कैलाश के साथ हमेशा कुछ न कुछ हो जाता था। जिस काम में हाथ डालता, उसमें कोई अड़चन आ जाती। पहले उसने इसे बदक़िस्मती समझा। फिर उसे लगा कि शायद उसका काम ही ऐसा है, क्योंकि उसका काम ज़िंदा चीज़ों का था और ज़िंदा चीज़ें आदमी के हिसाब से नहीं चलतीं।

उसके पास मधुमक्खी के अस्सी बक्से थे। जाड़ों में वे भरतपुर के आसपास सरसों में लगते, फ़रवरी के बाद ट्रक पर चढ़कर आगे जाते, और मई-जून में यूकेलिप्टस पर। हर साल का रास्ता लगभग वही रहता था। बक्से रात में लादे जाते हैं, जब सारी मक्खियाँ भीतर होती हैं, और सुबह होने से पहले नई जगह उतार दिए जाते हैं।

जो चीज़ें ग़लत होती थीं, वे लंबी सूची थी। कॉलोनी छोड़कर भाग जाती। रानी रास्ते में मर जाती। ट्रक लेट हो जाता और दिन चढ़ने पर बक्से खोलने पड़ते। एक बार पूरे मौसम की शहद बारिश में भीग गई। कैलाश हिसाब लगाता तो हर साल दो-तीन ऐसी चीज़ें निकलतीं, और इतने साल में उसने इन पर नाराज़ होना छोड़ दिया था।

उस जनवरी में जो हुआ, वह इस सूची में नहीं था। रामसरूप के खेत के किनारे उसके चालीस बक्से रखे थे, और रामसरूप ने फूल आने के बीच में दवा छिड़क दी, दोपहर को, जब मक्खियाँ बाहर थीं।

शाम तक बक्सों के सामने ढेर लग गया था। कैलाश ने वह देखा है जिसे देखने के बाद आदमी दो दिन चुप रहता है। चालीस में से इकतीस कॉलोनियाँ उस हफ़्ते ख़त्म हो गईं। बाक़ी नौ कमज़ोर हो गईं और उनमें से चार बाद में भागीं।

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गाँव में एक ही राय थी। थाने में लिखवाओ, कृषि विभाग में शिकायत करो, और मुआवज़े का दावा ठोको। एक आदमी ने यह भी कहा कि रामसरूप ने जानबूझकर किया होगा, क्योंकि पिछले साल बक्सों की जगह को लेकर दोनों में कहासुनी हुई थी।

कैलाश ने दो रातें इसी पर लगाईं, और वह जगह से नहीं, हिसाब से पहुँचा। सरसों में मधुमक्खी बैठे तो दाना बेहतर बैठता है और पैदावार बढ़ती है, कहीं दस प्रतिशत, कहीं उससे ज़्यादा। यह उसके काम की सबसे बुनियादी बात थी। रामसरूप का खेत उन्हीं मक्खियों से फ़ायदे में था। कोई आदमी अपनी ही पैदावार गिराने के लिए दुश्मनी नहीं निकालता।

मतलब यह था कि रामसरूप को यह मालूम ही नहीं था। और सोचकर देखा जाए तो उसे मालूम होता कहाँ से। यह बात न रेडियो पर आती है, न पर्ची पर लिखी होती है, और दुकानदार दवा बेचते वक़्त यह नहीं बताता कि छिड़काव शाम को करना है, जब मक्खियाँ भीतर जा चुकी हों।

यह मान लेना कोई ऊँची बात नहीं थी। इसकी क़ीमत थी। क़ीमत साफ़ थी। रिपोर्ट लिखवाने पर मुआवज़े का दावा बनता, कमज़ोर बनता पर बनता, और उसमें कुछ न कुछ मिल ही जाता। न लिखवाने पर कुछ नहीं मिलता। इकतीस कॉलोनियाँ दोबारा खड़ी करने में उसे दो मौसम लगे और लगभग एक लाख नब्बे हज़ार लगे।

कॉलोनी दोबारा खड़ी करना ख़रीदने जैसा नहीं होता। मज़बूत बक्से में से फ़्रेम निकालकर नया बक्सा बनाया जाता है, और उसमें रानी डालनी पड़ती है, जो या तो पाली जाती है या मँगाई जाती है। नई कॉलोनी पहले साल शहद नहीं देती। वह खाती है। जुलाई से सितंबर तक फूल कम रहते हैं और उन तीन महीनों में हर हफ़्ते, हर बक्से में चीनी का घोल देना पड़ता है। यह सब एक आदमी अकेले करता है।

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वह रामसरूप के पास गया। शिकायत नहीं की। उसने एक ही बात बताई, और डिब्बा साथ ले गया ताकि दिखा सके। यह कि दवा शाम को छिड़कने से मक्खी भी बच जाती है और दवा भी उतनी ही चलती है, क्योंकि फ़सल को फ़र्क़ नहीं पड़ता कि सुबह पड़ी या शाम को।

रामसरूप ने पूरी बात सुनी। फिर उसने वह पूछा जो कैलाश ने नहीं सोचा था। उसने पूछा कि तुम्हारे बक्से मेरे खेत के किनारे क्यों रखे रहते हैं, इसका मुझे क्या मिलता है। कैलाश ने उसे बताया कि उसे क्या मिलता है, और यह पहली बार था जब उस गाँव में किसी ने यह सुना।

अगले साल उसने शाम को छिड़का। ब्लॉक के ग्यारह में से दो और किसानों ने भी ऐसा किया, वे दोनों रामसरूप के भाई थे। बाक़ी नौ ने पहले की तरह ही किया, क्योंकि दोपहर में छिड़कना सुविधाजनक है और नुक़सान किसी और का होता है।

नुक़सान फिर भी बंद नहीं हुआ। अगले चार बरसों में उसने तीन बार और कॉलोनियाँ खोईं, एक बार बीस, दो बार आठ-आठ। हर बार वही किया, यानी बताया और चला आया, और हर बार यह सोचकर नहीं किया कि इससे कुछ बदलेगा।

एक चीज़ ज़रूर बदली। वह उसने ख़ुद की। अब वह अस्सी बक्से एक जगह नहीं रखता। चार अलग-अलग खेतों के किनारे बीस-बीस के हिस्से में रखता है, कम से कम डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर, ताकि एक आदमी की एक दोपहर सब कुछ न ले जाए। यह उसने रामसरूप वाले साल के बाद सीखा और इसमें उसे ज़्यादा घूमना पड़ता है और डीज़ल ज़्यादा लगता है।

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रामसरूप के खेत के किनारे अब भी बक्से रहते हैं। दो साल पहले कैलाश ने उसे एक बक्सा दे दिया, अपना, बिना पैसे के, और शहद निकालना भी सिखा दिया। इसमें कोई उदारता नहीं थी। कैलाश यह मानता भी है। जिस आदमी के अपने खेत के किनारे अपना बक्सा रखा हो, वह दोपहर को दवा नहीं छिड़कता।