अंबिका के काम में सात सवाल थे और सातों के जवाब उसे पहले से मालूम होते थे।
वह डाकघर की बचत शाखा में थी और नवंबर में उसका काम जीवन प्रमाण था। जिन बुज़ुर्गों की पेंशन उस शाखा से जाती है, उन्हें हर साल यह साबित करना पड़ता है कि वे जीवित हैं। साबित करने का तरीक़ा यह है कि अंबिका उनके घर जाए, एक फ़ॉर्म भरे, अँगूठा लगवाए, और नीचे दस्तख़त करे।
फ़ॉर्म पर सात ख़ाने हैं। नाम। पिता या पति का नाम। पेंशन संख्या। पता। जन्म का बरस। और दो ख़ाने ऐसे जिन्हें कोई नहीं पढ़ता।
चौंसठ पेंशनधारी थे और उनतीस दिन थे।
यह काम उसने आठ बरस किया था। इन आठ बरसों में एक भी बार कोई मरा हुआ नहीं निकला। मिलते सब हैं। कोई खाट पर मिलता है, कोई दरवाज़े पर, कोई बहू के सहारे। अँगूठा लगता है और काम हो जाता है।
इसीलिए वे सवाल मर चुके थे। पूछे जाते थे, जवाब आते थे, और कोई सुनता नहीं था।
उस बरस की गड़बड़ पहले दिन दिख गई थी और अंबिका ने उसे पहले दिन नहीं देखा।
नारायणी देवी का प्रमाण पत्र हर बरस पहले ही दिन जमा हो जाता था।
बाक़ी सब महीने भर में फैले रहते थे, क्योंकि अंबिका का रास्ता एक ही दिन में पूरा नहीं होता। नारायणी देवी का हर बार पहली तारीख़ को, हर बार भरा हुआ, हर बार अँगूठे समेत। छह बरस से।
यह उसे इस बरस दिखा और इसकी वजह भी मामूली थी। इस बरस उसने पिछले बरसों के काग़ज़ एक साथ निकाले, क्योंकि दो दिसंबर को शाखा की जाँच होनी थी और फ़ाइल क़तार में लगानी थी।
छह काग़ज़, छह बरस, छह बार पहली तारीख़।
अँगूठे के निशान भी उसने देखे। वे एक जैसे नहीं थे, जो ठीक बात है, क्योंकि अँगूठा हर बार एक जैसा नहीं उतरता। पर वे इतने भी अलग नहीं थे कि कुछ कहा जा सके।
नारायणी देवी उसके अपने रास्ते पर हैं, नहर वाली बस्ती में, और उन्हें अंबिका ने आठ बरस में कुल दो बार देखा था। दोनों बार शुरू के बरसों में।
वह चौदह नवंबर को उनके घर गई।
त्रिलोकी दरवाज़े पर मिला। उसने कहा कि माँ आराम कर रही हैं और प्रमाण पत्र तो पहले ही जमा हो चुका है।
अंबिका ने कहा कि वह बस मिल लेगी।
त्रिलोकी ने उसे बिठाया, पानी दिया, और बात करता रहा। बीस मिनट में उसने तीन बार यह कहा कि माँ आराम कर रही हैं। तीसरी बार उसने यह भी जोड़ दिया कि उन्हें अब कुछ याद नहीं रहता।
यह जोड़ने की ज़रूरत नहीं थी और यहीं से बात खुल गई।
नारायणी देवी उस घर में नहीं थीं।
त्रिलोकी ने आख़िर में बता दिया। माँ तीन बरस से उनकी बहन के पास हैं, दूसरे ज़िले में, क्योंकि उन्हें अब चौबीस घंटे कोई चाहिए और यहाँ कोई है नहीं। वे ज़िंदा हैं। वे बीमार हैं। और वे अब किसी को नहीं पहचानतीं।
पेंशन उसी खाते में आती है और वह खाता यहीं का है।
त्रिलोकी ने खाता वहाँ नहीं करवाया, क्योंकि खाता बदलने में आठ महीने लगते हैं और उन आठ महीनों में पेंशन रुकती है। उस घर में पेंशन के अलावा तय आमदनी कुछ नहीं है। बहन के घर हर महीने पैसा वहीं से जाता है।
अंबिका के सामने अब तीन रास्ते थे और तीनों तीस नवंबर तक ख़त्म हो जाने थे।
पहला यह कि वह सच लिखकर भेज दे। यह उसका काम था और इसमें वह कहीं ग़लत नहीं होती। नतीजा यह होता कि पेंशन उसी महीने रुक जाती और खाता बदलने में आठ महीने लगते, और उन आठ महीनों का बोझ एक ऐसी औरत पर पड़ता जो अपना नाम भी शायद न बता सके।
दूसरा यह कि वह कुछ न लिखे। दो दिसंबर की जाँच में वह ख़ाना ख़ाली मिलता और आठ बरस का उसका अपना रिकॉर्ड उसी एक ख़ाने पर टिक जाता।
तीसरा वह था जो नियम में लिखा ही नहीं है।
जीवन प्रमाण उस जगह भी बन सकता है जहाँ पेंशनधारी मौजूद हो। किसी भी डाकघर से, किसी भी अधिकारी के सामने। बस उसे वहाँ जाना पड़ता है, और अंबिका का क्षेत्र नहर वाली बस्ती तक है, उससे आगे नहीं।
वह छब्बीस नवंबर को निकली। छुट्टी उसने अपनी लगाई और किराया अपना दिया।
बस साढ़े पाँच घंटे की थी और उसके बाद टेंपो। गाँव मिलने में उसे दो घंटे और लगे, क्योंकि पते में मोहल्ला नहीं लिखा था।
नारायणी देवी बरामदे में थीं, चारपाई पर, धूप में।
बहन ने बताया कि वे बोलती कम हैं और जो बोलती हैं उसका सिलसिला नहीं होता। उन्होंने अंबिका को देखा और फिर धूप की तरफ़ देखने लगीं।
वहाँ के डाकघर वाले ने आना ठीक कर लिया। वह शाम को आया, फ़ॉर्म लाया, और चारपाई के पास बैठ गया।
उसने सात सवाल पूछे।
पिता का नाम उन्हें याद नहीं आया। पेंशन संख्या का सवाल उन पर पूछा ही नहीं गया, वह काग़ज़ से उतारा गया। पता उन्होंने जो बताया वह उस गाँव का नहीं था, किसी और जगह का था, शायद बचपन वाली। जन्म का बरस उन्होंने नहीं बताया।
अँगूठे के लिए उनका हाथ उठाना पड़ा। स्याही लगी। अंबिका ने उनकी हथेली पकड़कर अँगूठा काग़ज़ पर रखा और दबाया।
उसी वक़्त उन्होंने कहा कि उनका नाम नारायणी है।
किसी ने वह सवाल दोबारा नहीं पूछा था। वह पहला सवाल था और उसका जवाब वे पंद्रह मिनट पहले दे चुकी थीं।
अंबिका ने काग़ज़ उठाकर देखा। पहला ख़ाना पहले से भरा हुआ था, उसी के हाथ का लिखा।
वह वहाँ कुछ देर और बैठी रही, फिर उसने बहन से पूछा कि क्या वे यह अक्सर कहती हैं।
बहन ने कहा कि दिन में कई बार। बिना किसी के पूछे।