उस डिपो से रोज़ इकतालीस बसें निकलती थीं और उनमें से नौ लंबे रूट पर जाती थीं। तिरखा को गोरखपुर वाला रूट मिला था, जो साढ़े पाँच घंटे का था और जिसमें ग्यारह जगह ठहराव थे। काम का तरीक़ा उसे पहले हफ़्ते में समझा दिया गया। किसी ने छिपाया नहीं।

समझाने वाला उसका ही एक साथी था, जो उसी दिन ड्यूटी पर था और जिसने यह सब बिना छिपाए बताया, जैसे कोई नए आदमी को मशीन चलाना सिखाता है।

तरीक़ा यह था कि हर फेरे में बीस-पच्चीस सवारियाँ बिना टिकट बिठाई जाती थीं, ज़्यादातर छोटे ठहरावों से चढ़ने वाली, जो पंद्रह-बीस रुपये वाली होती थीं। उनसे पैसा लिया जाता था, टिकट नहीं दिया जाता था। उस पैसे का हिसाब भी बना हुआ था। उसमें से कंडक्टर का हिस्सा, ड्राइवर का हिस्सा, और ऊपर जाने वाला हिस्सा तय था।

एक फेरे में यह चार-पाँच सौ बैठता था। महीने में यह तनख़्वाह के बराबर हो जाता था। तिरखा ने पहले दिन टिकट काटा।

उसकी नौकरी उस बरस लगी थी और वह उसे किसी सिफ़ारिश से नहीं मिली थी। उसने लिखित इम्तिहान दिया था और उसमें उसका नंबर आया था, और यह उसके घर में सबसे बड़ी बात मानी गई थी, क्योंकि उसके बाप ने चालीस बरस खेत में काटे थे और सरकारी काग़ज़ उनके हाथ में कभी नहीं आया था।

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सबका। एक भी नहीं छोड़ा।

उसने इस पर कोई भाषण नहीं दिया और उसने किसी से यह नहीं कहा कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। जब सवारी ने पैसा दिया, उसने पंच मारा और टिकट थमा दिया। पहले हफ़्ते किसी ने कुछ नहीं कहा। सब देखते रहे। नया आदमी है, डर रहा है, सीख जाएगा।

तीसरे हफ़्ते ड्राइवर ने उससे बात की। रास्ते में, चाय पर।

उसने कहा कि तेरा जो करना है कर, पर मेरा हिस्सा मार रहा है। यह बात उसने ग़ुस्से में नहीं कही और उसमें दम भी था, क्योंकि ड्राइवर की तनख़्वाह उसी की जितनी थी और उसका घर भी उसी के जितना था।

तिरखा ने कहा कि वह किसी को नहीं रोक रहा। यह सच था। और काफ़ी नहीं था। "तू टिकट काटेगा तो मैं किसको बिना टिकट बिठाऊँगा?" इसका जवाब उसके पास नहीं था। अगले महीने से उसकी ड्यूटी बदल दी गई।

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यह उससे कहकर नहीं किया गया। ड्यूटी की सूची हर महीने की पहली तारीख़ को नोटिस बोर्ड पर लगती थी और उस पर नाम के आगे रूट लिखा रहता था। उसने अपना नाम ढूँढ़ा और उसके आगे शहर वाला नंबर लिखा था। उसने किसी से पूछा नहीं और किसी ने उसे बताया नहीं।

उसे शहर के भीतर वाले रूट पर डाल दिया गया, जो दो घंटे का था और जिसमें भीड़ ज़्यादा और पैसा कम था। यह गिरावट नहीं मानी जाती, इसलिए इसकी शिकायत नहीं हो सकती। छह महीने बाद उसकी छुट्टियों की अर्ज़ी लटक गई। वजह कोई नहीं बताई गई।

आठवें महीने उसकी बस का चेकिंग स्क्वाड ने औचक निरीक्षण किया, जो महीने में एक बार किसी न किसी बस में होता है। उसकी बस में सब सवारियाँ टिकट वाली निकलीं। पूरी बस। यह रिकॉर्ड में गया और उससे कुछ नहीं हुआ। न इनाम आया, न ज़िक्र हुआ। रिकॉर्ड में यह लिखा जाता है और उसे कोई पढ़ता नहीं।

उसी बरस डिपो में एक बड़ी जाँच बैठी, जिसकी वजह तिरखा नहीं था। वजह यह थी कि दो बसों की कमाई का फ़र्क़ इतना बढ़ गया था कि ऊपर से सवाल आ गया। जाँच में सत्रह लोगों के नाम आए। तिरखा का नाम नहीं था।

जाँच का नतीजा यह निकला कि चार लोगों का तबादला हुआ और बाक़ी तेरह पर कुछ नहीं हुआ। इसके बाद डिपो में उसे लेकर जो रवैया था वह बदल गया, पर वह अच्छे की तरफ़ नहीं बदला।

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अब उसे शक की नज़र से देखा जाने लगा। जिन लोगों के नाम आए थे उन्हें लगा कि उसी ने कुछ किया होगा, हालाँकि उसने कुछ नहीं किया था और यह बात साबित करने का कोई तरीक़ा नहीं था। वह उसी डिपो में इक्कीस बरस और रहा।

इक्कीस बरस लंबा वक़्त होता है और उसमें बहुत कुछ बदलता है। डिपो में तीन बार बड़े साहब बदले। बसें बदलीं, दो बार। जो लोग उसके साथ लगे थे उनमें से कुछ ऊपर चले गए और कुछ चले गए। तिरखा वहीं रहा और उसने वही किया जो वह पहले दिन से करता आया था, और इक्कीस बरस में यह किसी के लिए ख़बर नहीं रहा।

उसे कभी लंबा रूट दोबारा नहीं मिला। इक्कीस बरस में एक बार भी नहीं। उसकी तरक़्क़ी वक़्त के हिसाब से होती रही, जो अपने आप होती है, और उससे ज़्यादा कुछ नहीं हुआ। उसके दोनों लड़के पढ़ गए और यह उसकी तनख़्वाह से हुआ, जिसमें कभी कुछ जुड़ा नहीं।

रिटायर होते वक़्त उसे जो सामान वापस करना था उसमें टिकट का पंच भी था, जो लोहे का था और जो इक्कीस बरस से उसी के पास था। स्टोर वाले ने उसे लेकर तौल वाले डिब्बे में डाल दिया, क्योंकि तब तक मशीन आ चुकी थी और पंच किसी काम के नहीं रह गए थे।