बसंत की पहली साफ़ हवा के साथ ही गाँव की छतें भर जाती थीं। यह उत्सव किसी ने शुरू नहीं किया था। बस हर साल होता था। बच्चे हफ़्तों पहले से माँझा तैयार करते, पतंगें जोड़ते, और छतों की टूटी मुंडेर ठीक करते। जिस दिन आसमान पूरा नीला हो जाता और हवा बराबर चलने लगती, उसी दिन सब ऊपर चढ़ जाते। उस दिन गाँव में नीचे कोई नहीं दिखता था। खेत खाली रहते, दुकानें बंद रहतीं, और शाम तक पूरा आसमान पतंगों से भर जाता। बूढ़े लोग नीचे कुर्सी डालकर बैठ जाते और सिर ऊपर करके देखते रहते। शाम को जब पतंगें उतरतीं, तो गिनती होती कि किसकी कितनी कटीं और किसकी कितनी बचीं। यह गिनती अगले साल तक याद रखी जाती थी।
हीरू को वह गिनती ही चाहिए थी।
पतंग ऊँची उड़े, इसमें उसे कोई ख़ास मज़ा नहीं आता था। मज़ा शाम की गिनती में था। जिसकी पतंग शाम तक बची रह जाए, उसका नाम पूरे बरस लिया जाता है।
पिछले बरस हीरू का नाम नहीं लिया गया था। उसकी दोनों पतंगें दोपहर से पहले कट गई थीं।
इस बरस उसने माँझा ख़ुद बनाया। काँच पीसकर, लेई मिलाकर, तीन दिन धूप में सुखाकर। उँगलियों में तीन जगह कटा और माँ ने हल्दी लगाई।
काँच पीसने की आवाज़ पूरे आँगन में जाती है। चूड़ी के टुकड़े पत्थर पर रखो और ऊपर से दूसरा पत्थर घुमाओ, और वह चीनी जैसा सफ़ेद बुरादा बन जाता है, पर वह चीनी नहीं है और यह बात सबसे पहले सिखाई जाती है। फिर उसमें उबले चावल की लेई मिलती है और रंग मिलता है। हीरू ने गुलाबी रंग डाला। डोर को दो खंभों के बीच बाँधकर उस पर हाथ फेरा जाता है और तीन दिन धूप खिलाई जाती है।
उत्सव वाले दिन वह सबसे पहले छत पर था।
उस सुबह पूरा गाँव ऊपर था। किसी की छत पर तिल के लड्डू रखे थे, किसी की छत पर गुड़ की पट्टी। नीचे गली में सिर्फ़ कुत्ते थे और वे भी ऊपर देख रहे थे। हवा आठ बजे से चलने लगी थी और वह बराबर चल रही थी, जो साल में एक-दो दिन ही होता है।
उसने पतंग ऊँची छोड़ी। बहुत ऊँची।
बीस मिनट में वह कट गई।
ऊपर बड़े लड़के थे और उनकी पतंगें बड़ी थीं। ऊँचाई पर वही जीतता है जिसकी डोर लंबी हो और जिसका हाथ भारी हो। हीरू का हाथ हल्का था।
उसने दूसरी पतंग निकाली और इस बार नीचे रखी, गली के ऊपर, छतों के बराबर।
वह टिकी ही नहीं। नीचे हवा सीधी नहीं आती। वह छतों से टकराकर आती है, कभी इधर से कभी उधर से, और पतंग हर बार डूब जाती है। दो बार तो वह मुंडेर पर ही गिरी।
अब उसके पास एक ही पतंग बची थी।
वह मुंडेर पर बैठकर सोचने लगा और उसी वक़्त उसे दिखा।
गाँव के सिरे पर स्कूल है और स्कूल की छत टीन की है। उस टीन के ऊपर, थोड़ा-सा ऊपर, हवा में कुछ हो रहा था। एक चील वहाँ गोल घूम रही थी और पंख नहीं हिला रही थी।
हीरू ने चील को बहुत बार देखा था। उस दिन उसने पहली बार यह देखा कि वह ऊपर की तरफ़ जा रही है, बिना पंख हिलाए।
टीन दिन भर तपता है। उसके ऊपर की हवा गरम होकर ऊपर उठती है और ऊपर उठती हुई हवा में जो चीज़ छोड़ दी जाए, वह ऊपर जाती है। चील को यह मालूम है। हीरू को यह उस दिन मालूम हुआ, और उसने इसे इन्हीं शब्दों में नहीं सोचा। उसने बस यह सोचा कि वहाँ कुछ ऊपर उठा रहा है।
स्कूल की छत पर कोई नहीं जाता। वह गाँव के किनारे है और वहाँ से आपको कोई नहीं देखता। उत्सव के दिन सबको दिखना होता है।
हीरू को यह अच्छा नहीं लगा। सबके साथ छत पर रहने में जो मज़ा है, वह अकेले खड़े रहने में नहीं है, और वह यह जानता था। पर उसके पास अब दूसरी कोई पतंग नहीं थी।
हीरू आख़िरी पतंग लेकर वहाँ चला गया।
उसे तीन बार कोशिश करनी पड़ी। पहली बार पतंग टीन पर ही गिरी और खड़खड़ाती रही। दूसरी बार वह उठी और तिरछी होकर भागी। तीसरी बार उसने डोर ढीली छोड़ दी और हाथ नहीं खींचा।
पतंग ऊपर चली गई और खड़ी हो गई।
वह ऐसे खड़ी हुई जैसे कोई उसे पकड़े हुए हो। हीरू को डोर खींचनी ही नहीं पड़ रही थी। वह मुंडेर से टिककर बैठ गया और उसने पूरा दिन वहीं काटा।
दिन में तीन बार बड़ी पतंगें उसकी तरफ़ आईं और तीनों बार उन्हें नीचे से आना पड़ा, क्योंकि उससे ऊपर कोई नहीं था। जो नीचे से आता है, वह काट नहीं पाता। उसकी डोर ख़ुद रगड़ खाती है।
शाम को हवा बैठ गई और सब पतंगें उतरने लगीं।
हीरू की उतरी नहीं। टीन ठंडा होते-होते चार बज गए और तब तक बाक़ी सब उतर चुकी थीं।
शाम को गिनती हुई। हीरू का नाम लिया गया।
धीरज ने पूछा कि वह दिन भर कहाँ था। हीरू ने बता दिया। उसने कुछ छिपाया नहीं, क्योंकि उसे यह छिपाने वाली बात लगी ही नहीं। उसे तो यह अच्छी बात लगी थी और अच्छी बात बताई जाती है।
बिट्टो सबसे छोटी थी और उसने पूछा कि हवा गरम कैसे हो जाती है। हीरू ने कहा कि टीन गरम होता है। बिट्टो ने पूछा कि टीन गरम क्यों होता है। हीरू सोचता रहा, फिर बोला कि पता नहीं।
अगले बरस स्कूल की छत पर छह बच्चे थे।
छह पतंगें एक ही जगह की उठती हवा में थीं और वह जगह इतनी बड़ी नहीं थी। डोरें आपस में उलझीं, दो पतंगें टकराकर गिरीं, और एक टीन पर फँसकर फट गई। दोपहर तक वहाँ वैसा कुछ नहीं बचा था जैसा पिछले बरस था।
हीरू सबसे ज़्यादा हँसा। उसकी पतंग भी उन्हीं में थी।