बत्ती में इक्यावन सेकंड बाक़ी थे। जीतू की पीठ पर बैग का खाना ठंडा हो रहा था।

इंदौर में नौतपा शुरू हो चुका था। सुबह ग्यारह बजे के बाद सड़क का तारकोल नरम पड़ जाता है और स्टैंड लगाओ तो वह धँस जाता है। दोपहर में हेलमेट अंदर से गरम लगता है, जैसे किसी ने अभी-अभी उतारा हो।

जीतू बाईस बरस का था और चौदह महीने से यही काम कर रहा था।

उसकी गाड़ी बाप की पुरानी स्प्लेंडर थी, जिसमें चेन की आवाज़ आती थी और जिसे वह हर इतवार को ख़ुद कसता था। महीने में वह डेढ़ सौ के आसपास ऑर्डर मारता था। जून में चार हज़ार का बोनस वाले पंद्रह लोगों में उसका नंबर था, अगर औसत बना रहे।

औसत हब का भी होता है और यही उसकी शिकायत थी।

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ऋषभ हब चलाता था, छब्बीस बरस का लड़का, जिसके पास एक लैपटॉप और एक कुर्सी थी। हफ़्ते में एक बार वह सबको खड़ा करके नंबर पढ़ता था। कितने ऑर्डर लेट, कितनी बार गाड़ी रुकी दिखी, कितने ग्राहकों ने शिकायत की।

हब में एक ही आदमी था जिसका नाम हर हफ़्ते आता था।

हीरालाल पचपन के थे। उससे पहले सत्रह बरस टेंपो चलाया था, फिर घुटने ने जवाब दे दिया, और अब वे इसी काम में थे। कम बोलते थे, अलग बैठते थे, और गमछे का एक टुकड़ा हमेशा भीगा रखते थे। 'सर, हब का एवरेज इन्हीं की वजह से गिरा है,' जीतू ने एक दिन सबके सामने कहा।

ऋषभ ने कुछ जवाब नहीं दिया, पर लैपटॉप की तरफ़ देखा। अगले हफ़्ते जीतू ने फिर कहा। इस बार उसने आँकड़ा भी दिया। पिछले महीने हब में जितनी बार 'गाड़ी नहीं चल रही' वाला निशान लगा, उसका एक तिहाई अकेले हीरालाल की आईडी पर था।

हीरालाल वहीं बैठे थे और उन्होंने सिर नहीं उठाया।

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उसी हफ़्ते ऋषभ ने उन्हें अलग बुलाकर कहा कि ऊपर से समीक्षा बैठ गई है, और जिसकी आईडी पर सबसे ज़्यादा निशान हैं वह महीने के आख़िर में बंद हो जाएगी। छब्बीस मई को जीतू की चेन राजवाड़े के पास टूट गई।

उसके बैग में दो ऑर्डर थे, दोनों गरम खाने के, और दोनों की घड़ी चल रही थी। सड़क के उस हिस्से में मैकेनिक ढाई बजे से पहले नहीं खुलता। हीरालाल उधर से निकले। उन्होंने गाड़ी रोकी, बैग खोलने को कहा, और दोनों डिब्बे अपने बैग में रख लिए।

'तू यहीं रुक। मैं दे आता हूँ।'

यह नियम के ख़िलाफ़ था। एक की आईडी का ऑर्डर दूसरा नहीं ले जा सकता। दोनों को यह मालूम था। जीतू ने डिब्बे उनके बैग में रखवा दिए और गाड़ी के पास छाँव देखकर बैठ गया। शाम को जीतू पलासिया के सिग्नल पर खड़ा था।

उसके आगे हीरालाल थे।

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बत्ती लाल हुई और उन्होंने चाबी घुमाकर इंजन बंद कर दिया। फिर उन्होंने मोबाइल हैंडल के होल्डर से निकाला, गमछे के भीगे टुकड़े में लपेटा, और क़मीज़ की जेब में रख लिया। जीतू यह पहली बार नहीं देख रहा था। इस बार उसने सोचा।

नौतपा में हैंडल पर लगा फ़ोन आधे घंटे में इतना गरम हो जाता है कि वह ख़ुद बंद हो जाता है। हीरालाल का फ़ोन पुराना था और उसकी बैटरी और जल्दी बैठती थी। जेब में जाते ही उसका नेटवर्क आधा हो जाता, नक्शे पर उनकी जगह अटक जाती, और ऐप वहीं का वहीं दिखाता रहता।

गाड़ी चल रही होती थी। निशान फिर भी लग जाता था। यह हिसाब जीतू को उसी सिग्नल पर, इक्यावन सेकंड में समझ आ गया। और उसके साथ दूसरी बात भी।

छब्बीस तारीख़ के वे दोनों ऑर्डर हीरालाल के बैग में गए थे, पर आईडी जीतू की थी और घड़ी जीतू की चल रही थी। मतलब उलटा था। उस दिन के दो निशान जीतू की आईडी पर लगने चाहिए थे और लगे हीरालाल की आईडी पर, क्योंकि रास्ते में फ़ोन उन्हीं का जेब में था।

ऐसे कितने दिन रहे होंगे, यह उसने जोड़ना शुरू किया और बीच में छोड़ दिया। उस रात वह देर तक छत पर बैठा रहा।

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चार हज़ार का बोनस माँ की आँख के ऑपरेशन के लिए था। तारीख़ जुलाई की मिली थी और पैसा जून में चाहिए था। यह हिसाब भी उसे पूरा याद था।

सुबह वह हब पहले पहुँचा।

ऋषभ अभी लैपटॉप खोल ही रहा था। जीतू ने उससे कहा कि निशान वाली बात ग़लत है और उसने ख़ुद ग़लत कही थी। फिर उसने पूरी बात बताई। फ़ोन की गर्मी, जेब, नेटवर्क, और छब्बीस तारीख़ के दो ऑर्डर। ऋषभ देर तक चुप रहा।

'ऑर्डर किसी और को देना बंद वाली बात है, जीतू। तुझे मालूम है?' 'मालूम है।' 'लिखकर देना पड़ेगा। मैं ऊपर भेजूँगा तो जो होगा वह होगा।' 'दे दूँगा।'

हीरालाल की आईडी से पिछले महीने के ग्यारह निशान हट गए और समीक्षा बंद हो गई। जीतू की आईडी पंद्रह दिन के लिए बंद हुई। बोनस वाली सूची से उसका नाम उसी दिन निकल गया। पंद्रह दिन उसने छावनी वाली मंडी में बोरे लादे। तीन सौ रोज़ मिलते थे और शाम तक कंधा दुखता था।

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सोलहवें दिन जब वह हब लौटा तो हीरालाल पहले से बैठे थे। उन्होंने पूछा कि चेन बदलवाई या नहीं, और उसने कहा कि कसवा ली है। माँ का ऑपरेशन अगस्त में हुआ, एक महीना देर से।

हब की दीवार पर एक कील थी जिस पर हीरालाल शाम को गमछे का वह भीगा टुकड़ा टाँग देते थे, ताकि सुबह तक सूख जाए। जून के आख़िर में जब पहली बारिश आई और गर्मी टूट गई, वह टुकड़ा उसी कील पर सूखा हुआ टँगा रह गया, और किसी ने उसे उतारा नहीं।