गाँव में मौत की ख़बर जानकी की आवाज़ में आती थी।
पंचायत भवन की छत पर लोहे का खंभा है और उस पर चार भोंपू लगे हैं, चार दिशाओं में। भीतर एक मेज़ पर एम्पलीफ़ायर रखा है और उसके साथ एक माइक। बिजली रहे तो वह चलता है, न रहे तो बैटरी से चलता है, और बैटरी हमेशा चार्ज रहती है, क्योंकि यही एक चीज़ है जिसकी ज़रूरत बिना बताए पड़ती है।
ग्यारह बरस से जानकी उसे चलाती थी।
उसका असली काम आँगनबाड़ी का था। भोंपू का ज़िम्मा उसे इसलिए मिला था कि पंचायत भवन उसके घर से सबसे पास पड़ता है और रात में भी दो मिनट में पहुँचा जा सकता है।
उससे तीन तरह की घोषणाएँ होती थीं। बिजली कब जाएगी। कोई बच्चा या मवेशी खो जाए तो उसका हुलिया। और मौत।
मौत वाली घोषणा का एक तय ढाँचा है। नाम, पिता या पति का नाम, मोहल्ला, उम्र, और उठने का समय। जानकी ने ग्यारह बरस में यह ढाँचा कभी नहीं बदला, क्योंकि जो चीज़ रोज़ की नहीं होती, उसे एक ही तरह से कहा जाए तो लोग एक ही बार में समझ जाते हैं।
पिछले अगहन में उसने भोंपू बदलवाए। पुराने में एक फट चुका था। नए भोंपू ब्लॉक से आए और उन्हें लगाने वाला आदमी भी ब्लॉक से आया।
उसके बाद जानकी को एक चीज़ खलने लगी। बोलते वक़्त उसे अपनी आवाज़ हल्की-सी दोबारा सुनाई देती थी, बहुत पीछे, जैसे कोई और उसे दोहरा रहा हो। उसने यह लगाने वाले से कहा और उसने कहा कि नए भोंपू तेज़ हैं और आवाज़ दूर से टकराकर लौटती है।
यह जवाब ठीक लगा और बात वहीं ख़त्म हो गई।
पूस की उस सुबह जानकी छह बजे उठी थी और चाय चढ़ा रही थी, जब भोंपू बजा।
वह घर पर थी। भोंपू पंचायत भवन पर था। उसके और भोंपू के बीच कोई नहीं था, क्योंकि चाबी उसके पास रहती है।
आवाज़ किसी आदमी की थी और वह मौत की घोषणा कर रहा था। नाम, पति का नाम, मोहल्ला, उम्र, और उठने का समय।
नाम कस्तूरी था। कस्तूरी देवी।
कस्तूरी उसके अपने मोहल्ले में रहती है, अकेली, और उसकी उम्र भी वही थी जो बताई गई। उसके दोनों बेटे बाहर हैं।
जानकी चाय छोड़कर भागी।
पंचायत भवन का ताला बंद था। भीतर कोई नहीं। माइक मेज़ पर वैसे ही रखा था जैसे वह रात को छोड़कर गई थी।
तब उसने वह सुना जो उसे सुनना चाहिए था। घोषणा दोबारा हुई, पूरी की पूरी, और वह उसी आवाज़ में थी, और वह भोंपुओं से आ रही थी जिनका तार उसके सामने वाली मेज़ पर ख़त्म होता था।
वह कस्तूरी के घर की तरफ़ भागी।
कस्तूरी अपने दरवाज़े पर खड़ी थी। ज़िंदा। जागी हुई। और भोंपू सुनती हुई।
उसने जानकी को देखा और कहा कि उसका नाम आया है।
अब घड़ी चल पड़ी थी और जानकी को यह मालूम था। मौत की ख़बर पर लोग तुरंत निकलते हैं। जिनके फ़ोन हैं, वे फ़ोन करते हैं। पास के गाँवों तक बात पहुँचने में आधा घंटा लगता है और शहर तक एक घंटा। कस्तूरी के बेटों तक पहुँचने में उससे भी कम, क्योंकि किसी न किसी के पास उनका नंबर है।
