तिलकधारी तहसील के गेट के बाहर बैठता था और उसके सामने एक टीन का बक्सा रहता था।
उस बक्से में फ़ॉर्म थे, कार्बन काग़ज़ था, दो क़लम थे, और स्याही की एक शीशी, जिसकी अब ज़रूरत नहीं पड़ती थी और जो फिर भी रखी रहती थी।
वह अर्ज़ीनवीस था। जो लोग लिख नहीं सकते, उनकी अर्ज़ी वह लिखता था।
तीस बरस में उसने एक चीज़ सीखी थी और वह यह थी कि दफ़्तर में बात से कुछ नहीं होता। लिखे हुए से होता है, और लिखे हुए में भी सब कुछ नहीं चलता। कुछ ही वाक्य चलते हैं।
पहली बार यह उसे बत्तीस बरस पहले समझ आया था।
एक विधवा की पेंशन की अर्ज़ी उसने वैसी ही लिखी थी जैसी बात थी। पति गुज़र गए, घर में कोई कमाने वाला नहीं, दो बच्चे। अर्ज़ी लौट आई।
दूसरी बार उसने वही बात दूसरे शब्दों में लिखी। पात्रता की शर्तें पूरी करती हैं। संलग्न प्रमाणपत्रानुसार। कृपया नियमानुसार कार्यवाही की जाए।
वह चल गई।
बात वही थी। औरत वही थी। बच्चे वही थे।
इसके बाद तिलकधारी ने वे वाक्य याद कर लिए और तीस बरस उन्हीं से काम चलाया।
उन वाक्यों की एक सूची उसके दिमाग़ में थी और उसे उसने कभी लिखा नहीं। कुछ वाक्य किसी भी अर्ज़ी में जोड़े जा सकते हैं और उनसे नुक़सान कभी नहीं होता। कुछ ऐसे हैं जो सिर्फ़ ज़मीन के मामलों में चलते हैं। और कुछ ऐसे हैं जो उस बाबू पर निर्भर करते हैं जो उस वक़्त बैठा हो, इसलिए तिलकधारी हर तबादले के बाद पहले हफ़्ते में यह देख लेता था कि नया आदमी किस तरह की भाषा पर हामी भरता है।
इसे वह चतुराई नहीं मानता था। उसके हिसाब में यह उसका काम था, जैसे मिस्त्री का काम यह जानना है कि कौन सी ईंट किधर बैठेगी।
वह ग़लत नहीं लिखता था। इस पर वह साफ़ था और गाँव में भी लोग यही जानते थे। जो आदमी जो बताए, वही लिखा जाएगा।
बस उसे ठीक शब्दों में लिखा जाएगा।
पिछले बरस फागुन में एक आदमी आया, जिसे तिलकधारी नहीं जानता था। वह पास के गाँव का था।
उसे मेड़ की शिकायत लिखवानी थी। पड़ोसी ने मेड़ खिसका ली है, तीन फ़ुट, और खिसकाने का काम बरसात में हुआ जब खेत ख़ाली था।
यह आम शिकायत है और तिलकधारी ने वह अच्छी लिखी।
उसने आदमी से वही पूछा जो वह हमेशा पूछता था। खसरा नंबर मालूम है या नहीं। पहले कभी शिकायत की थी या नहीं। पड़ोसी से पुरानी रंजिश है या नहीं। आदमी ने तीनों के जवाब दिए और तीनों जवाब सीधे थे।
आख़िरी सवाल तिलकधारी इसलिए पूछता था कि पुरानी रंजिश वाली शिकायत में कुछ शब्द बदलने पड़ते हैं। आदमी ने कहा कि कोई रंजिश नहीं है और यह झूठ था, पर झूठ पकड़ने का कोई तरीक़ा उस मेज़ पर नहीं है।
उसने उसमें वे चीज़ें डालीं जो चलती हैं। खसरा नंबर। पैमाइश की माँग। पूर्व में इस आशय की कोई शिकायत लंबित न होना। और अंत में यह कि प्रार्थी वृद्ध है और खेती ही एकमात्र साधन है।
आख़िरी वाक्य उसने अपनी तरफ़ से जोड़ा था, क्योंकि वह चलता है।
पैमाइश दो महीने बाद हुई।
नाप में मेड़ सचमुच खिसकी हुई निकली, पर दूसरी तरफ़। जिसने शिकायत की थी, उसी की मेड़ आगे थी।
यह होता है और इसमें कुछ अनोखा नहीं है। खेत की मेड़ हर जोत में थोड़ी सरकती है और तीन बरस में एक हल की चौड़ाई बन जाती है।
अनोखा यह हुआ कि पैमाइश की रिपोर्ट पर वह ज़मीन शिकायत करने वाले से लेकर पड़ोसी को दे दी गई, और उसके साथ नौ बरस पुराना एक और टुकड़ा भी चला गया, क्योंकि नाप पूरे खेत की हुई थी।
पड़ोसी के घर में उस बरस दो कम बीघे बचे।
दो बीघे उस इलाक़े में एक परिवार का चौथाई हिस्सा होते हैं। इसका मतलब यह नहीं होता कि घर उजड़ जाता है। इसका मतलब यह होता है कि उस घर का एक लड़का अगले बरस से बाहर कमाने जाता है, और वह जाता है।
तिलकधारी को यह छह महीने बाद पता चला और अपने आप पता चला। पड़ोसी का लड़का तहसील आया था, किसी और काम से, और उसने उसे पहचान लिया।
उसने पहचाना नहीं, अपनी लिखावट पहचानी।
अर्ज़ी पर दस्तख़त शिकायत करने वाले के थे। लिखावट तिलकधारी की थी। उस तहसील के बाहर लिखने वाला वही एक है।
लड़के ने उससे एक शब्द नहीं बोला। वह काग़ज़ लेकर चला गया।
तिलकधारी उस रात नहीं सोया और अगले दिन तहसील गया।
वह अंदर गया और उसने बाबू से कहा कि उस अर्ज़ी में जो आख़िरी वाक्य है, वह उसने अपनी तरफ़ से जोड़ा था।
बाबू ने पूछा कि उससे नाप पर क्या फ़र्क़ पड़ता।
तिलकधारी ने कहा कि नाप पर नहीं। पैमाइश जल्दी करानी है या नहीं, इस पर पड़ता है।
बाबू ने कहा कि अर्ज़ीनवीस वही लिखता है जो उससे कहा जाए, और बात ख़त्म हो गई।
बाबू ग़लत नहीं कह रहा था।
तिलकधारी अब भी वहीं बैठता है और अब भी वही वाक्य लिखता है, क्योंकि उनके अलावा कुछ चलता नहीं।
उस तहसील के रिकॉर्ड रूम में उसकी लिखावट वाली अर्ज़ियाँ रखी हैं। उसने एक बार अंदाज़ा लगाया था कि कितनी होंगी।
तीस बरस, महीने के लगभग ग्यारह काम के दिन उस गेट पर, दिन में औसतन दस से बारह अर्ज़ियाँ।
चार हज़ार से ऊपर।
उनमें से कितनी में जो लिखा है वह सच है, यह उसे कभी नहीं मालूम था और अब भी नहीं है।