झील के किनारे हर साल एक मेला लगता था, और उसका नाम था शांत झील का मेला। नाम अजीब था, क्योंकि उस दिन वहाँ ज़रा भी शांति नहीं होती थी। साल में एक बार जंगल के सारे जानवर, पक्षी और आसपास के गाँव के बच्चे उसी किनारे पर इकट्ठा होते थे।
मेले का सबसे अच्छा हिस्सा यह था कि वहाँ कोई मुक़ाबला नहीं होता था। हर कोई अपनी कोई एक चीज़ दिखाता था, और बाकी सब देखते थे। किसी को नंबर नहीं मिलते थे। किसी को हराया नहीं जाता था।
बबलू एक नन्हा खरगोश था और यह उसका पहला मेला था। जब से उसने सुना था, वह उत्साह और घबराहट के बीच झूल रहा था। हाथी अपनी ताक़त दिखाएगा, बंदर अपनी कलाबाज़ियाँ, कोयल अपना गाना। बबलू सोचता रहा कि वह क्या दिखाएगा। उसे कुछ नहीं आता था।
रंग-बिरंगा दिन
उसने कई चीज़ें आज़माईं। उसने ऊँचा कूदने की कोशिश की और गिर पड़ा। उसने गाने की कोशिश की और उसकी अपनी आवाज़ उसे ही अच्छी नहीं लगी। उसने तेज़ दौड़कर देखा, पर जंगल में उससे तेज़ दौड़ने वाले कई थे।
मेले के दिन वह सबसे आख़िर में पहुँचा, इस उम्मीद में कि शायद किसी की नज़र न पड़े। पर किनारा भरा हुआ था। हाथी चल रहा था और उसके हर क़दम पर ज़मीन हिल रही थी। बंदर डालियों पर झूल रहे थे। पक्षी अपने रंग-बिरंगे पंख फैलाकर एक कतार में उड़े और सबने ताली बजाई।
बबलू एक पत्थर के पीछे बैठ गया। उसे लगा कि वह यहाँ बेकार आया।
वहीं बैठे-बैठे उसने बाकी सबको देखा। कोयल ने गाया और सब चुप होकर सुनते रहे। एक बूढ़े कछुए ने बताया कि वह इस झील को साठ साल से जानता है, और उसने बताया कि किस साल पानी सबसे ज़्यादा चढ़ा था। मोर ने पंख फैलाए और बच्चों ने शोर मचाया। हर किसी के पास कुछ न कुछ था। बबलू ने अपने पंजे देखे और फिर पत्थर के और पीछे खिसक गया।
बुज़ुर्ग हाथी ने उसे देख लिया। वह धीरे-धीरे उसके पास आया और नीचे झुककर पूछा, 'तुम पीछे क्यों बैठे हो?' 'मेरे पास दिखाने को कुछ नहीं है।' हाथी ने कुछ पल सोचा। फिर बोला, 'मेरे पास भी नहीं था, पहली बार।' 'फिर आपने क्या किया?' 'मैं आगे आकर खड़ा हो गया। बस इतना ही।'
जब दोस्ती काम आई
बबलू आगे आ गया, पर किनारे पर ही रहा, जहाँ घास गीली थी और पानी पास था। वहाँ खड़े होकर उसे अच्छा लगा। थोड़ी देर बाद, बिना सोचे, उसने एक छोटी सी छलाँग लगाई। फिर दूसरी।
तीसरी छलाँग के बाद उसकी नज़र पानी पर पड़ी और वह रुक गया। झील एकदम शांत थी, और उसमें उसकी परछाईं बन रही थी। जब वह कूदता, परछाईं भी कूदती। जब वह रुकता, पानी की सतह पर छोटी-छोटी लहरें फैल जातीं और परछाईं दस टुकड़ों में बँट जाती, फिर वापस जुड़ जाती।
बबलू ने दोबारा कूदा, इस बार यह देखने के लिए कि क्या होता है। लहरें फिर फैलीं। किनारे पर बैठी एक गिलहरी ने यह देखा और बाकी को इशारा किया।
थोड़ी देर में कई जानवर पानी की तरफ़ देख रहे थे। बबलू कूदता रहा, कभी इधर, कभी उधर, और हर छलाँग पर पानी में गोल लहरें बनतीं और एक-दूसरे से टकरातीं। शाम की रोशनी उन लहरों पर पड़ रही थी। पूरी झील हिल रही थी और चमक रही थी।
जब बबलू थककर रुका, तो कुछ देर के लिए सब चुप रहे। फिर तालियाँ बजीं। बबलू ने चारों तरफ़ देखा। उसे समझ नहीं आया कि तालियाँ किसके लिए हैं।
'तुम्हारे लिए,' बुज़ुर्ग हाथी ने कहा। 'तुमने वह दिखाया जो हममें से किसी ने नहीं देखा था।' 'मैंने तो कुछ किया ही नहीं,' बबलू ने कहा। 'तुमने पानी को हिला दिया,' हाथी ने कहा। 'हम सब सालों से यहाँ आते हैं और किसी ने कभी झील की तरफ़ देखा ही नहीं।'
उस शाम मेला ख़त्म होने के बाद भी कई जानवर देर तक किनारे पर बैठे रहे। कोई कुछ नहीं कर रहा था। सब बस पानी देख रहे थे, जो अब फिर से शांत हो चुका था और जिसमें ऊपर के तारे उतर आए थे। बूढ़े कछुए ने कहा कि उसने साठ साल में यह पहली बार देखा है।
उसके बाद हर साल मेले में एक नया हिस्सा जुड़ गया। शाम ढलते ही सब किनारे पर बैठ जाते और कोई न कोई पानी में कूदता, और बाकी लहरों को फैलते हुए देखते रहते।
बबलू बड़ा हो गया, पर हर साल वह सबसे पहले उसी गीली घास वाले किनारे पर आकर खड़ा हो जाता था। और हर साल कोई नया छोटा जानवर पत्थर के पीछे बैठा मिलता, जिसे लगता कि उसके पास दिखाने को कुछ नहीं है। बबलू उसके पास जाता और वही कहता जो हाथी ने उससे कहा था।