तेजपाल चार बजे उठ जाता था। खेत के लिए नहीं। उस वक़्त गाँव का हैंडपंप ख़ाली रहता था, और वह बूढ़ी फुलकुँवर के दो घड़े भरकर उनके दरवाज़े पर रख आता था। जेठ की दोपहरी हो या पूस की सुबह, घड़े वहाँ रहते थे। फुलकुँवर के घुटने बहुत पहले जवाब दे चुके थे और उनका इकलौता लड़का सूरत में था, जहाँ से साल में एक बार पैसे आते थे और तीन बार फ़ोन।

यह काम उसने किसी से कहकर शुरू नहीं किया था। तेजपाल चौदह का था जब उसके बापू गए। क्रिया के सात सौ रुपये फुलकुँवर के आदमी ने दिए थे और उसकी माँ से कभी वापस नहीं माँगे। यह बात तेजपाल को उन्नीस की उम्र में मालूम हुई, किसी तीसरे से। अगले महीने से घड़े जाने लगे।

तेजपाल का अपना काम बस अड्डे पर था। टीन का एक खोखा, एक भट्ठी, दो केतली, और सामने चार बेंच। पाँच बजकर दस पर पहली बस लगती थी और सवारियाँ आठ-दस मिनट उतरती थीं। उन आठ मिनटों में जितनी चाय बिकती थी, बाक़ी पूरे दिन में उतनी नहीं बिकती थी। पहली बस के तीन सौ, और दिन भर के डेढ़ सौ। यह हिसाब ग्यारह साल से वैसा ही चला आ रहा था।

सुबह की घड़ी उसकी बँधी हुई थी। चार बजे उठना, सवा चार तक दोनों घड़े, फिर घर, फिर साइकिल, और पौने पाँच पर खोखे का ताला। जब तक बस मोड़ पर आती, दूध उबल चुका होता था। यह क्रम कभी नहीं टूटा। इसीलिए तेजपाल के मन में यह बात कभी उठी ही नहीं कि दोनों काम एक ही घड़ी पर टिके हुए हैं।

उस साल गाँव में पानी की टंकी बनी। पाइप बिछे, आँगनों में नल लगे, और सुबह छह से पौने सात तक लाइन में पानी आने लगा। दो महीने बाद ब्लॉक से आदमी आए और हैंडपंपों के हत्थे खोलकर ट्रैक्टर में रख लिए। कहा गया कि अब हर घर में नल है और खुले हैंडपंप का पानी वैसे भी जाँचा हुआ नहीं होता। गाँव को इसमें कोई बुराई नहीं दिखी। बात सही भी थी। नल घर के भीतर था और हैंडपंप कोने पर।

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फुलकुँवर के यहाँ नल नहीं लगा। वजह कोई काग़ज़ नहीं था। वजह पाइप था। पाइप मुख्य गली तक आया और वहीं ख़त्म हो गया, क्योंकि जितना पाइप आया था उतना ही बिछा, और पीछे वाली गली के ग्यारह घर साठ फुट से रह गए। उन ग्यारह में से दस के अपने लोग सामने वाली गली में थे और वे वहीं से भर लाते थे। बाक़ी एक घर बचा। फुलकुँवर के लिए भरने वाला उस गाँव में एक ही आदमी था।

अब सबसे नज़दीक का चालू हैंडपंप स्कूल के अहाते में था, सोलह सौ मीटर दूर। तेजपाल ने साइकिल के पीछे कैरियर पर दो घड़े बाँधने का जुगाड़ बनाया और उठने का वक़्त साढ़े तीन कर दिया। जाना, भरना, लौटना, रखना। पाँच बजकर पाँच। पहली बस पाँच बजकर दस पर। पहले हफ़्ते उसने दौड़कर दोनों करने की कोशिश की और दो दिन खोखा खुला मिला भी, बस के आने के बाद।

