हिम्मत हाथी की मुस्कान उसके चेहरे से बड़ी थी। जब वह हँसता, तो उसके सामने के दाँत पूरे दिख जाते और आँखें ग़ायब हो जातीं। उसे यह पता नहीं था कि यह डरावना लगता है। पता तब चला जब एक दिन उसने एक हिरन के बच्चे को देखकर मुस्कुराया, और वह बच्चा उलटे पाँव भाग गया। उसके बाद हिम्मत ने मुस्कुराना कम कर दिया। फिर लगभग बंद ही कर दिया।

पर वह पास रहना नहीं छोड़ पाया। वह बस ऐसे पास रहने लगा कि कोई देख न ले। रात में जो डाल रास्ते पर गिर जाती, सुबह वह एक तरफ़ पड़ी मिलती। गर्मियों में कीचड़ वाला गड्ढा जब सूख जाता, तो किसी सुबह उसमें फिर पानी होता। महुआ नीचे बिखरा मिलता, बिना किसी के हिलाए। जंगल में किसी ने कभी इस पर बात नहीं की, क्योंकि इसकी कोई ज़रूरत ही नहीं पड़ी।

जंगल में उसका कोई दोस्त नहीं था। कोई उससे नफ़रत भी नहीं करता था। बस सब दूरी बनाए रखते। वह अकेला घूमता। अकेला नहाता। शाम को अकेला लौट आता। कभी-कभी वह पानी में अपनी परछाईं देखता और मुँह बंद रखकर मुस्कुराने की कोशिश करता। वैसे मुस्कान बनती ही नहीं थी।

बारिश के बाद जो पानी उतरा, उसके साथ एक खरगोश आ गया। नाम चीकू। कहाँ से आया, यह उसने बताया नहीं और किसी ने पूछा नहीं। वह पहले दिन से जल्दी में था। दूसरे दिन वह सीधा हिम्मत के पास आया, ऊपर बेर के पेड़ की तरफ़ देखा, और बोला, 'ज़रा हिलाओ इसे।'

हिम्मत ने सूँड़ पेड़ के तने पर रखी और एक झटका दिया। ऊपर से बेर गिरे, बहुत सारे, और उनमें से चार-पाँच सीधे चीकू के सिर पर। एक पके हुए बेर का गूदा उसके कान पर लग गया। हिम्मत हँस पड़ा, बिना सोचे, पूरा मुँह खोलकर। चीकू कान पोंछ रहा था और बड़बड़ा रहा था कि इतनी ज़ोर से हिलाने को किसने कहा था। उसने ऊपर देखा तक नहीं।

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अगले दिन वह फिर आया। इस बार उसे एक पत्थर हटवाना था जिसके नीचे उसका बिल जाता था। हिम्मत ने पत्थर हटा दिया। तीसरे दिन उसे नदी पार करनी थी और पानी उसके लिए गहरा था। हिम्मत ने उसे सूँड़ पर बिठाया, बीच धार में एक पल के लिए रुका ताकि वह गिरे नहीं, और उस पार उतार दिया। तीनों बार चीकू ने धन्यवाद कहा, और तीनों बार जल्दी में कहा, और तुरंत अपने काम से चला गया।

तीसरे दिन हिम्मत ने पूछ ही लिया। उसने पूछा कि तुम्हें मेरा मुँह डरावना नहीं लगता। चीकू रुका, एक पल सोचा, और बोला, 'मैंने तुम्हारे दाँत गिने ही नहीं। मुझे बेर चाहिए थे।' फिर वह चला गया। हिम्मत वहीं खड़ा रहा। यह बात उसे कई दिन तक समझ नहीं आई।

पहले कुछ दिन चीकू अकेला ही उसके साथ दिखता था। बाकी जानवर दूर से देखते रहते। फिर एक दिन हिरन का वही बच्चा, जो कभी भागा था, पास आकर खड़ा हो गया। हिम्मत ने इस बार मुँह बंद रखा। चीकू ने कहा, 'ऐसे नहीं।' हिम्मत ने डरते-डरते पूरा मुँह खोला। हिरन का बच्चा नहीं भागा। वह हँस पड़ा।

इसके बाद भी सब कुछ नहीं बदला। साही अब भी उसके पास से निकलती तो काँटे खड़े कर लेती। भालू ने आज तक उसकी तरफ़ नहीं देखा। पर लंगूरों ने इसे खेल बना लिया। वे ऊपर से चिल्लाकर कहते कि हँसो, और हिम्मत हँस देता, और वे शोर मचाकर भाग जाते। हिम्मत को यह खेल पसंद आने लगा।

एक शाम वह महुए के पेड़ के पास गया और रुक गया, क्योंकि नीचे तीन-चार जानवर पहले से खड़े थे। पहले ऐसे में वह लौट जाता और रात में आता। उस दिन वह वहीं खड़ा रहा। फिर उसने सूँड़ तने पर रखी और पेड़ हिला दिया, सबके सामने। महुआ गिरा और सब उसे बीनने लगे। किसी ने पीछे मुड़कर यह नहीं देखा कि हिलाया किसने, और हिम्मत को यही सबसे अच्छा लगा।

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उस साल बारिश देर से आई और एक ही बार में आई। दोपहर तीन बजे अँधेरा हो गया। हवा ऐसी चली कि दो पेड़ जड़ समेत उखड़ गए और नदी का पानी किनारे से ऊपर चढ़ने लगा। सब ऊँची वाली चट्टान की तरफ़ भागे, जहाँ गुफा है। रास्ता वही एक था और वह अब पानी और गिरी हुई डालों से भरा था।

तूफ़ान में सबसे बड़ी दिक़्क़त अँधेरा था। कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। छोटे जानवर आवाज़ के सहारे चल रहे थे और आवाज़ें आपस में गड्डमड्ड हो रही थीं। तब हिम्मत ने वह किया जो उसे सबसे अच्छा आता था। उसने मुँह खोला और हँसने लगा, ज़ोर से, लगातार। अँधेरे में वे सफ़ेद दाँत दूर से दिख जाते थे। जानवर उसी तरफ़ चलते रहे।

सुबह पानी उतर गया और धूप निकल आई। किसी ने भाषण नहीं दिया। हिरन के बच्चे की माँ पहली बार इतने पास आकर खड़ी हुई कि हिम्मत उसकी साँस सुन सकता था, और थोड़ी देर खड़ी रहकर चली गई। किसी ने उसके पैर के पास बेर का एक ढेर रख दिया था और यह किसने किया, यह उसे कभी पता नहीं चला। चीकू उसके अगले पैर से टिककर सो रहा था।

तब से जंगल में एक चीज़ बदल गई। रात को जब कोई रास्ता भटक जाता, तो वह सबसे पहले यह देखता कि कहीं कुछ सफ़ेद चमक रहा है क्या। हिम्मत को यह बात पता चली तो उसने रात में गुफा के मुँह पर बैठना शुरू कर दिया। वह कुछ करता नहीं था। बस बैठा रहता, और मुँह खुला रखता।