हरिकिशन से कोई मदद माँगे तो वह मना नहीं करता था। यह उसकी आदत बन चुकी थी, और मोहल्ले में सब इसका फ़ायदा उठाते थे। कोई सामान उठवा लेता, कोई कागज़ जमा करवा लेता, कोई रात को अस्पताल तक साथ ले जाता। हरिकिशन को इसमें कुछ ग़लत नहीं लगता था। उसका मानना था कि अकेले कोई काम पूरा नहीं होता।

मना न कर पाना और उदार होना दो अलग चीज़ें हैं, और बाहर से वे एक जैसी दिखती हैं।

हरिकिशन को यह ख़ुद भी मालूम नहीं था।

उसे यह ज़रूर मालूम था कि फ़ोन आने पर उसके भीतर क्या होता है। पहले एक चीज़ आती है जो बिलकुल भी अच्छी नहीं होती, और उसका नाम है कि अब जाना पड़ेगा। उसके तुरंत बाद दूसरी चीज़ आती है, जो पहली को ढक देती है, और वह यह है कि मना कर दूँ तो यह आदमी क्या सोचेगा।

दूसरी चीज़ हमेशा जीतती थी और इसमें बीस साल में एक बार भी फ़र्क़ नहीं पड़ा।

📚 यह भी पढ़ें माता-पिता का आशीर्वाद
माता-पिता का आशीर्वाद

मोहल्ले में उसका नंबर हर घर में था। किसी ने उसे बाँटा नहीं था। बस जिसे ज़रूरत पड़ती, वह किसी और से ले लेता।

सबसे ज़्यादा काम अस्पताल का आता था।

ज़िला अस्पताल शहर में है और वहाँ भर्ती होने पर एक आदमी साथ रहना पड़ता है, चौबीस घंटे। नर्स दवा लगाती है, बाक़ी सब घरवाले करते हैं। पानी, बिस्तर, नीचे मेडिकल स्टोर से दवा लाना, और सुबह डॉक्टर के राउंड पर खड़े रहना।

जिन घरों में एक ही कमाने वाला हो, वहाँ यह आदमी नहीं निकलता।

तो हरिकिशन जाता था। हर बार।

📚 यह भी पढ़ें बुरा समय भी गुजरता है
बुरा समय भी गुजरता है

वह पेंट का काम करता था, ठेके पर, और उसका दिन का हिसाब दिहाड़ी से चलता था। अस्पताल की एक रात का मतलब है अगले दिन की दिहाड़ी गई।

इसका असर घर पर पड़ता था और उसकी पत्नी इस पर कभी-कभी बोलती थी। बोलने पर झगड़ा होता था और झगड़े में वह हमेशा जीत जाता था, क्योंकि उसका पक्ष कहने में अच्छा लगता है। किसी की मदद की, इसमें ग़लत क्या है।

यही वाक्य बीस बरस में सैकड़ों बार बोला गया और उसका जवाब उसकी पत्नी के पास कभी नहीं था। जवाब है, और उसे कहने के लिए एक ऐसा दिन चाहिए जिसमें दोनों तरफ़ अपने ही लोग हों।

उसने कभी गिना नहीं था। एक बार भी नहीं।

उस बरस जेठ में उसके अपने पिता को भर्ती कराना पड़ा।

📚 यह भी पढ़ें प्यार और समर्पण
प्यार और समर्पण

पित्ते का मामला था और ऑपरेशन होना था। उम्र सड़सठ। भर्ती छह दिन की थी।

पहले दो दिन हरिकिशन साथ रहा। दोनों रातें भी।

तीसरे दिन उसी अस्पताल के दूसरे वार्ड में मोहल्ले के एक और आदमी को लाया गया, हादसे में, और उसके घर से कोई आ नहीं सकता था क्योंकि उसका बेटा बाहर था और आने में दो दिन लगते।

