तीली पकड़ते ही इसरायल को पता चल गया कि यह छाता ठीक नहीं होगा। उसने उसे फिर भी पूरा खोला। ग्राहक सामने खड़ा हो तो खोलकर देखना पड़ता है।

आठ में से पाँच तीलियाँ मुड़ी हुई थीं और उनमें से दो जोड़ पर से टूटी थीं। कपड़ा किनारों से उधड़ चुका था। और डंडी, जो सबसे बड़ी बात थी, बीच से टेढ़ी हो चुकी थी। टेढ़ी डंडी वाला छाता सीधा नहीं होता। लोहा एक बार मुड़ जाए तो उसे सीधा करने पर वह उसी जगह से दोबारा मुड़ता है। हर बार वहीं से।

इसरायल राँची के उस चौराहे पर छब्बीस बरस से बैठ रहा था।

उसका सामान एक बोरे में आता था। तीलियाँ, कमानी, रिवेट, धागा, सुई, और छह-सात पुराने छाते जिन्हें वह पुर्ज़ों के लिए रखता था। बैठने के लिए एक स्टूल और सिर पर दुकान वाले की छज्जी। साल के नौ महीने वह और काम करता था। बिजली के तार बाँधने का, कुर्सियों की बुनाई का, जो मिल जाए।

बरसात के तीन महीने उसकी असली कमाई थे। बाक़ी नौ कट जाते थे।

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जून से सितंबर तक राँची में पानी रुकता नहीं। उन दिनों उसके पास आठ-दस छाते रोज़ आ जाते थे और महीने के छह-सात हज़ार बन जाते थे, जो बाक़ी नौ महीनों में नहीं बनते। औरत साठ के आसपास की थी। अकेली आई थी।

उसने छाता रखा और पूछा कि कितना लगेगा। इसरायल के सामने वही रास्ता खुला था जो ऐसे मौक़े पर खुलता है, और जिसे उसके धंधे में कोई ग़लत भी नहीं मानता।

तीलियाँ बदल दो, कपड़ा किनारे से सिल दो, डंडी को हथौड़ी से ठोंककर जितना सीधा हो सके कर दो। डेढ़ सौ लो। छाता दिखने में नया जैसा हो जाएगा और चार-पाँच बार खुलने-बंद होने के बाद उसी जगह से बैठ जाएगा।

तब तक बरसात निकल चुकी होगी और औरत लौटकर नहीं आएगी। उसने वह नहीं किया। उसने छाता नीचे रखा। फिर कहा कि यह ठीक नहीं होगा।

औरत ने पूछा कि क्यों नहीं होगा, और उसने डंडी उठाकर उसे उसी की आँख के सामने घुमाकर दिखाया, जहाँ बीच में हल्का-सा टेढ़ापन था और चमक की एक लकीर टूट रही थी। 'नया ले लीजिए। डेढ़ सौ का अच्छा आ जाता है।'

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औरत ने छाता वापस नहीं उठाया। वह हिली भी नहीं।

वह वहीं खड़ी रही और फिर उसने बताया कि यह उसके आदमी का है, जो चार महीने पहले गुज़र गया था, और यह छाता उन्नीस बरस से चल रहा था और हर बरसात में इसी चौराहे पर ठीक होता था।

इसरायल को वह छाता याद नहीं था। उन्नीस बरसातों में उसके हाथ से हज़ारों निकले थे। सब एक जैसे होते हैं।

पर मूठ उसे याद आ गई।

वह लकड़ी की थी, बेंत की मुड़ी हुई मूठ वाली, और ऐसी मूठें अब नहीं आतीं। नए छातों में प्लास्टिक की सीधी मूठ आती है। उसने औरत से कहा कि दो दिन बाद आइए। औरत ने वजह नहीं पूछी। उन दो दिनों में उसने वह किया जो धंधे के हिसाब से उसे नहीं करना था।

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उसने बोरे में से अपने तीनों साबुत पुराने छाते निकाले। एक की कमानी ठीक थी, एक का कपड़ा, और एक की तीलियाँ। उसने पुरानी डंडी से मूठ वाला हिस्सा अलग किया और उसे नई डंडी में बैठाया, जिसके लिए उसे लकड़ी को छीलना पड़ा और दो बार वह ग़लत छिल गई।

फिर उसने उस पर बाक़ी छाता खड़ा किया। कमानी एक से, कपड़ा दूसरे से, तीलियाँ तीसरे से। कपड़ा काला था और नए छाते के कपड़े जैसा चमकीला नहीं था, जो उसे ठीक भी लगा, क्योंकि पुराना छाता चमकता नहीं।

दो दिन में उसने कुल तीन छाते ठीक किए, जबकि उन दो दिनों में सोलह आए थे। बाक़ी तेरह उसने लौटा दिए या कल आने को कह दिया, और उनमें से आठ नहीं लौटे।

तीसरे दिन औरत आई।

छाता खुला और बंद हुआ और फिर खुला। इसरायल ने उसे तीन बार खोलकर दिखाया, क्योंकि जो चीज़ चौथी बार बैठ जाती है उसे तीन बार दिखाने का कोई मतलब नहीं होता, और वह चाहता था कि वह ख़ुद चलाकर देखे।

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उसने डेढ़ सौ माँगे। उतने ही जितने रोज़ के काम के लेता। औरत ने तीन सौ रखे और इसरायल ने डेढ़ सौ वापस कर दिए, और इस पर थोड़ी देर बहस भी हुई। जो तीन छाते उसने खोले थे, वे उस मौसम में डेढ़-डेढ़ सौ में बिक जाते।

दो दिन की कमाई अलग गई। जोड़ने पर सात-आठ सौ बैठता है। यह हिसाब उसने उस वक़्त नहीं लगाया था, पर बाद में लगाया, क्योंकि सितंबर में जब मौसम उतरा तो घर में जितना होना चाहिए था उससे कम था।

अगली बरसात में वह औरत फिर आई। जुलाई का महीना था। इस बार बात छोटी थी। एक तीली का रिवेट निकल गया था। उसे बैठाने में पाँच मिनट लगे। इसरायल ने छाता हाथ में लेते ही मूठ देखी।

बेंत की वह मूठ, जो पिछले बरस उसके हाथ में आई थी तो सूखी और मटमैली थी, अब नीचे की तरफ़ से चिकनी हो चुकी थी और उस पर एक हल्की चमक आ गई थी, वैसी जो लगातार हाथ लगने से आती है। घिसाव की जगह वहाँ नहीं थी जहाँ पिछले बरस थी। वह थोड़ा नीचे सरक आई थी, क्योंकि पकड़ने वाला हाथ अब छोटा था।