नोटिस उन्नीस गाँवों में एक साथ गए और उनमें से ग्यारह उन लोगों के पास गए जो पैसा जमा कर चुके थे। यह बात कंपनी को पूस के दूसरे हफ़्ते में पता चली, जब पहला आदमी दफ़्तर के बाहर आकर बैठ गया और उसने रसीद निकालकर मेज़ पर रख दी।
रसीद असली थी। छपाई वही, नंबर वही, मुहर वही। बस वह पैसा कंपनी के खाते में कभी नहीं आया था।
जो आदमी सबसे पहले आकर बैठा वह भदौरा गाँव का था और साठ के आसपास का था। उसने चिल्लाकर बात नहीं की। उसने रसीद मेज़ पर रखी और कहा कि इसे देख लीजिए। फिर वह वहीं ज़मीन पर बैठ गया और शाम तक बैठा रहा, क्योंकि नोटिस में लिखा जुर्माना भरने के लिए उसे भैंस बेचनी पड़ती।
सत्तार उस दफ़्तर में लेखा विभाग में था और उसका इस वसूली से कोई लेना-देना नहीं था। वह जमा हुए पैसे का हिसाब रखता था, और जो पैसा जमा ही नहीं हुआ उसका हिसाब कोई नहीं रखता।
वसूली का काम जगन के पास था। जगन उन्नीस गाँवों में साइकिल से जाता था, आषाढ़ में क़र्ज़ बाँटता था और अगहन के बाद किश्तें उठाता था। यह काम भरोसे का है, क्योंकि गाँव में आदमी नक़द देता है और रसीद लेकर रख लेता है।
जगन को कंपनी में सत्तार की सिफ़ारिश पर रखा गया था।
सिफ़ारिश उसने चाहकर नहीं की थी। जगन के चाचा छोटेलाल ने बहुत साल पहले सत्तार के इलाज के वक़्त पैसे दिए थे और कभी माँगे नहीं थे। तीन बरस पहले छोटेलाल दफ़्तर आया और उसने सिर्फ़ इतना कहा कि लड़का बेकार बैठा है। सत्तार ने मैनेजर से बात कर दी।
बात करने में उसने कुछ ग़लत नहीं किया था। कंपनी में आधे लोग इसी तरह आते हैं।
जनवरी में जाँच बैठी। उसमें तीन नाम थे। जगन, वसूली का इंचार्ज, और सिफ़ारिश करने वाला।
सत्तार को यह बात मैनेजर ने चाय पिलाते हुए बताई, और उसी लहजे में बताई जिसमें मौसम की बात की जाती है। उसने कहा कि नाम रस्मी तौर पर है, चिंता की बात नहीं। सत्तार तीन दिन तक उसी वाक्य को उलटता-पलटता रहा।
पुलिस को बयान सोमवार को देना था।
सोमवार की सुबह उसने दाढ़ी बनाई। कमीज़ इस्तरी की। यह सब उसने बिना सोचे किया, और बाद में उसे यह याद भी रहा कि उसने किया था।
शनिवार की रात जगन उसके घर आया।
वह डराने नहीं आया था। वह हँसते हुए आया, मिठाई का डिब्बा लेकर, और आधे घंटे बैठा। उसने बच्चों से बात की। उसने सत्तार की माँ की तबीयत पूछी। जाते-जाते उसने बस इतना कहा कि सोमवार को अगर तारीख़ का सवाल आए तो सत्तार यह बता दे कि मार्च वाले हफ़्ते में वह छुट्टी पर था।
यह झूठ बहुत छोटा था। यही उसकी ख़ूबी थी। छुट्टी का हिसाब लेखा विभाग में ही रहता है और उसमें एक हफ़्ता इधर-उधर करना किसी को दिखता भी नहीं।
दरवाज़ा बंद करने के बाद सत्तार बहुत देर तक वहीं खड़ा रहा। जो उसे परेशान कर रहा था वह जगन की बात नहीं थी। उसे यह परेशान कर रहा था कि जगन इतने आराम से क्यों आया।
और फिर उसे वह चीज़ याद आई जो वह तीन बरस से भूला हुआ था।
जब जगन को रखा जा रहा था, तब मैनेजर ने पूछा था कि पहले कहाँ काम करता था। जगन ने एक कंपनी का नाम लिया था और शहर का नाम लिया था। सत्तार का साला उसी शहर में उसी लाइन में था, इसलिए सत्तार ने बाद में यूँ ही जगन से उस कंपनी के बारे में पूछ लिया था।
जगन ने जवाब दे दिया था। जवाब में कुछ ग़लत नहीं था। पर जवाब देने से पहले वह आधा पल रुका था, और वह आधा पल सत्तार को उस वक़्त भी दिखा था।
उस वक़्त उसने इसे जाने दिया। करता भी क्या। किसी आदमी के आधे पल रुकने पर उसकी नौकरी नहीं रुकवाई जाती, और वह लड़का छोटेलाल का भतीजा था।
सोमवार को बयान देते हुए उसके सामने दो रास्ते थे और दोनों उसी आधे पल से होकर जाते थे। वह उसे छोड़ देता तो कोई उससे कभी न पूछता, क्योंकि उसे कोई और जानता ही नहीं था। और वह उसे बता देता तो जाँच में यह लिखा जाता कि सिफ़ारिश करने वाले को शक था।
उसने बता दिया। उसने यह भी बता दिया कि शनिवार रात जगन उसके घर आया था और उसने क्या कहा था।
शक वाली बात फ़ाइल में गई। और वहीं रही। जगन के पुराने काम की जाँच हुई तो पता चला कि उस शहर में उस नाम की कंपनी में वह कभी नहीं था, और उससे पहले वाली जगह पर भी यही हुआ था, और वहाँ भी किसी की सिफ़ारिश पर आया था।
पुलिस ने उस आदमी को उसी हफ़्ते गिरफ़्तार कर लिया। सत्तार के ख़िलाफ़ जो मामला बन रहा था, वह बंद हो गया, पर उसका नाम अख़बार में एक बार छप चुका था और छपा ही रह गया। दफ़्तर में लोग उससे पहले जैसी बात नहीं करते थे। कोई कुछ कहता नहीं था, बस चाय के वक़्त उसकी कुर्सी के पास कम लोग बैठते। दो महीने बाद सत्तार ने वह नौकरी छोड़ दी और दूसरे शहर चला गया। जाते हुए उसने अपना पुराना नंबर बदल दिया, हालाँकि अब उसकी कोई ज़रूरत नहीं थी।