बूटी सुबह सबसे पहले उठता था। गाँव के किनारे वाली उसकी बिल घास के एक ऊँचे टीले के नीचे थी, और वहाँ से पूरा मैदान दिखता था। वह बाहर निकलकर बैठ जाता और देर तक चीज़ों को देखा करता: चींटियों की कतार, हवा में हिलती घास, दूर उड़ते पक्षी। सबकी अपनी-अपनी दुनिया थी। बूटी को लगता था कि उसकी अपनी दुनिया कहीं और होगी, जिसे उसने अभी देखा ही नहीं है।

उसके दो पक्के दोस्त थे: प्यारी, एक छोटी चिड़िया, और गोलू, एक बड़ी हथिनी। प्यारी रोज़ सुबह उसकी बिल के ऊपर वाली डाल पर आकर बैठती। गोलू दोपहर में तालाब जाते वक़्त रुककर उसका हाल पूछ लेती। दोनों को बूटी की बात अजीब लगती थी। 'तुम्हारी दुनिया तो यहीं है,' प्यारी कहती। 'यही तो सवाल है,' बूटी कहता। 'क्या बस इतनी ही है?'

एक सुबह उसने तय कर लिया। उसने प्यारी और गोलू से विदा ली, थोड़ी घास बाँधकर साथ रखी, और जंगल की तरफ़ चल पड़ा।

मस्ती भरा अगला पल

पहला दिन आसान बीता। दूसरे दिन शाम को वह एक छोटे तालाब के पास पहुँचा, जहाँ एक मेंढक पत्थर पर बैठा था। बूटी ने पूछा, 'तुम्हारी दुनिया कैसी है?' मेंढक हँसा। 'यह तालाब,' उसने कहा। 'बस इतनी।' 'इतनी छोटी?' 'हाँ। पर मैं इसका हर कोना जानता हूँ। कौन सा पत्थर दोपहर में गरम होता है, किस किनारे पर सबसे ज़्यादा कीड़े आते हैं, बरसात में पानी कहाँ तक चढ़ता है।' बूटी कुछ देर सोचता रहा।

तीसरे दिन उसे एक चींटी मिली, जो अपने से तीन गुना बड़ा दाना खींचकर ले जा रही थी। बूटी ने पूछा, 'तुम्हारी दुनिया कैसी है?' चींटी रुकी नहीं। 'यह रास्ता,' उसने चलते-चलते कहा। 'बिल से लेकर उस पेड़ तक। मैं इसे दिन में चार बार नापती हूँ।' 'ऊब नहीं जातीं?' 'हर बार कुछ न कुछ बदला हुआ मिलता है,' चींटी ने कहा और आगे बढ़ गई।

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चौथी रात मुश्किल थी। खुले में छिपने की जगह नहीं मिली और ठंड बहुत थी। बूटी एक चट्टान की ओट में दुबककर बैठा रहा और सुबह होने का इंतज़ार करता रहा। उस रात उसे पहली बार अपनी बिल याद आई। सूखी घास, बंद दरवाज़ा, और ऊपर वाली डाल पर बैठी प्यारी की आवाज़।

आगे रास्ता सूखा होता गया। घास कम हुई, फिर ख़त्म हो गई। छठे दिन उसे एक ऊँट मिला, जो धीरे-धीरे उत्तर की ओर जा रहा था। 'तुम्हारी दुनिया कैसी है?' बूटी ने पूछा। ऊँट रुका। 'रेत,' उसने कहा। 'यहाँ से जहाँ तक दिखे, और उसके भी आगे।' 'कठिन नहीं लगता?' 'लगता है।' ऊँट ने आगे देखा। 'पर शाम को जब रेत ठंडी होती है और आसमान लाल हो जाता है, तो कुछ देर के लिए यह दुनिया की सबसे शांत जगह होती है। वह देखने के लिए मैं पूरा दिन चल लेता हूँ।'

बूटी लौटने लगा। रास्ते में उसने सोचा कि मेंढक की दुनिया कितनी छोटी थी और ऊँट की कितनी बड़ी, पर दोनों अपनी-अपनी दुनिया को पूरी तरह जानते थे। और वह? उसे तो अपने ही मैदान के बारे में उतना भी पता नहीं था जितना मेंढक को अपने तालाब के बारे में था।

एक छोटी सी जीत

वह झील के किनारे पहुँचा तो प्यारी वहीं बैठी थी। वह रोज़ आती थी और इंतज़ार करती थी। 'क्या सीखा?' उसने पूछा। बूटी ने कुछ पल सोचा। फिर बोला, 'यही कि अपनी दुनिया देखने के लिए मुझे इतनी दूर जाने की ज़रूरत नहीं थी।'

अगली सुबह बूटी अपनी बिल के बाहर बैठा, रोज़ की तरह। पर इस बार उसने गिनना शुरू किया। मैदान में घास की कितनी तरह की क़िस्में थीं। चींटियों की कतार कहाँ से शुरू होकर कहाँ ख़त्म होती थी। कौन सा कोना सुबह सबसे पहले धूप पकड़ता था, और बरसात में पानी किस तरफ़ बहता था। शाम तक उसे पता चल गया कि वह अपने ही मैदान के बारे में कितना कम जानता था।

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गोलू दोपहर में रुकी और पूछा कि यात्रा कैसी रही। बूटी ने कहा कि अच्छी रही, पर सबसे अच्छी बात लौटकर हुई। गोलू ने कुछ और नहीं पूछा। उसने सूँड़ से उसकी पीठ हल्के से थपथपाई और आगे चल दी। बूटी वापस अपने टीले पर चढ़ गया, जहाँ से पूरा मैदान दिखता था, और उसे देखने लगा, जैसे पहली बार देख रहा हो। कुछ महीनों बाद एक नया खरगोश उस मैदान में आया और बूटी से पूछा कि यहाँ देखने लायक़ क्या है। बूटी उसे टीले पर ले गया। उसने उसे बताया कि सुबह की पहली धूप किस कोने पर गिरती है, चींटियों की कतार कहाँ से शुरू होती है, और बरसात में पानी किस तरफ़ बहता है। बताते-बताते शाम हो गई। नया खरगोश हैरान था कि इतने छोटे मैदान में इतना कुछ हो सकता है।