और लछमन साथ पढ़े थे, एक ही बेंच पर, और आठवीं के बाद भी साथ ही रहे, हालाँकि तब तक यह तय हो चुका था कि पढ़ने में लछमन तेज़ है। यह बात दोनों जानते थे और दोनों ने कभी इस पर बात नहीं की। ऐसी बातों पर दोस्त बात नहीं करते।

बैजू का घर बाज़ार की तरफ़ था और लछमन का उससे उल्टी दिशा में, इसलिए चाय की दुकान बीच में पड़ती थी और वही उनकी जगह बन गई थी। दुकान वाला उन्हें बिना पूछे दो चाय दे देता था। पंद्रह साल में यह इतनी पक्की बात हो चुकी थी कि किसी दिन एक न आए तो दुकान वाला दूसरे से पूछ लेता था कि क्या हुआ।

क़स्बे में सरकारी नौकरी का मतलब एक ही होता है, और वह है इंतज़ार। दोनों ने चार साल इंतज़ार किया और उन चार सालों में तीन बार फ़ॉर्म भरे। तीनों बार दोनों ने साथ भरे, साथ फ़ोटो खिंचवाई, और साथ जाकर जमा किए, क्योंकि अकेले जाने में डाकघर तक का रास्ता भी लंबा लगता है।

फ़ॉर्म भरने की उस पूरी कवायद में सबसे बुरा हिस्सा इंतज़ार का नहीं था। बुरा हिस्सा यह था कि इसमें दोनों की उम्र निकल रही थी और घर वालों के सवाल बदलते जा रहे थे। पहले पूछा जाता था कि फ़ॉर्म भरा या नहीं। फिर पूछा जाने लगा कि कब तक करोगे यह सब।

चौथी बार जो निकला, उसमें जगह एक थी। पूरे ज़िले के लिए एक।

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फ़ॉर्म भरते वक़्त दोनों ने इस पर मज़ाक़ किया। बैजू ने कहा कि जो निकलेगा वह दूसरे को दावत देगा, और लछमन ने कहा कि दावत तो ठीक है, नौकरी आधी-आधी नहीं हो सकती। दोनों हँसे। यह हँसी सच्ची थी और यही सबसे अजीब बात है, कि उस वक़्त वह सचमुच सच्ची थी।

नतीजा जनवरी में आया, अख़बार में, तीसरे पन्ने पर। सूची छोटी थी। लछमन का नाम उसमें था।

बैजू उस दिन उसके घर सबसे पहले पहुँचा। उसने मिठाई ली, लछमन की माँ के पैर छुए, और आधे घंटे वहाँ बैठा भी। लौटते हुए उसे लगा कि वह ठीक-ठाक निभा आया है, और यह सोचना ही उसे बुरा लगा, क्योंकि दोस्त के घर जाकर निभाना नहीं पड़ता।

अगले हफ़्ते वह नहीं गया। उससे अगले हफ़्ते भी नहीं।

उसने ख़ुद से इसकी वजहें गिनाईं और वजहें मौजूद भी थीं। घर पर काम था। तबीयत ठीक नहीं थी। ऐसे वक़्त में जाकर क्या कहेगा, बधाई तो दे ही चुका है। हर वजह अलग से सही थी और तीनों मिलकर झूठ बन जाती थीं।

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असल बात वह थी जिसे कहने के लिए कोई शब्द नहीं है जो ओछा न लगे। बैजू को अपने दोस्त के लिए ख़ुशी थी। उसे यह भी लग रहा था कि उसके साथ कुछ ग़लत हुआ है। ये दोनों बातें एक साथ रहती थीं और दूसरी वाली पहली को खा जाती थी।

लछमन को यह समझ में आ गया। चाय की दुकान पर वह रोज़ उसी वक़्त बैठता था जिस वक़्त दोनों बरसों से बैठते आए थे, और बैजू उस वक़्त वहाँ से नहीं निकलता था। पहले हफ़्ते यह इत्तेफ़ाक़ लगा। तीसरे हफ़्ते तक यह इत्तेफ़ाक़ नहीं रह गया था।

यहाँ लछमन दो में से एक काम कर सकता था। वह जाकर पूछ सकता था कि क्या बात है, जिसका जवाब बैजू के पास नहीं होता और दोनों में से किसी को उस सवाल के बाद राहत नहीं मिलती। या वह वही करता रह सकता था जो वह करता आया था।

उसने दूसरा चुना, और यही इस कहानी का पूरा हिस्सा है।

वह रोज़ उसी वक़्त उसी दुकान पर बैठता रहा। वह दो चाय बोलता रहा, जैसे हमेशा बोलता था। दूसरी चाय सामने वाले स्टूल पर रखी रहती और ठंडी हो जाती, और दुकान वाला उसे उठाकर ले जाता और पैसे दोनों के लेता।

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यह चार महीने चला। दुकान वाले ने एक-दो बार कुछ कहना चाहा और फिर नहीं कहा। क़स्बे की दुकानों पर ऐसी चीज़ें सब देखते हैं और कोई कुछ बोलता नहीं।

बीच में एक बार दोनों बाज़ार में आमने-सामने पड़ गए। लछमन ने पूछा कि कैसे हो। बैजू ने कहा कि ठीक हूँ। इसके आगे न लछमन ने कुछ जोड़ा और न बैजू ने, और दोनों अपने-अपने रास्ते चले गए। उस दिन लछमन ने शाम को भी दो चाय ही बोलीं।

मई में बैजू का चयन हो गया, दूसरे विभाग में, कम तनख़्वाह पर, और उसके लिए क़स्बे से बाहर जाना पड़ता था। ख़बर उसे दोपहर में मिली।

वह शाम को दुकान पर आया।

लछमन पहले से बैठा था और उसके सामने वाले स्टूल पर एक चाय रखी थी, जो उस वक़्त तक ठंडी हो चुकी थी। बैजू ने वह उठाई और पी ली। ठंडी चाय अच्छी नहीं लगती और उसने मुँह भी बनाया। लछमन ने दुकान वाले की तरफ़ देखकर दो उँगलियाँ उठा दीं।

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इसके बाद जो बात हुई वह नौकरी की नहीं थी, और उस दिन के बाद भी कभी नहीं हुई। उन चार महीनों की बात दोनों में से किसी ने कभी नहीं छेड़ी। बैजू ने माफ़ी नहीं माँगी, और लछमन ने यह जताया नहीं कि उसने कुछ निभाया है।

दुकान वाला अब भी उन्हें बिना पूछे दो चाय दे देता है। फ़र्क़ बस इतना पड़ा है कि अब दोनों गरम की गरम पी जाती हैं।