यूसुफ़ उस रूट पर नौ बरस से टिकट जाँच रहा था।

रात की गाड़ी में जाँच दिन से अलग होती है। लोग सो रहे होते हैं और उन्हें जगाना पड़ता है, और जगाया हुआ आदमी ठीक से बात नहीं करता। इसीलिए ज़्यादातर जाँचने वाले रात के डिब्बों में तेज़ी से निकल जाते हैं और सिर्फ़ उन्हीं को रोकते हैं जो जागे हुए बैठे हों।

उसका काम सीधा था। बिना टिकट मिलने पर किराया और जुर्माना, दोनों वसूलना, रसीद काटना, और न देने पर अगले स्टेशन पर उतार देना।

इसमें कोई नरमी नहीं होती और इसकी वजह भी है। नरमी दिखाने पर उसी डिब्बे में बैठे बाक़ी लोग अगली बार टिकट नहीं लेते, और यह बात उसने अपनी नौकरी के पहले बरस में देख ली थी। वह लड़का उसे रात के डिब्बे में मिला।

उम्र चौदह-पंद्रह। कपड़े साफ़ थे पर पुराने थे। वह दरवाज़े के पास वाली सीट पर बैठा था और उसके पास कोई सामान नहीं था। टिकट माँगने पर उसने जेब से एक काग़ज़ निकाला, जो टिकट नहीं था। वह अस्पताल की पर्ची थी।

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यूसुफ़ ने उसे पढ़ा। उसमें एक औरत का नाम था और नीचे तारीख़ थी, उसी दिन की। "तेरी कौन है?" "माँ।" "कहाँ है?" "गोरखपुर में। मेडिकल कॉलेज।" "टिकट क्यों नहीं लिया?" "खिड़की बंद थी। गाड़ी छूट रही थी।" यह जवाब सच भी हो सकता था और गढ़ा हुआ भी। यूसुफ़ ने नौ बरस में इससे अच्छी कहानियाँ सुनी थीं।

उसने लड़के से पूछा कि उसके पास कितने पैसे हैं। लड़के ने जेब से जो निकाला वह अड़तीस रुपये था। किराया दो सौ दस बनता था और जुर्माना दो सौ पचास। यूसुफ़ ने रसीद बुक निकाली और उस पर तारीख़ लिखने के लिए क़लम खोला।

फिर उसने उसे वापस रख दिया और लड़के से कहा कि बैठा रह। वह आगे बढ़ गया और उसने बाक़ी पूरा डिब्बा जाँचा, दोनों तरफ़ की सब सीटें। लौटते वक़्त उसने उस लड़के की तरफ़ नहीं देखा और वह भी अपनी जगह बैठा रहा।

यह मामला यहीं ख़त्म हो जाता, अगर वह वहीं छोड़ देता। पर उसने वहीं नहीं छोड़ा।

उस रात का जो हिसाब उसे जमा करना था उसमें एक सीट की गिनती कम पड़ती। गाड़ी में बैठा हर आदमी या तो टिकट वाला होता है या रसीद वाला। तीसरा कोई नहीं होता, और गिनती मिलती है। उसने अगले स्टेशन पर उतरकर चार सौ साठ रुपये अपनी जेब से जमा किए और रसीद काट दी।

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यह करते वक़्त उसे यह ख़याल नहीं आया कि इसका कोई नतीजा निकल सकता है। उसे लगा कि हिसाब बराबर है, पैसा जमा है, और सरकार का कुछ नहीं गया। यही सोच ग़लत थी, इसलिए नहीं कि नीयत ख़राब थी, बल्कि इसलिए कि रसीद सिर्फ़ पैसे का काग़ज़ नहीं होती, वह इस बात का काग़ज़ भी होती है कि कौन कहाँ से चढ़ा था।

रसीद पर नाम उसने वही लिखा जो पर्ची पर था, यानी लड़के की माँ का, क्योंकि लड़के का नाम उसने पूछा नहीं था। यह उसने जानबूझकर नहीं किया। वह जल्दी में था और वही एक नाम उसके सामने था। चार सौ साठ रुपये उस वक़्त उसकी दो दिन की तनख़्वाह के बराबर थे।

मामला सात महीने बाद खुला और उसकी वजह वह ख़ुद नहीं था।

साल के आख़िर में जो जाँच होती है उसमें रसीदों के नाम और पते मिलाए जाते हैं और उस रसीद का पता किसी से नहीं मिला, क्योंकि पर्ची पर पता था ही नहीं और यूसुफ़ ने उसकी जगह अपने ही शहर का मोहल्ला लिख दिया था।

उससे पूछताछ हुई, दफ़्तर में, दो अफ़सरों के सामने। उससे यह पूछा गया कि रसीद किसकी है और वसूली कहाँ से हुई। उसके पास दो रास्ते थे। वह कह सकता था कि याद नहीं, जो सात महीने बाद बिलकुल मुमकिन बात है और जिस पर कोई ज़्यादा खोदता नहीं।

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उसने सच बता दिया, शुरू से आख़िर तक। उसने यह भी बता दिया कि पैसा उसने अपनी जेब से भरा था। उससे लड़के का नाम और पता पूछा गया। यह उसने नहीं बताया, और इसकी वजह यह थी कि उसे मालूम ही नहीं था। उसने उस रात कुछ नहीं पूछा था।

जाँच में यह माना गया कि उसने पैसे का गबन नहीं किया। यह साफ़ था, क्योंकि पैसा जमा हो चुका था। जो माना गया वह यह था कि उसने रसीद ग़लत जानकारी पर काटी, और यह अनियमितता है। उसे चेतावनी मिली और उसकी उस बरस की तरक़्क़ी रुक गई।

जाँच करने वाले अफ़सर ने उससे अलग में एक बात कही, कि अगर वह याद नहीं कहकर टाल देता तो मामला वहीं ख़त्म हो जाता। यह उसने ताना मारकर नहीं कहा, समझाकर कहा, और यूसुफ़ ने इसका कोई जवाब नहीं दिया क्योंकि उसके पास जवाब था ही नहीं।

तरक़्क़ी रुकने का मतलब सिर्फ़ एक बरस नहीं होता। जो आदमी एक बरस पीछे हो जाता है वह अपनी बैच से पीछे ही रहता है, और यूसुफ़ के साथ यही हुआ। उसने इसकी अपील नहीं की, हालाँकि अपील का हक़ उसके पास था और उसकी मियाद भी बाक़ी थी।

उस लड़के के बारे में उसे कभी कुछ पता नहीं चला। उसकी माँ बची या नहीं, यह भी नहीं।

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उसने रसीद बुक की वह पर्ची वाली प्रति अपने पास नहीं रखी, क्योंकि वह विभाग की चीज़ थी और जाँच में चली गई। उसके पास जो रह गया वह उस दिन का जमा वाला काग़ज़ था, जिस पर उसके अपने हाथ का लिखा हुआ चार सौ साठ है, और वह उसके पुराने काग़ज़ों में कहीं पड़ा है।