झील गाँव से बीस मिनट की दूरी पर थी और उसके बारे में एक ही बात मशहूर थी। जो तली से पत्थर निकाल लाए, उसकी एक मन्नत पूरी होती है। पत्थर कोई भी चलेगा, पर तली का होना चाहिए, और तली गहरी थी। हर गर्मी में गाँव के बच्चे वहाँ जाते, कूदते, चिल्लाते, और शाम को ख़ाली हाथ लौट आते। किसी बड़े ने आज तक यह नहीं कहा था कि बात झूठी है। किसी बड़े ने यह भी नहीं कहा था कि सच है।

प्रीति नौ साल की थी और उसे तैरना नहीं आता था। यह गाँव में कोई छिपी हुई बात नहीं थी। बाकी बच्चे पाँच-छह साल में सीख जाते थे, पर प्रीति एक बार पानी में डूबते-डूबते बची थी और उसके बाद उसकी माँ ने उसे झील के पास जाने से मना कर दिया था। मना करने से जाना बंद नहीं हुआ। बस तैरना नहीं आया।

मन्नत उसने सोच रखी थी। किसी को बताती नहीं थी, क्योंकि बताने से मन्नत ख़राब हो जाती है, और यह बात भी उसी झील के साथ जुड़ी हुई थी। उस गर्मी उसने तय किया कि वह पत्थर निकालकर लाएगी। दिक़्क़त साफ़ थी। पत्थर तली में था, और तली तक जाने के लिए तैरना आना चाहिए था।

जब गलती समझ आई

गाँव में दो ही लोग ऐसे थे जो कहते थे कि उन्होंने तली से पत्थर निकाला है। एक थे बद्री चाचा, जो यह क़िस्सा हर बार थोड़ा अलग सुनाते थे। दूसरी थीं स्कूल की आया, जो बस इतना कहतीं कि हाँ, निकाला था, और आगे कुछ नहीं बतातीं। प्रीति को दूसरी वाली बात पर ज़्यादा भरोसा था।

उसने किनारे से शुरू किया, वहाँ से जहाँ पानी घुटनों तक आता था। पहले हफ़्ते वह बस इतना कर पाई कि साँस रोककर मुँह पानी में डाल ले। दूसरे हफ़्ते उसने आँखें खोलनी सीखीं। पानी के अंदर सब कुछ हरा और धुँधला दिखता था और नीचे की मिट्टी हिलती हुई लगती थी। तीसरे हफ़्ते उसने पैर ज़मीन से उठाए और तुरंत वापस रख दिए।

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एक शाम माँ को पता चल गया। किसी ने बता दिया था। प्रीति डाँट सुनने के लिए तैयार खड़ी थी, पर माँ ने डाँटा नहीं। उन्होंने बस इतना कहा कि अकेली मत जाना, और यह बात उन्होंने दो बार कही। प्रीति ने वादा किया और अगले ही दिन अकेली चली गई, क्योंकि जिस काम में उसे इतनी देर लग रही थी, उसे कोई देखे, यह वह नहीं चाहती थी।

बाकी बच्चे हँसते थे, पर ज़्यादा नहीं, क्योंकि हँसने में भी मेहनत लगती है और वे खेलने आए थे। एक लड़की, शालू, जो प्रीति से तीन साल बड़ी थी, एक दिन पास आकर बैठ गई और बोली, "डूबने से मत बचो। पानी में लेट जाओ।" प्रीति को यह बात बेवकूफ़ी लगी। दो दिन बाद उसने आज़माया और वह तैर गई। थोड़ी दूर, फिर डूबी, फिर खड़ी हो गई। शालू उस वक़्त वहाँ नहीं थी। किसी ने नहीं देखा।

जुलाई तक वह झील के बीच तक जाने लगी थी। तली अब भी दूर थी। वह साँस भरकर नीचे जाती, कानों में दबाव बढ़ता, पानी काला होता जाता, और हर बार वह आधे रास्ते से लौट आती। एक बार उसकी उँगलियों ने कुछ छुआ, पर ऊपर आकर देखा तो हाथ ख़ाली था।

नई शरारत की शुरुआत

अगस्त में एक बार वह डर गई। वह नीचे थी और उसे समझ नहीं आया कि ऊपर की तरफ़ कौन सी है। पानी हर तरफ़ एक जैसा था। उसने हाथ-पैर चलाए और सतह मिल गई, पर उस दिन के बाद वह पूरा हफ़्ता झील में नहीं उतरी। आठवें दिन वह फिर गई। पहले किनारे पर बैठकर उसने पानी को देखा, फिर उतरी, और उस दिन वह पहले से गहरा गई।

जिस दिन वह तली तक पहुँची, उस दिन कोई ख़ास बात नहीं थी। बादल थे और पानी ठंडा था। वह नीचे गई, और नीचे, और उसका हाथ मिट्टी में धँस गया। जो हाथ आया उसे उसने मुट्ठी में भरा और ख़ुद को ऊपर की तरफ़ धकेला। सतह पर आकर वह बहुत देर तक साँस लेती रही। फिर उसने मुट्ठी खोली।

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वह एक पत्थर था। भूरा, चपटा, एक तरफ़ से घिसा हुआ। उसमें कुछ नहीं था। किनारे पर बैठकर प्रीति उसे देखती रही। बच्चों ने पूछा कि उसने क्या माँगा है। प्रीति ने नहीं बताया। उन्होंने दो-तीन बार और पूछा, फिर खेलने चले गए।

वह पत्थर आज भी उसके पास है, उसी डिबिया में जिसमें उसकी माँ सुई-धागा रखती हैं। मन्नत पूरी हुई या नहीं, यह प्रीति ने कभी किसी को नहीं बताया। इतना ज़रूर है कि उस गर्मी के बाद वह झील के बीच तक जा सकती थी, और यह बात उसकी मन्नत में शामिल नहीं थी।