खेमचंद की दुकान दो खोखे छोड़कर थी और वह पाँच बजे खुलती थी। पहले हफ़्ते चार सवारियाँ उधर गईं। दूसरे हफ़्ते आठ। फिर गिनती छोड़ दी। महीना बीतते-बीतते कंडक्टर ने अपनी चाय भी वहीं से लेनी शुरू कर दी, और जहाँ कंडक्टर उतरता है वहीं सवारी उतरती है। बस वहीं लगने लगी। तेजपाल का पहली बस वाला तीन सौ घटकर पचास पर आ गया, और उसमें से भी ज़्यादातर वे लोग थे जो ग्यारह साल की आदत से चले आते थे।

घर में यह बात एक ही बार खुलकर हुई। बड़ा लड़का सोलह का था और शाम को गल्ला वही गिनता था। उसने एक कापी पर तीन महीने का हिसाब जोड़कर बापू के सामने रख दिया। साढ़े तीन बजे उठने की क़ीमत महीने के सात हज़ार थी। तेजपाल ने कापी देखी और लौटा दी। जोड़ में कोई ग़लती नहीं थी। उस रात कोई और बात नहीं हुई और सुबह वह उसी वक़्त उठा।

उसने रास्ता निकालने की कोशिश भी की। पड़ोस के लड़के को तीन सौ रुपये महीने पर तय किया कि वह सुबह घड़े भर आया करे। लड़का नौ दिन गया। दसवें दिन नहीं उठा, ग्यारहवें दिन एक घड़ा आधा लाया, बारहवें दिन उसकी माँ ने कहला भेजा कि पढ़ाई का नुक़सान हो रहा है। तेजपाल ने पैसे वापस नहीं माँगे और अगली सुबह ख़ुद साढ़े तीन बजे उठ गया।

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फिर किसी ने फुलकुँवर को दुकान की बात बता दी। उस शाम उन्होंने दोनों घड़े उलटकर दरवाज़े के भीतर रख दिए, और तेजपाल के आने पर दरवाज़ा नहीं खोला। चार दिन ऐसे बीते। घड़े भीतर ही रहे। पड़ोस की लड़की शाम को आधी बाल्टी दे जाती थी और उतने में नहाना, पीना और बर्तन तीनों होते थे।

पाँचवें दिन तेजपाल भीतर चला गया। फुलकुँवर एक लोटा ढककर सुबह से रखे बैठी थीं और दोपहर तक उसी में से पी रही थीं। लोटे के पानी में पीतल की गंध आ चुकी थी। तेजपाल ने दोनों घड़े सीधे किए और बाहर रख दिए। उसने इतना ही कहा कि हत्थे वापस आ जाएँगे। अगली सुबह वह साढ़े तीन बजे स्कूल के अहाते में था।

ग्यारह महीने बाद, अगली होली के आसपास, वह खोखे का चालीस रुपया रोज़ का किराया नहीं दे पाया और उसे छोड़ दिया। अब वह पुलिया के पास ज़मीन पर मेज़ लगाकर बेचता है, जहाँ दूसरी और तीसरी बस रुकती है। दिन के एक सौ दस बनते हैं। भट्ठी वही है। केतली एक बिक गई।

टंकी वाली लाइन तीसरे साल से आठ महीने सूखी रहने लगी, क्योंकि बोरवेल का पानी नीचे चला गया और नई मोटर का पैसा कहीं अटक गया। उसके बाद ब्लॉक ने हत्थे वापस भिजवा दिए। एक ट्रैक्टर में, जैसे ले गए थे। कोने वाला हैंडपंप फिर चलने लगा और पूरे गाँव की मुश्किल एक दोपहर में ख़त्म हो गई।

अब भी वह चार बजे उठता है। कोने तक जाना है और दो घड़े भरने में ग्यारह मिनट लगते हैं। उसके बाद सुबह पूरी ख़ाली पड़ी रहती है। पाँच बजकर दस पर पहली बस मोड़ पर आती है और तेजपाल उसे आते हुए देखता है, अड्डे पर खड़ा, खेमचंद की दुकान की चाय हाथ में लिए। छह रुपये की। पहले भी वह इसी वक़्त वहीं होता था, बस काउंटर की दूसरी तरफ़।