हरिकिशन को उसी शाम फ़ोन आया। सात बजे।

वह गया, और वह दो रातें वहीं रहा।

📚 यह भी पढ़ें माता-पिता का आशीर्वाद
माता-पिता का आशीर्वाद

यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि उसने कुछ ग़लत नहीं किया। जो आदमी हादसे में आया था, उसके पास सचमुच कोई नहीं था, और हरिकिशन के पिता के पास एक बेटा था जो उसी इमारत में मौजूद था। हिसाब लगाकर देखो तो उसका जाना ठीक बैठता है।

हिसाब में जो नहीं आता, वह यह है कि सड़सठ बरस का आदमी ऑपरेशन से पहले वाली रात में क्या सोचता है, और उस रात कौन उसके पास बैठा है।

दोनों वार्ड एक ही इमारत में थे। बीच में एक गलियारा। एक सीढ़ी। पैदल दो मिनट।

वह दिन में तीन-चार बार पिता के पास जाता था, दस-दस मिनट के लिए।

पिता का ऑपरेशन पाँचवें दिन हुआ और उस दिन वह पूरे वक़्त वहीं रहा।

📚 यह भी पढ़ें बुरा समय भी गुजरता है
बुरा समय भी गुजरता है

छुट्टी छठे दिन मिली। दोपहर में।

छुट्टी के दिन दूसरे वार्ड वाले को भी छुट्टी मिलनी थी और उसकी दवाइयाँ लेनी थीं, जिनकी पर्ची ही डेढ़ पन्ने की थी।

पिता उस दिन अकेले लौटे। अकेले ही।

वे बस से आए, तीन घंटे, ऑपरेशन के छठे दिन। बस अड्डे से घर तक टेंपो लिया। घर में ताला लगा था और चाबी पड़ोस में थी।

इसमें कोई हादसा नहीं हुआ। वे ठीक-ठाक घर पहुँच गए और आराम करने लगे।

📚 यह भी पढ़ें प्यार और समर्पण
प्यार और समर्पण

पड़ोस की औरत ने बाद में बताया कि उन्होंने चाबी लेते वक़्त दीवार पकड़ रखी थी और सीढ़ी चढ़ने में उन्हें रुकना पड़ा था। यह बात उसने हरिकिशन को नहीं, उसकी पत्नी को बताई थी, और उसकी पत्नी ने भी उसे तीन महीने बाद बताया।

हरिकिशन शाम को पहुँचा और उसने माफ़ी माँगी। पिता ने कहा कि कोई बात नहीं, और यह उन्होंने नाराज़ होकर नहीं कहा।

जो हुआ वह इसके छह महीने बाद हुआ।

जाड़ों में पिता को फिर दिक़्क़त हुई और वे तीन दिन तक चुप रहे। तीसरे दिन उन्होंने अपनी बड़ी बहू से कहा।

बहू ने हरिकिशन को बताया और तब उसने पूछा कि पहले क्यों नहीं बताया।

📚 यह भी पढ़ें माता-पिता का आशीर्वाद
माता-पिता का आशीर्वाद

पिता ने कहा कि तुम्हें काम रहता है। बस इतना कहा।

यह उन्होंने ताना मारकर नहीं कहा। उन्हें सचमुच यही लगता था और वे इसे अपने बेटे की अच्छाई मानते थे।

हरिकिशन ने उस रात एक काम किया जो उसने पहले कभी नहीं किया था। उसने पिछले बरस का हिसाब लगाया।

अस्पताल के फेरे उसे याद थे, क्योंकि हर फेरे की एक दिहाड़ी जाती थी और दिहाड़ी उसे याद रहती है।

गिनती में वे फेरे भी थे जो एक ही आदमी के लिए कई बार लगे, और वे भी जिनमें वह सिर्फ़ दवा लेने गया और लौट आया। उसने दोनों को बराबर गिना, क्योंकि दिहाड़ी दोनों में एक ही जाती है।

📚 यह भी पढ़ें बुरा समय भी गुजरता है
बुरा समय भी गुजरता है

इकतालीस फेरे।

उनमें से अपने पिता के लिए चार।