सूरत के उस कारख़ाने में हर सुबह तराज़ू पहले खुलता था, कारीगर बाद में आते थे। मीना का काम यही था। वह हर कारीगर को पत्थर तौलकर देती, शाम को तौलकर वापस लेती, और बीच का फ़र्क़ रजिस्टर में लिखती। घिसाई में वज़न कम होता ही है। दो फ़ीसदी तक की कमी जायज़ मानी जाती है। इससे ज़्यादा हो तो कारीगर से पूछा जाता है।
कारख़ाने में साठ कारीगर थे, ज़्यादातर सौराष्ट्र से आए हुए। मीना का भाई हरेश भी उन्हीं में था, तीसरी क़तार में। उसी ने उसे यह नौकरी दिलाई थी, और उससे पहले जगदीश भाई ने, जो पचास साल से इसी लाइन में थे और जिन्होंने मीना को तराज़ू पढ़ना सिखाया था।
दिवाली से पहले सालाना मिलान होता है। मीना ने उस साल पहली बार पूरे रजिस्टर एक साथ देखे, बारह महीने के, और उसे एक बात खटकी। कमी हमेशा दो फ़ीसदी से थोड़ी कम रहती थी। हर कारीगर की। हर महीने। पूरे साल।
एक और अनदेखा मोड़
यह ग़लत था और इसकी वजह सीधी थी। घिसाई पत्थर पर निर्भर करती है। कोई पत्थर ज़्यादा खाता है, कोई कम। किसी कारीगर का हाथ भारी होता है, किसी का हल्का। बारह महीने में किसी न किसी की कमी कभी बहुत कम और कभी हद के पार जानी चाहिए थी। यहाँ कोई हद के पार नहीं गया था। एक बार भी नहीं।
मतलब यह था कि कमी असली नहीं थी। कोई हर पर्ची पर आँकड़ा बैठा रहा था, हद के ठीक नीचे, ताकि किसी से सवाल न हो। साठ कारीगर, तीन सौ दिन, हर दिन कुछ मिलीग्राम। मीना ने जोड़ा तो साल भर का हिसाब उसके अपने चार साल के वेतन से ज़्यादा निकला।
मीना ने एक काम और किया, जो उसे नहीं करना चाहिए था। तीन दिन तक उसने अपने हिसाब से भी तौला, अलग काग़ज़ पर, और शाम को अपना आँकड़ा रजिस्टर वाले आँकड़े से मिलाया। तीनों दिन उसका अपना आँकड़ा अलग निकला। कभी ज़्यादा, कभी कम, जैसा होना चाहिए। रजिस्टर वाला हर बार वही, हद के ठीक नीचे। काग़ज़ उसने फाड़ा नहीं। तह करके डिब्बे में रखा और घर ले गई।
रजिस्टर पर रोज़ दो दस्तख़त होते हैं। एक कारीगर का, एक तौलने वाले का। तौलने वाली वह थी। बारह महीने के हर पन्ने पर उसका नाम था। आँकड़े उसने ख़ुद नहीं बदले थे, पर उन्हें सही बताने वाला काग़ज़ उसी का था।
तौल के बाद रजिस्टर जगदीश भाई के पास जाता था, मिलान के लिए, और वहीं से मालिक के दफ़्तर। चाबी उन्हीं के पास रहती थी। उन्होंने ही मीना को सिखाया था कि हद के पास वाला आँकड़ा कभी सवाल खड़ा नहीं करता। यह बात उन्होंने सिखाते वक़्त हँसकर कही थी।
सबकी अपनी कहानी थी
मिलान की तारीख़ धनतेरस से चार दिन पहले थी। उस दिन मालिक ख़ुद बैठते हैं और रजिस्टर आमने-सामने पढ़े जाते हैं। मीना के पास नौ दिन थे। नौ दिन में या तो वह बोलती, या मिलान पर दस्तख़त कर देती और साल बंद हो जाता।
बोलने का मतलब सिर्फ़ जगदीश भाई नहीं थे। मिलान बिगड़ता तो कारख़ाना बंद होता, कम से कम जाँच तक। साठ कारीगरों की दिवाली थी। हरेश की भी। मीना ने यह हिसाब भी लगाया, और यही सबसे बुरा हिसाब था, क्योंकि इसमें उसका अपना घर शामिल था।
मिलान से एक दिन पहले उसने दफ़्तर में, मालिक के सामने, रजिस्टर खोलकर वह चीज़ दिखाई जो उसने देखी थी। उसने किसी का नाम नहीं लिया। उसने सिर्फ़ बारह महीने के आँकड़े क़तार में रखे और कहा कि ऐसा नहीं हो सकता। मालिक पंद्रह मिनट चुप रहे। फिर उन्होंने चपरासी को भेजकर जगदीश भाई को बुलवाया।
जाँच में कारख़ाना छब्बीस दिन बंद रहा। दिवाली उन्हीं छब्बीस दिनों में पड़ी। कारीगरों को उस महीने का पैसा नहीं मिला, क्योंकि पैसा तौल पर मिलता है और तौल बंद थी। जगदीश भाई पर मुक़दमा नहीं हुआ। मालिक ने उन्हें निकाल दिया और मामला बाहर नहीं गया, क्योंकि बाहर जाता तो साख जाती।
मालिक ने मीना से यह नहीं पूछा कि उसने पहले क्यों नहीं देखा। उन्होंने सिर्फ़ इतना पूछा कि क्या वह अदालत में भी यही कहेगी। मीना ने कहा कि वह वही कहेगी जो रजिस्टर में लिखा है। मालिक ने रजिस्टर बंद कर दिया और कहा कि अदालत तक बात नहीं जाएगी। बात अदालत तक नहीं गई।
कारख़ाना खुला तो मीना का काम वहीं था, पर तीसरी क़तार से कोई उससे बात नहीं करता था। हरेश ने चार महीने बाद बोलना शुरू किया और आज तक उस दिवाली का ज़िक्र नहीं किया। दो कारीगर उन छब्बीस दिनों में गाँव लौट गए और वापस नहीं आए।
जगदीश भाई को अब कतारगाम की एक छोटी इकाई में काम मिल गया है। मीना उन्हें कभी-कभी बस अड्डे पर देखती है, सुबह की शिफ़्ट के वक़्त। वे उसे देखते हैं और सिर हिला देते हैं, जैसे किसी जान-पहचान वाले को हिलाते हैं। मीना भी हिला देती है। इससे आगे दोनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा।