मानिक के हाथों की रेखाएँ मेहनत ने मिटा दी थीं। अठारह की उम्र में उसकी हथेलियाँ किसी अधेड़ मज़दूर जैसी थीं; सख़्त, कटी हुई, जगह-जगह सूजी हुई। मोहल्ले के लोग कहते कि इतनी मेहनत का कोई फ़ायदा नहीं। ग़रीब का लड़का ग़रीब ही रहेगा। मानिक जवाब नहीं देता था। वह बस अगली सुबह फिर उसी वक़्त उठ जाता।
घर में माँ थी और दो छोटी बहनें। पिता नहीं थे, और यह बात मोहल्ले में सब जानते थे, इसलिए मानिक से किसी को कोई उम्मीद भी नहीं थी। जो लड़का चौदह की उम्र में मज़दूरी पर लग जाए, उसके बारे में लोग आगे कुछ सोचते नहीं।
काम मसाले का था। सीमेंट, बालू और पानी को तसले में मिलाना, और फिर उसे ऊपर पहुँचाना। दिन में यह चालीस से साठ बार होता है। हथेली इसी से जाती है, सीमेंट से, जो गीला होने पर हाथ की चमड़ी खा जाता है।
शाम को सब चले जाते थे। मानिक रुक जाता था।
रुकने की वजह यह थी कि दिन भर में एक काम ऐसा होता था जो वह देख नहीं पाता। मिस्त्री जब पहली लाइन बिठाता है, तब वह डोरी तानता है और साहुल लटकाता है, और उसी से पूरी दीवार तय हो जाती है। यह काम पाँच मिनट का है और वह सुबह सबसे पहले होता है, जब मानिक तसला भर रहा होता है।
उसने मिस्त्री से एक बार पूछा कि यह सिखा दीजिए। मिस्त्री ने नहीं सिखाया।
इसमें उसकी कोई बुराई नहीं थी। जो मज़दूर मिस्त्री बन जाता है, वह एक मज़दूर कम हो जाता है, और उसकी जगह लेने वाला मिल भी जाए तो वह सीखने में छह महीने लेगा। मिस्त्री को यह छह महीने महँगे पड़ते।
काम का साल दो हिस्सों में बँटा होता है। बरसात में चिनाई नहीं होती, क्योंकि गीली दीवार बैठ जाती है। इसलिए सावन और भादों में मज़दूर ख़ाली रहते हैं, और उन्हीं दो महीनों में उधार लिया जाता है। मानिक ने दो बरस तक वे दो महीने पीछे वाली दीवार पर लगाए।
तो मानिक ने दूसरा रास्ता निकाला। दोपहर में जब सब खाना खाने बैठते थे, नक़्शा वहीं ईंटों पर पड़ा रहता था। वह उसे देखता रहता। पहले उसे उसमें कुछ समझ नहीं आया। तीसरे महीने उसे यह दिखा कि उन लकीरों का पैमाना होता है और मोटी लकीर दीवार है।
घर पर, पीछे वाले हिस्से में, उसने एक दीवार बनाई। दो फुट ऊँची। फिर उसे गिरा दिया और दोबारा बनाई।
यह उसने दो बरस तक किया। कितनी बार, यह उसने कभी गिना नहीं। ईंटें वही थीं, दोबारा-दोबारा लगती रहीं, और उनके कोने घिसकर गोल हो गए।
उसने जो सीखा वह यह था कि दीवार ऊपर से नहीं, नीचे से बिगड़ती है, और नीचे की गड़बड़ी तीसरी रद्दी तक दिखती नहीं। इसलिए पहली रद्दी बिठाने में जितना वक़्त लगे, उतना कम है। यही वह पाँच मिनट का काम है जो मिस्त्री सुबह सबसे पहले करता है और जिसे देखने का मौक़ा उसे कभी नहीं मिला।
पहला पैसे वाला काम उसे इक्कीस की उम्र में मिला। एक कमरे की दीवारें। उसने डोरी तानी, साहुल लटकाया, और चिनाई शुरू की।
तीसरी रद्दी पर दीवार ढल गई। नीचे से नहीं, ऊपर से, और इतना कि आँख से भी दिख जाए।
उसने वह दीवार ख़ुद तोड़ी और दोबारा बनाई, और उसके पैसे नहीं लिए। मालिक ने पैसे देने चाहे भी। मानिक ने नहीं लिए, इसलिए कि उसे उस मालिक से अगला काम चाहिए था और वह उसे मिला भी।
मिस्त्री का काम उसे चौबीस की उम्र में नियमित मिलने लगा। ठेकेदारी उसने इकतीस में शुरू की, और शुरू में वह ख़ुद भी चिनाई करता रहा, क्योंकि दो आदमियों की मज़दूरी बचती थी।
घुटना छत्तीस की उम्र में गया। सीढ़ी से नहीं। बरसों तसला उठाने से। डॉक्टर ने यही बताया था, और मानिक को यह पहले से मालूम था।
अब वह पूरा मुड़ता नहीं, इसलिए वह ज़मीन पर बैठता नहीं है और नीचे बैठकर मसाला भी नहीं देखता। यह उसे खलता है, क्योंकि मसाला ठीक बना है या नहीं, यह हाथ से पता चलता है, आँख से नहीं।
जिसे वह दफ़्तर कहता है वह एक कमरा है, दुकान के ऊपर। उसमें एक मेज़ है, दो कुर्सियाँ, एक अलमारी, और अलमारी में नक़्शे रखे हैं, लपेटकर, खड़े। उसके पास आठ आदमी काम करते हैं और आठों को वह जानता है।
मोहल्ले के जिन लोगों ने कहा था कि ग़रीब का लड़का ग़रीब ही रहेगा, उनमें से ज़्यादातर आज भी वहीं हैं, और उनकी बात उनके अपने लड़कों पर सही उतरी है। मानिक इसे अपनी जीत नहीं मानता। वह इसे उतना ही मानता है जितना यह है।
सालों बाद, जब मानिक अपने ही बनाए दफ़्तर में बैठा था, एक लड़का काम माँगने आया। कमीज़ पुरानी थी, पर धुली हुई। उसने कागज़ मेज़ पर रखे और चुपचाप खड़ा हो गया। मानिक ने कागज़ों को छुआ तक नहीं। उसकी नज़र लड़के के हाथों पर टिकी थी। वही सख़्त, कटी हुई हथेलियाँ, जगह-जगह सूजी हुई। 'कहाँ से आते हो?' मानिक ने पूछा। लड़के ने एक बस्ती का नाम बताया, जो शहर के दूसरे छोर पर थी। 'रोज़?' 'जी।' मानिक ने कोई जल्दी नहीं की। फिर उसने कागज़ एक तरफ़ सरकाए और कहा, 'कल सुबह से आ जाओ।' लड़के ने घबराकर कहा कि उसने तो अभी कुछ पूछा ही नहीं। मानिक मुस्कुराया। 'पूछ लिया।'