चिरप चूहा गाँव और जंगल के बीच वाली मेड़ पर रहता था। वहाँ से दोनों तरफ़ दिखता था। यही उसकी सबसे बड़ी ताक़त थी, हालाँकि किसी को यह बात ताक़त जैसी नहीं लगती थी। वह छोटा था। बहुत छोटा। जंगल में उसे कोई गिनता भी नहीं था। पर जंगल के हर रास्ते, हर बिल, हर सूखी नाली का नक्शा उसके दिमाग़ में था, क्योंकि उसे हर दिन उन्हीं से होकर गुज़रना पड़ता था।
शेर बाहर से आया था। यह बात सब जानते थे, क्योंकि जो यहाँ का होता है वह पानी की जगह जानता है और यह शेर हर शाम अलग रास्ते से नाले पर उतरता था। उसने ऊपर वाली गुफ़ा में डेरा डाला और पहले ही हफ़्ते में तीन शिकार किए। तीनों बार वह मेड़ के पास से गुज़रा।
शेर के आने के बाद जंगल में सबसे पहले आवाज़ें बंद हुईं। पक्षियों ने गाना छोड़ दिया। बंदरों ने शोर करना छोड़ दिया। हिरन दिन में निकलते ही नहीं थे। शाम होते ही पूरा जंगल ऐसा हो जाता जैसे वहाँ कोई रहता ही न हो। चिरप ने यह सब मेड़ से देखा।
चिरप ने उन दिनों गिनना शुरू किया। शेर किस वक़्त निकलता है, किधर से उतरता है, कितनी देर में लौटता है। यह जानकारी किसी काम की नहीं लगती थी। पर चिरप के पास और कुछ था भी नहीं, इसलिए वह वही करता रहा जो वह कर सकता था।
एक शाम शेर ने उसे देख लिया। चिरप मेड़ के नीचे वाली नाली में था और शेर ऊपर से गुज़र रहा था। वह रुका और उसने नीचे देखा। चिरप हिला नहीं। शेर ने पंजे से एक बार मिट्टी हटाई, फिर दूसरी बार, और फिर आगे बढ़ गया। इतने छोटे शिकार के लिए मिट्टी खोदना उसे ठीक नहीं लगा। चिरप उस रात बिल से बाहर नहीं निकला।
जानवरों की बैठक तीन बार हुई और तीनों बार बिना किसी नतीजे के ख़त्म हुई। हिरन ने कहा कि भाग जाना चाहिए। बंदरों ने कहा कि ऊपर रहना चाहिए। बूढ़े साही ने कहा कि इंतज़ार करना चाहिए। चिरप ने भी कुछ कहा, पर उसकी आवाज़ इतनी पतली थी कि पिछली क़तार तक पहुँची ही नहीं।
बैठक के बाद बूढ़े साही ने उसे रोका और पूछा कि वह क्या कहना चाहता था। चिरप ने कहा कि उसे कुछ नहीं कहना था, बस एक सवाल था। शेर बरसात में कहाँ रहेगा। साही ने कहा कि यह भी कोई सवाल है। चिरप ने कहा कि उसके पास इसी एक सवाल का जवाब है।
ऊपर वाली गुफ़ा से नाले तक आने के दो रास्ते हैं। एक लंबा, पथरीला, ऊपर-ऊपर से जाता हुआ। दूसरा छोटा, जो सूखी नाली के तले से होकर निकलता है और जिस पर चलना आसान है। शेर दूसरा वाला लेता था, क्योंकि हर बड़ा जानवर आसान रास्ता लेता है। बरसात में वही नाली भर जाती है।
चिरप ने इंतज़ार किया। आषाढ़ के आख़िर में जब बादल पहली बार भारी हुए, वह शेर की गुफ़ा के मुँह तक गया, इतनी दूर जितनी दूर तक जाकर वह भाग सकता था, और उसने वहाँ से पुकारकर कहा कि नाले के उस पार, टीले के पीछे, हिरन शाम को पानी पीने उतरते हैं। हिरन सचमुच उधर उतरते थे।
शेर ने उस पर ध्यान नहीं दिया। दूसरी शाम भी नहीं। तीसरी शाम वह उस तरफ़ गया, क्योंकि इस तरफ़ अब कुछ बचा नहीं था और तीन दिन से उसे कुछ नहीं मिला था। वह सूखी नाली के तले से होकर उतरा और उस पार चढ़ गया।
उस शाम चिरप मेड़ पर बैठा रहा और आसमान देखता रहा। बादल भारी थे, पर भारी बादल हमेशा बरसते नहीं। अगर उस रात पानी न गिरता तो शेर सुबह उसी नाली से वापस आ जाता, और वह चिरप की आख़िरी सुबह होती। यह बात चिरप को उस वक़्त भी मालूम थी जब वह गुफ़ा के मुँह तक गया था।
उसी रात पानी बरसा। नाली भरी, फिर नाला चढ़ा, और सुबह तक बीच में इतना पानी था जितने में कोई बड़ा जानवर उतरना पसंद नहीं करता। शेर उस पार खड़ा दिखाई देता रहा। दो दिन दिखाई दिया। तीसरे दिन नहीं दिखा।
जंगल को यक़ीन आने में देर लगी। पहले हिरन दिन में निकले, पर नाले तक नहीं गए। फिर बंदर नीचे उतरे। साही ने कहा कि जल्दबाज़ी ठीक नहीं, और वह हफ़्ते भर अपने बिल के पास ही रहा। किसी ने यह नहीं पूछा कि शेर गया क्यों।
रास्तों की जानकारी चिरप के पास इसलिए थी कि वह हर रोज़ उनसे गुज़रता था। कौन सा रास्ता बरसात में डूब जाता है, कहाँ से खेत सबसे पास पड़ता है, किस झाड़ी के पीछे से पूरा मैदान दिखता है, यह सब उसे रटा हुआ था। शेर को इनमें से कुछ भी नहीं पता था। वह जंगल में सबसे बड़ा था, और सबसे कम जानता था।
बरसात उतरने के बाद भी वह लौटकर नहीं आया। हो सकता है उस तरफ़ उसे कोई और जगह मिल गई हो, जहाँ शिकार आसान था। जंगल में इसकी कोई कहानी नहीं बनी, क्योंकि कहानी तब बनती है जब कुछ होते हुए दिखे। यहाँ सिर्फ़ इतना हुआ था कि एक जानवर एक तरफ़ चला गया और पानी बीच में आ गया।
उस बैठक के बाद चिरप वापस अपनी मेड़ पर आ गया। किसी ने उसे धन्यवाद नहीं कहा, और उसने उम्मीद भी नहीं की। शाम को जंगल से आवाज़ें आनी शुरू हो गईं। पहले एक पक्षी। फिर दूसरा। फिर बंदरों का शोर। चिरप ने आँखें बंद कर लीं और देर तक सुनता रहा।