रात की स्लीपर बस में खलासी का काम सोना नहीं होता। इरशाद जयपुर से जैसलमेर की गाड़ी पर था और उसका काम था हर पड़ाव पर गिनती करना, सामान चढ़ाना-उतारना, और ड्राइवर को जगाए रखना। गिनती वह उँगली से करता था, बर्थ छूकर, क्योंकि अँधेरे में चेहरे नहीं दिखते और पैर दिखते हैं। इकतालीस सवारी चढ़ी थीं। यह उसे याद था।
रास्ता जाना-पहचाना था। जयपुर, किशनगढ़, मेड़ता, पोकरण, फिर जैसलमेर। पोकरण के आगे सड़क सीधी हो जाती है और दोनों तरफ़ कुछ नहीं रहता, सिर्फ़ रेत और कभी-कभी फ़ौज की गाड़ियाँ। उस पट्टी पर बस दो घंटे तक नहीं रुकती।
ड्राइवर सरदार जी ने पहले ही दिन इरशाद से एक बात कही थी। पोकरण वाली पट्टी पर तुम सो जाना। पूरे रास्ते जागना, वहाँ सो जाना। इरशाद ने वजह पूछी तो जवाब मिला कि आगे लंबा काम है और आदमी को नींद चाहिए। बात ठीक लगी। छह महीने तक ठीक लगती रही।
जाल बिछ चुका था
जेठ की एक रात नींद नहीं आई। बस मेड़ता के बाद एक बार रुकी, जहाँ कोई पड़ाव नहीं था। इरशाद ने पर्दे से देखा। कोई सवारी नहीं उतरी और कोई चढ़ी नहीं। नीचे डिक्की खुली और बंद हुई। कुल मिलाकर चार मिनट।
अगले पड़ाव पर उसने गिनती की, आदत से। इकतालीस। पूरी। सवारी में कोई कमी नहीं थी। तो डिक्की क्यों खुली, यह सवाल बचा रहा, और इरशाद ने उसे उस रात के लिए छोड़ दिया।
अगली बार वह जागता रहा और गिनता रहा। मेड़ता के बाद वही जगह, वही चार मिनट। तीसरी बार भी। तीनों बार बस पोकरण की जाँच चौकी से पहले रुकी थी। चौकी पर कागज़ देखे जाते हैं और कभी-कभी डिक्की भी खुलवाई जाती है।
चौथी बार इरशाद डिक्की के पास सोया, बाहर, औज़ार वाले बक्से के ऊपर। बस रुकी। सरदार जी उतरे और डिक्की का ताला खोला। इरशाद ने वही किया जो उसने पूरे हफ़्ते सोचा था। उसने टॉर्च जलाई।
डिक्की में सामान के पीछे एक लड़का था। दस-ग्यारह साल का। बँधा नहीं था। उसकी आँखें खुली थीं और वह इरशाद को देखता रहा और कुछ नहीं बोला। सरदार जी ने टॉर्च की तरफ़ देखा, फिर इरशाद की तरफ़, और उन्होंने भी कुछ नहीं कहा। डिक्की बंद हो गई।
एक और अनदेखा मोड़
बाक़ी रास्ते सरदार जी ने एक बार भी उसका नाम नहीं लिया। जैसलमेर पहुँचकर उन्होंने इरशाद को उस महीने की पूरी तनख़्वाह दी और पाँच सौ ऊपर से। पैसे देते वक़्त उन्होंने कहा कि लड़का उनके भाई का है और गाड़ी में जगह नहीं थी। इरशाद ने पैसे ले लिए, क्योंकि न लेता तो वह भी एक जवाब होता।
उस रात इरशाद अड्डे पर नहीं सोया। वह बस के नीचे बैठा रहा और डिक्की का ताला देखता रहा। ताला नंबर वाला था और उसकी चाबी सिर्फ़ ड्राइवर के पास रहती है। छह महीने में उसने कभी नहीं सोचा था कि यह अजीब है। सामान खलासी चढ़ाता है। ताला ड्राइवर के पास क्यों रहेगा।
अगली गाड़ी तीन दिन बाद थी। तीन दिन में इरशाद ने वह सब सोचा जो सोचा जा सकता था। पुलिस के सामने वह क्या रखता। चार बार देखा था और तीन बार चुप रहा था, और यह बात सबसे पहले उसी के ख़िलाफ़ जाती। सबूत कुछ नहीं था। सिर्फ़ एक डिक्की थी, जो हर बार जैसलमेर पहुँचने से पहले ख़ाली हो जाती थी।
चौथे दिन गाड़ी चली। मेड़ता के बाद, उस जगह से बीस किलोमीटर पहले, इरशाद पेशाब के बहाने उतरा और पिछले पहिये की वाल्व टोपी खोलकर उसमें पेचकस घुसा दिया। हवा धीरे निकलती है। बस दस किलोमीटर और चली, फिर झुक गई। स्टेपनी थी, पर जैक के नीचे रेत थी, और रात में रेत में जैक नहीं टिकता।
सरदार जी ने उतरकर पहिया देखा, फिर इरशाद को देखा, और वापस अपनी सीट पर चढ़ गए। सवारियों से उन्होंने कहा कि सुबह तक इंतज़ार करना पड़ेगा। किसी ने शोर मचाया, किसी ने नहीं। इरशाद रेत पर बैठ गया, बस से थोड़ा दूर, जहाँ से डिक्की दिखती रहे। रात लंबी थी और रेगिस्तान में रात को ठंड पड़ती है।
सुबह तक वे वहीं थे। सात बजे फ़ौज की एक गाड़ी रुकी, फिर पुलिस आई, और नियम से डिक्की खुलवाई गई। उसके बाद जो हुआ वह इरशाद के सामने नहीं हुआ। उसे अलग बैठाया गया और शाम को छोड़ दिया गया।
सरदार जी पकड़े गए। इरशाद पर कोई मामला नहीं बना, पर जैसलमेर की किसी बस पर उसे फिर काम नहीं मिला। यह लिखकर कहीं नहीं आया। बस मिला नहीं। ऑपरेटर आपस में बात कर लेते हैं, और खलासी बहुत मिल जाते हैं।
अब वह जोधपुर में ट्रक भरवाता है, दिन की मज़दूरी पर। उस रात के लिफ़ाफ़े में जो पाँच सौ ऊपर से थे, वे उसने ख़र्च नहीं किए। लिफ़ाफ़ा अब भी उसके बक्से में है, उसी तरह मुड़ा हुआ, और वह उसे कभी-कभी निकालकर देख लेता है। उसने कभी गिना नहीं कि उसमें कितने हैं।