सनी दिन में आठ से दस कैमरे लगाता था, और हर कैमरा लगाने के बाद मोबाइल पर चालू करके देखता था। यह कंपनी का नियम नहीं था। उसका अपना था। कानपुर में उसकी कंपनी छोटी थी: चार आदमी, एक टेंपो, और काम ज़्यादातर छोटी दुकानों और अपार्टमेंट का आता था। उस दिन उसे शारदा नगर की एक बिल्डिंग में सात कैमरे लगाने थे। छत वाला कैमरा उसने सबसे आख़िर में लगाया।

छत वाला कैमरा लगाते वक़्त सोसाइटी के सेक्रेटरी ऊपर आ गए। वे ग्राउंड फ़्लोर पर रहते थे, नाम था अवस्थी जी, और सनी को हर सुबह चाय के लिए पूछते थे। उन्होंने कैमरा देखकर कहा कि इसका मुँह थोड़ा गेट की तरफ़ कर दो, क्योंकि चोरी गेट से होती है, छत से नहीं। सनी ने उसे लगभग बीस डिग्री घुमा दिया। इसमें कुछ ग़लत नहीं था। लोग अक्सर यही कहते हैं।

नौ दिन बाद उसी बिल्डिंग में एक आदमी छत से गिरकर मर गया। नाम था प्रमोद तिवारी, तीसरी मंज़िल, उम्र इक्यावन। पुलिस आई और उसे हादसा लिखा गया, क्योंकि छत की मुंडेर नीची थी और उस रात बारिश हुई थी। अख़बार में दो लाइन छपीं। सनी को यह ख़बर तब मिली जब कंपनी में फ़ोन आया कि उस बिल्डिंग का डीवीआर बदलना है।

तस्वीर अधूरी थी

फ़ोन अवस्थी जी का था। उन्होंने कहा कि छत वाला कैमरा उस रात चल ही नहीं रहा था, पुलिस को कोई फ़ुटेज नहीं मिली, और इसलिए पूरा सिस्टम बेकार है। सनी ने फ़ोन रखकर अपनी डायरी निकाली। उसने वह कैमरा लगाने के बाद चालू करके देखा था, और उसके नीचे तारीख़ और वक़्त लिखा था, जैसा वह हर कैमरे के लिए लिखता था।

ऐप पर कैमरा बंद दिखना और कैमरे का बंद होना, दो अलग बातें हैं। इंटरनेट चला जाए तो ऐप कुछ नहीं दिखाता, पर डीवीआर की अपनी हार्ड डिस्क चलती रहती है और रिकॉर्डिंग उसी में जमा होती रहती है। वह डिस्क तीस दिन में भर जाती है, और उसके बाद सबसे पुरानी रिकॉर्डिंग के ऊपर नई चढ़ने लगती है। यह बात सनी को इसलिए पता थी क्योंकि यही उसका काम था। बिल्डिंग में और किसी को यह पता होने की कोई वजह नहीं थी।

📚 यह भी पढ़ें गुमशुदा आवाज
गुमशुदा आवाज पढ़ें 'गुमशुदा आवाज', जिसमें एक आदमी अजनबी आवाज़ों के बीच फंसा हुआ है। यह थ्रिलर कहानी रहस्य, खौफ और सस्पेंस से भरी हुई है। जानिए, वह गुमशुदा आवाज आखिर क्या है और इसके पीछे का रहस्य क्या है।

सनी ने हिसाब लगाया। कैमरे लगे थे उन्नीस तारीख़ को। तिवारी अट्ठाईस की रात गिरे। उस दिन सात तारीख़ थी। जिस रात की रिकॉर्डिंग चाहिए थी, वह डिस्क पर उन्नीसवें दिन पड़ी थी। ग्यारह दिन बचे थे। उसके बाद वह अपने आप मिट जाती।

अगले दिन अवस्थी जी ख़ुद दफ़्तर आ गए और मालिक से बात की। उन्होंने नया सिस्टम फ़ौरन चाहिए बताया और एडवांस भी दे दिया। मालिक ने सनी को बुलाकर कहा कि परसों जाकर पुराना डीवीआर उतार लाए और नया लगा दे। सनी ने पूछा कि पुराने का क्या करना है। मालिक ने कहा कि वे लोग उसे अपने पास रखेंगे, क्योंकि सोसाइटी की चीज़ है।

