अँधेरे में भी सुगना को पता था कि कौन-सा पौधा कहाँ है। ग्यारह गड्ढे, और हर गड्ढे के बीच सात कदम। वह कनस्तर उठाती, सात कदम चलती, आधा उँडेल देती। बाकी आधा अगले के लिए। यह काम सूरज निकलने से पहले ख़त्म होना चाहिए था, वरना पानी ऊपर की रेत में ही रह जाता और नीचे जड़ तक कुछ नहीं पहुँचता।
ज़मीन उसके हिस्से में आई थी और किसी ने उस पर झगड़ा नहीं किया। जालोर की तरफ़ जहाँ ढाल उतरती है, वहाँ दो बीघा, और उसमें भी आधी रेतीली। बँटवारे के वक़्त भाइयों ने कहा था कि बहन को दे दो, वहाँ बाजरा भी ढंग से नहीं होता। बात ग़लत नहीं थी। पहले तीन साल उसने भी वही बोया जो सब बोते थे। और वही काटा जो सब काटते थे।
आखा तीज के दिन गाँव में दो शादियाँ थीं। सुगना उस दिन भीनमाल गई और लौटी तो गाड़ी में ग्यारह पौधे थे, हर एक काली थैली में, हर एक उसकी कोहनी जितना ऊँचा। अनार। सांचौर की तरफ़ के खेतों में उसने इन्हें कतार में लगे देखा था, आदमी के कंधे तक आते हुए, और नीचे ज़मीन पर गिरे हुए फल जिन्हें कोई उठाता तक नहीं था।
मांगीलाल ने एक-एक करके थैलियाँ गिनीं। वह हिसाब का आदमी था, इसलिए हँसा नहीं, बस पूछा कि पहला फल कब आएगा। सुगना ने कहा, तीसरे साल। उसने सिर हिलाया और अपने ऊँट को चलाया। जाते-जाते इतना बोला कि तीन साल में तो लड़का सूरत से लौट भी आएगा।
हरजी उस वक़्त सत्रह का था और उसका बस्ता बँधा रखा था। गाँव के छह लड़के पहले से सूरत में थे, कपड़े की मिल में, और हर महीने पैसा भेजते थे। हरजी का हिसाब सीधा था। तीन महीने में टिकट के पैसे लौट आते हैं, और तीन साल में एक पेड़ पहला फल देता है। उसने माँ से यही पूछा कि इनमें से कौन-सा सौदा ठीक है।
उस साल सुगना के पास जो पैसा था, वह भैंस का था। भैंस बिक चुकी थी, इसलिए पैसा था। उसमें से टपक की पाइप आई और काली पाइप खेत में साँप की तरह बिछ गई। टिकट के लिए हरजी ने मामा से लिया। वह चला गया। जाने के दिन उसने पैर नहीं छुए।
पहला साल आसान निकला, क्योंकि पहले साल कुछ होना ही नहीं था। पौधे बढ़े। सुगना ने उनके चारों तरफ़ कँटीली टहनियाँ खड़ी कीं ताकि नीलगाय मुँह न मार जाए। सावन में दो बार ढंग की बारिश हुई और सूकड़ी में इतना पानी आया कि बच्चे उसमें उतर गए। उस साल सब ठीक लगा।
दूसरे साल कुएँ का पानी नीचे चला गया। पहले वह पाँच मिनट में भर जाता था, फिर पंद्रह में, फिर वह खड़ी रहती और मोटर हवा खींचती रहती। टैंकर आठ सौ का पड़ता था और महीने में तीन चाहिए थे। उसने बाजरे वाला हिस्सा उसी साल छोड़ दिया और सारा पानी ग्यारह पेड़ों की तरफ़ मोड़ दिया।
फिर तेला लगा। पत्तों पर काले धब्बे उतरे और दो पेड़ों की टहनियाँ ऊपर से सूखने लगीं। दवा जालोर से आती थी और उसका दाम टैंकर से ज़्यादा था। सुगना ने वे दो पेड़ जड़ से काट दिए, ताकि बाकी नौ बच जाएँ। काटने के बाद वह देर तक मेड़ पर बैठी रही। नौ बचे।
उसी हफ़्ते मांगीलाल फिर खेत पर आया। उस साल जलाने की लकड़ी के दाम अच्छे थे और अनार की लकड़ी भट्टी पर ऊँचे दाम जाती है। उसने नौ पेड़ों का दाम बताया और दाम बुरा नहीं था। इतने में साल भर के टैंकर आ जाते, और कुछ बचता भी।
सुगना ने पूछा कि लकड़ी किसके यहाँ जाएगी। मांगीलाल ने कहा, भट्टी पर। उसने कहा कि सोचकर बता देगी, दो दिन में। उस रात उसने कनस्तर उठाया और नौ पेड़ों में पानी डाला, वही सात कदम, वही आधा-आधा। सुबह उसने मना कर दिया।
पैसा फिर भी कहीं से चाहिए था। जीरे की कटाई के दिनों में वह आहोर की तरफ़ दूसरों के खेत पर मज़दूरी करने गई। अपनी ज़मीन वाली औरत, दूसरे के खेत में, कतार में झुकी हुई। गाँव ने देखा और गाँव ने बात भी की। वह सुबह जाती, शाम को लौटती, और लौटकर कनस्तर उठाती।
हरजी का पैसा हर महीने आता रहा, पर वह आखा तीज पर नहीं आया। अगले साल भी नहीं आया। फ़ोन पर वह कहता कि छुट्टी नहीं मिल रही, और सुगना पूछती कि खाना समय पर खाता है या नहीं। बात हर बार यहीं ख़त्म हो जाती। वह फ़ोन रखकर खेत की तरफ़ देखती, जहाँ नौ पेड़ अब उसके कंधे तक आ चुके थे।
तीसरे साल मृग बहार में फूल आए। छोटे, लाल, कड़े। सुगना ने पहले उन्हें गिना, फिर गिनना छोड़ दिया। हर फूल फल नहीं बनता, यह उसे सांचौर वालों ने बताया था। जो बने, उन्हें धूप से बचाने के लिए काग़ज़ में बाँधना पड़ता है। उसने हरजी की पुरानी कॉपियों के पन्ने काम में लिए।
जिस हफ़्ते दिवाली थी, उसी हफ़्ते फल उतरे। नौ पेड़ों से चार कैरेट। दाने पूरे लाल नहीं थे, कुछ हल्के रह गए, क्योंकि पेड़ अभी छोटे थे। भीनमाल की मंडी में उसे वह भाव नहीं मिला जो सांचौर वालों को मिलता है। मिला, पर कम।
लौटते वक़्त उसने एक अनार अपने पास रख लिया था। घर पहुँचकर उसे तोड़ा और दाने हथेली पर निकाले। मीठे थे। बहुत ज़्यादा नहीं। पर मीठे थे।
आखा तीज फिर आई और इस बार हरजी आया, तीन साल बाद, हाथ में एक बैग लिए जिसमें माँ के लिए कपड़े थे। घर पर वह उसे नहीं मिली। वह ढाल के नीचे वाले हिस्से में थी, जहाँ अब तक कुछ नहीं था, और सात-सात कदम नापकर गड्ढों के निशान लगा रही थी। उसने गिनकर बताया कि इस बार बाईस होंगे। हरजी ने बैग मेड़ पर रखा और फावड़ा उठा लिया।