चिरप चूहा गाँव और जंगल के बीच वाली मेड़ पर रहता था। वहाँ से दोनों तरफ़ दिखता था। यही उसकी सबसे बड़ी ताक़त थी, हालाँकि किसी को यह बात ताक़त जैसी नहीं लगती थी। वह छोटा था। बहुत छोटा। जंगल में उसे कोई गिनता भी नहीं था। पर जंगल के हर रास्ते, हर बिल, हर सूखी नाली का नक्शा उसके दिमाग़ में था, क्योंकि उसे हर दिन उन्हीं से होकर गुज़रना पड़ता था।
एक दिन, गाँव के जंगल में एक शेर ने आकर अपना डेरा जमा लिया। शेर ने जंगल के सारे जानवरों में दहशत फैला दी थी। वह हर दिन जंगल के जानवरों को डराता और शिकार करता था। शेर के आतंक से सभी जानवर परेशान थे और कोई भी उससे मुकाबला करने का साहस नहीं जुटा पा रहा था।
शेर के आने के बाद जंगल में सबसे पहले आवाज़ें बंद हुईं। पक्षियों ने गाना छोड़ दिया। बंदरों ने शोर करना छोड़ दिया। हिरन दिन में निकलते ही नहीं थे। शाम होते ही पूरा जंगल ऐसा हो जाता जैसे वहाँ कोई रहता ही न हो। चिरप ने यह सब मेड़ से देखा।
मित्रता की परीक्षा
इस भयावह स्थिति में, चिरप ने सोचा कि शेर से कैसे निपटा जा सकता है। हालांकि वह छोटा था, लेकिन उसकी समझदारी में कोई कमी नहीं थी। चिरप ने अन्य जानवरों से बात की और सबको एकजुट होने के लिए प्रेरित किया। उसने कहा, "अगर हम सब मिलकर शेर का सामना करें, तो हम उसे हरा सकते हैं। हमें अपनी ताकत नहीं, बल्कि समझदारी का इस्तेमाल करना होगा।"
जानवरों की बैठक तीन बार हुई और तीनों बार बिना किसी नतीजे के ख़त्म हुई। हिरन ने कहा कि भाग जाना चाहिए। बंदरों ने कहा कि ऊपर रहना चाहिए। बूढ़े साही ने कहा कि इंतज़ार करना चाहिए। चिरप ने भी कुछ कहा, पर उसकी आवाज़ इतनी पतली थी कि पिछली क़तार तक पहुँची ही नहीं।
सब जानवर चिरप की बातों से प्रभावित हुए, लेकिन फिर भी वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर शेर का सामना कैसे किया जा सकता है। चिरप ने एक दिन शेर को अकेला पाया। वह उसके पास गया और शेर से कहा, "तुम बहुत ताकतवर हो, लेकिन क्या तुमने कभी किसी चूहे से मुकाबला किया है?"
शेर ने हंसी में कहा, "तुम जैसे छोटे से चूहे से मैं क्यों मुकाबला करूँगा? तुम मेरी दया पर हो, और मैं तुम्हें कभी भी मार सकता हूँ।" लेकिन चिरप ने कहा, "तुम मुझे मार सकते हो, लेकिन अगर तुम मेरी मदद लो तो मैं तुम्हें एक बड़ा लाभ दे सकता हूँ।" शेर ने दिलचस्पी दिखाई और पूछा, "कैसे?"
चिरप ने कहा, "मैं तुम्हारे लिए जंगल के सारे रास्तों को जानता हूँ। मैं तुम्हें ऐसे रास्तों से ले जाऊँगा जहाँ तुम बिना किसी परेशानी के शिकार कर सको।" शेर, जो चूहे की बातों को मजाक समझ रहा था, फिर भी उसकी बातों को स्वीकार कर लिया और चूहे को अपने साथ चलने के लिए कह दिया।
अंत में क्या हुआ
चिरप और शेर जंगल में एक साथ चलने लगे। चिरप ने शेर को उन रास्तों से परिचित कराया, जहाँ शेर को शिकार करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। शेर को अब यह अहसास हुआ कि चिरप वास्तव में बहुत समझदार है और उसकी मदद से वह ज्यादा शिकार कर सकता था।
रास्तों की जानकारी चिरप के पास इसलिए थी कि वह हर रोज़ उनसे गुज़रता था। कौन सा रास्ता बरसात में डूब जाता है, कहाँ से खेत सबसे पास पड़ता है, किस झाड़ी के पीछे से पूरा मैदान दिखता है, यह सब उसे रटा हुआ था। शेर को इनमें से कुछ भी नहीं पता था। वह जंगल में सबसे बड़ा था, और सबसे कम जानता था।
इसके बाद, शेर ने चिरप से कहा, "तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो। तुम्हारी मदद से मैंने बहुत शिकार किए और अब मैं जंगल के सबसे शक्तिशाली जानवर की तरह महसूस कर रहा हूँ। मैं तुम्हारा आभारी हूँ।" चिरप ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "आपका धन्यवाद, लेकिन असली शक्ति सिर्फ ताकत में नहीं, बल्कि समझदारी में होती है।" शेर ने यह बात मान ली और चिरप की समझदारी की सराहना की।
शेर ने फिर जंगल में सभी जानवरों को एकजुट किया और उनसे कहा, "हम सभी को एकजुट होकर रहना चाहिए। ताकत केवल शारीरिक नहीं, बल्कि हमारी समझदारी में भी है। हमें अपने दिमाग का सही इस्तेमाल करना चाहिए।" शेर के इस बयान ने जंगल के सभी जानवरों को एक नई दिशा दी और सब ने मिलकर शांति से रहने का फैसला किया।
उस बैठक के बाद चिरप वापस अपनी मेड़ पर आ गया। किसी ने उसे धन्यवाद नहीं कहा, और उसने उम्मीद भी नहीं की। शाम को जंगल से आवाज़ें आनी शुरू हो गईं। पहले एक पक्षी। फिर दूसरा। फिर बंदरों का शोर। चिरप ने आँखें बंद कर लीं और देर तक सुनता रहा।