उस रात सनी ने डीवीआर के बारे में अपने एक दोस्त से बात की, जो दूसरी कंपनी में था। अगली सुबह अवस्थी जी ने उसे गेट पर रोक लिया। वे हमेशा की तरह मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने पूछा कि सनी किराए पर कहाँ रहता है। फिर उन्होंने यह भी कहा कि इस उम्र के लड़कों को किसी अच्छी कंपनी में जाना चाहिए, और वे एक-दो लोगों को जानते हैं। बात में कहीं कुछ ग़लत नहीं था। सनी उस पूरे दिन काँपता रहा।

एक चूक, जो भारी पड़ी

सनी सत्ताईस साल का था और ठेके पर काम करता था। कंपनी का उस सोसाइटी से सालाना करार था, और उसके अलावा नौ बिल्डिंगें उन्हीं लोगों की थीं। पुलिस के पास जाने का मतलब था कि सबसे पहले उसे यह बताना पड़ता कि कैमरा उसी ने घुमाया था, बीस डिग्री, सेक्रेटरी के कहने पर, और यह बात लिखकर देनी पड़ती। मालिक को पता चलता तो नौकरी उसी दिन जाती।

परसों वह अकेला गया। नया डीवीआर लगाने में चालीस मिनट लगे। पुराना उतारते वक़्त उसने अंदर से हार्ड डिस्क निकालकर अपने बैग में रख ली और ख़ाली डिब्बा अवस्थी जी को सौंप दिया। उन्होंने डिब्बा हाथ में लेकर उसका वज़न देखा। सनी ने कहा कि हार्ड डिस्क कंपनी में जमा होती है, नियम है। यह झूठ था, और उसने इसे इतनी सफ़ाई से बोला कि बाद में उसे ख़ुद हैरानी हुई।

📚 यह भी पढ़ें हर कोई संदिग्ध
हर कोई संदिग्ध पढ़ें 'हर कोई संदिग्ध', जिसमें एक आदमी एक रहस्यमयी हत्याकांड के मामले में फंस जाता है, और उसे लगता है कि हर कोई संदिग्ध है। यह थ्रिलर कहानी डर, रहस्य और सस्पेंस से भरी हुई है। जानिए, कैसे एक मामूली आदमी को हत्यारे के जाल में फंसने का खतरा होता है।

रिकॉर्डिंग में जो था, वह ज़्यादा नहीं था। अट्ठाईस की रात, ग्यारह बजकर चालीस मिनट पर, दो आदमी छत पर आते हैं। कैमरा गेट की तरफ़ घूमा हुआ था, इसलिए मुंडेर फ़्रेम से बाहर थी। तीन मिनट तक कुछ नहीं दिखता। फिर एक आदमी अकेला वापस जाता है। उसका चेहरा नहीं दिखता। पर लौटते हुए वह सीढ़ी की बत्ती बुझाता है, और बुझाने वाला हाथ फ़्रेम में आ जाता है, और उस हाथ की कलाई पर वही घड़ी है जो सनी ने कई बार देखी थी।

उस रात सनी घर नहीं गया। वह अपने चाचा के यहाँ रुका और डिस्क बैग में रखे-रखे सोता रहा। सुबह उसके किराए के कमरे का ताला टूटा हुआ मिला। अंदर से कुछ नहीं गया था। न पैसे, न फ़ोन का चार्जर, कुछ भी नहीं। मकान मालिक ने कहा कि चोर घबराकर भाग गया होगा। सनी ने सिर हिला दिया और उस दिन के बाद वहाँ नहीं लौटा।

पुलिस के पास जाने के दो नुक़सान थे और सनी दोनों गिन चुका था। पर एक तीसरी बात थी जो उसने पहले नहीं सोची थी। तिवारी की बेटी, जो बीए में पढ़ती थी, मुआवज़े के काग़ज़ों पर दस्तख़त कर चुकी थी, क्योंकि उसे बताया गया था कि यह हादसा था। सनी डिस्क लेकर थाने नहीं गया। उसने उस लड़की को फ़ोन किया और मिलने का वक़्त माँगा।

उसने डिस्क उसे दे दी, और यह भी बता दिया कि उसमें क्या है और क्या नहीं है, और यह भी कि गवाही देने पर उसकी अपनी नौकरी चली जाएगी। इसके बाद वह चला आया। आगे उस लड़की ने क्या किया, यह अलग कहानी है, और सनी उसका हिस्सा नहीं था। वह दूसरी कंपनी में लग गया, दो हज़ार कम तनख़्वाह पर। अब वह हर कैमरा लगाने के बाद दो बार चालू करके देखता है, और सीरियल नंबर एक कॉपी में लिखता है जो घर पर रहती है।