राहुल की दादी के आगे के दो दाँत नहीं थे। जब वे मुस्कुरातीं तो यह बात साफ़ दिखती थी, और राहुल को उनकी यही प्यारी मुस्कान सबसे अच्छी लगती थी। गाँव में और भी बुज़ुर्ग थे, पर उनमें से कोई इस तरह नहीं हँसता था, जैसे कोई बात सचमुच अच्छी लगी हो। स्कूल से लौटकर राहुल सीधे आँगन में जाता, जहाँ दादी चारपाई पर बैठी होतीं, और उनका चेहरा देखते ही उसका आधा दिन ठीक हो जाता।
दादी कहती थीं कि मुस्कान सबसे सस्ता तोहफ़ा है, इसलिए उसे बाँटने में कंजूसी नहीं करनी चाहिए। राहुल को यह बात मज़ाक लगती थी, पर उसने कभी दादी को उदास चेहरे के साथ नहीं देखा था। यहाँ तक कि जिस साल फ़सल ख़राब हुई और घर में कई महीने तंगी रही, तब भी नहीं।
उस साल राहुल गणित में पिछड़ गया। पहले एक टेस्ट, फिर दूसरा। तीसरी बार जब कॉपी वापस मिली तो उस पर लाल स्याही इतनी थी कि उसने कॉपी बस्ते के सबसे नीचे दबा दी। घर आकर वह सीधे कमरे में चला गया और दरवाज़ा भेड़ लिया। शाम को माँ ने खाने के लिए बुलाया तो उसने कहा कि भूख नहीं है।
एक नया दोस्त मिला
माँ कुछ देर दरवाज़े के बाहर खड़ी रहीं। फिर बोलीं, 'दादी आँगन में बैठी हैं।' राहुल ने कोई जवाब नहीं दिया। पर आधे घंटे बाद वह चुपचाप बाहर आ गया।
दादी अपनी किताब हाथ में लिए बैठी थीं, वही मोटी किताब जो वे बहुत धीरे-धीरे पढ़ती थीं। राहुल उनके पास बैठ गया और देर तक कुछ नहीं बोला। फिर उसने कहा, 'मुझसे गणित नहीं होगा।' दादी ने किताब बंद की और उसकी तरफ़ देखा। फिर वही मुस्कान, दो दाँतों वाली खाली जगह के साथ।
'तुझे पता है, मैंने पढ़ना कब सीखा था?' उन्होंने पूछा। राहुल ने ना में सिर हिलाया। 'सैंतालीस साल की उम्र में।' राहुल ने चौंककर देखा। 'तेरे दादाजी के जाने के बाद। बैंक के कागज़ पढ़ने पड़ते थे और मैं हर बार किसी और से पढ़वाती थी। एक दिन मुझे बहुत बुरा लगा। अगले दिन मैंने गाँव की मास्टरनी से कहा कि मुझे अक्षर सिखा दो।'
'कितने दिन लगे?' राहुल ने पूछा। 'दो साल,' दादी ने कहा, जैसे यह कोई बड़ी बात न हो। 'और बीच में तीन बार मैंने छोड़ दिया था।' उन्होंने किताब उठाकर दिखाई। 'अब यह पढ़ रही हूँ। एक पन्ना दो दिन में। पर पढ़ रही हूँ।'
उस रात राहुल ने कॉपी बस्ते से निकाली। लाल स्याही अब भी वहीं थी। उसने पहला सवाल दोबारा किया, और वह फिर ग़लत हुआ। तीसरी बार में सही निकला। वह देर तक उसे देखता रहा।
दिन का सबसे प्यारा हिस्सा
अगले हफ़्तों में उसने एक नियम बनाया। रोज़ शाम को दस सवाल, चाहे कुछ भी हो। दादी आँगन में बैठी रहतीं और वह उनके पास ज़मीन पर बैठकर काम करता। कभी-कभी वह अटक जाता और चिढ़कर पेंसिल पटक देता। दादी कुछ नहीं कहतीं। वे बस उसकी तरफ़ देखतीं और मुस्कुरा देतीं, और थोड़ी देर बाद वह पेंसिल फिर उठा लेता।
स्कूल में उसके दोस्त पूछते कि वह आजकल खेलने क्यों नहीं आता। राहुल कहता कि आएगा, अगले हफ़्ते से। अगला हफ़्ता आता और वह फिर आँगन में बैठा होता। एक दिन दोस्त उसे बुलाने घर तक आ गए। दादी ने उन्हें बिठाया, गुड़ और पानी दिया, और कहा कि राहुल आधे घंटे बाद आएगा। आधे घंटे बाद राहुल सचमुच आ गया, और उस दिन सबने अँधेरा होने तक खेला।
अगला टेस्ट भी बहुत अच्छा नहीं गया। पर लाल स्याही पहले से कम थी। उसके अगले में और कम। दिवाली से पहले वाली परीक्षा में राहुल के गणित में सबसे ज़्यादा नंबर आए। पूरी कक्षा में नहीं, पर अपनी पिछली कॉपी से बाईस ज़्यादा।
वह भागता हुआ घर आया। दादी आँगन में ही थीं। उसने कॉपी उनकी गोद में रख दी और साँस लेने के लिए रुका। दादी ने कॉपी उठाई, बहुत धीरे-धीरे नंबर पढ़े, और फिर मुस्कुराईं। 'बाईस ज़्यादा,' उन्होंने कहा। 'और बीच में कितनी बार छोड़ने का मन किया?' राहुल ने सोचा। 'चार बार।' 'मुझसे एक बार ज़्यादा,' दादी ने कहा और हँस पड़ीं।
उस दिवाली पर राहुल ने दादी को एक चीज़ दी, जो उसने अपने जमा किए पैसों से खरीदी थी: एक नया चश्मा, ताकि किताब का एक पन्ना दो दिन के बजाय एक दिन में पूरा हो जाए। दादी ने उसे पहनकर देखा, फिर उतारकर गोद में रख लिया, और कुछ देर तक कुछ नहीं बोलीं। राहुल ने उस दिन पहली बार देखा कि दादी मुस्कुराते हुए भी रो सकती हैं। उस रात दोनों आँगन में देर तक बैठे रहे। दादी ने नया चश्मा पहनकर किताब खोली और ज़ोर से पढ़कर सुनाया, एक पूरा पन्ना, बिना रुके। राहुल सुनता रहा और गिनता रहा। उन्हें सात मिनट लगे।