उसने दो काम एक साथ नहीं किए जा सकते थे और उसे यह चुनना था।
वह घर-घर जा सकती थी। इसमें दो घंटे लगते और तब तक कोई मतलब नहीं बचता।
या वह भोंपू से सुधार बोल सकती थी।
भोंपू से सुधार बोलने का मतलब यह था कि पूरा गाँव यह सुनता कि पंचायत के भोंपू से एक ग़लत मौत की घोषणा हुई है। ग्यारह बरस में उसकी घोषणा पर किसी ने कभी सवाल नहीं किया था और उसका काम उसी पर टिका था।
उसने भोंपू चुना और सात बजकर बारह मिनट पर बोला।
उसने यह नहीं कहा कि ग़लती हुई है। उसने कहा कि कस्तूरी देवी जीवित हैं और अपने दरवाज़े पर खड़ी हैं, और जिसे भरोसा न हो वह आकर देख ले। यह उसने तीन बार दोहराया।
उसके बाद वह पंचायत भवन में बैठ गई और उसने तार देखना शुरू किया।
तार छत तक जाता है और वहाँ से खंभे पर चढ़ता है। नए भोंपू लगाते वक़्त लगाने वाले ने खंभे पर एक और तार देखा होगा, जो पहले से वहाँ था, और उसने दोनों को एक ही पट्टी में कस दिया।
वह दूसरा तार बग़ल की पंचायत का था। कोई पूछने नहीं गया था।
दो पंचायतें एक ही खंभे की क़तार से बिजली लेती हैं और उनके भोंपुओं के तार बरसों से साथ-साथ चलते आए हैं, बिना जुड़े। अगहन में वे जुड़ गए।
इसके बाद बग़ल की पंचायत जो भी बोलती, वह इधर भी बजता। और इधर से जो भी बोला जाता, वह उधर भी बजता। जानकी को जो हल्की-सी अपनी आवाज़ पीछे से सुनाई देती थी, वह गूँज नहीं थी। वह उसकी अपनी आवाज़ थी, बग़ल के गाँव के भोंपुओं से लौटकर आती हुई।
बग़ल के गाँव में उस सुबह एक कस्तूरी देवी सचमुच गुज़र गई थीं। वही उम्र, और पति का नाम भी मिलता-जुलता। यह इत्तिफ़ाक़ नहीं है और उतना अजीब भी नहीं है। एक ही इलाक़े में एक ही पीढ़ी की औरतों के नाम अक्सर वही होते हैं।
तार उसी दोपहर अलग करवा दिए गए। इसमें दस मिनट लगे।
बात इतनी बड़ी नहीं थी कि कोई जाँच होती, और इतनी छोटी भी नहीं थी कि लोग भूल जाते। महीने भर जानकी की घोषणा के बाद कोई न कोई पूछ ही लेता था कि पक्का है न।
असली बात इसके बाद हुई। और वह किसी ने सोची नहीं थी।
कस्तूरी के बेटों तक ख़बर पहुँच चुकी थी और वे निकल चुके थे। बड़ा उसी रात पहुँचा। छोटा अगले दिन। सुधार वाली घोषणा उन तक नहीं पहुँची थी, क्योंकि जिसने फ़ोन किया था उसने दोबारा फ़ोन नहीं किया।
वे दो दिन रुके। पास के गाँवों से भी लोग आते रहे, कुछ यह देखने कि क्या हुआ और कुछ इसलिए कि वे निकल चुके थे और अब लौटने से पहले मिल तो लेते।
कस्तूरी के घर में नौ बरस में इतने लोग नहीं आए थे।
जानकी उन दो दिनों में उधर नहीं गई। उसे शर्म आ रही थी और यह वाजिब थी।
तीसरे दिन कस्तूरी ख़ुद उसके घर आई। वह इसलिए नहीं आई कि उसे कुछ कहना था। वह लड्डू लेकर आई थी, जो बेटे छोड़ गए थे और जो अकेली औरत के घर में ख़राब हो जाते।
जानकी ने माफ़ी माँगी। कस्तूरी ने उसे बीच में रोक दिया। उसने कहा कि दो दिन अच्छे बीते।