दिल्ली के उस बाज़ार में सुबह सात बजे से भीड़ शुरू हो जाती थी। सलीम अपने पिता की दुकान पर उससे पहले पहुँच जाता। दुकान छोटी थी, कोने में, और उसमें दो लोग मुश्किल से खड़े हो पाते थे। बाज़ार में तौल की हेराफेरी आम बात थी। सलीम के पिता ने उसे शुरू में ही एक बात कह दी थी। तराज़ू में जो दिखे, वही सच हो। सलीम ने यह बात कभी नहीं तोड़ी, तब भी नहीं जब बगल वाली दुकान का सामान उससे सस्ता बिकने लगा और ग्राहक कम होने लगे।

उस साल बग़ल वाली दुकान ने दाम गिरा दिए और नहीं उठाए। सलीम ने हिसाब लगाकर देखा और पाया कि उन दामों पर वह सामान ख़रीद भी नहीं सकता, बेचना तो दूर। जाड़ों तक उनकी बिक्री आधी रह गई। उसी जाड़े में अब्बा को खाँसी शुरू हुई जो फिर गई नहीं।

अस्पताल ने जाँच लिखी और जाँच के पैसे दुकान से आने थे। दुकान से उस महीने कुछ नहीं आया। सलीम ने गल्ला खोलकर देखा। फिर बंद कर दिया। फिर दोबारा खोला। तीन बार देखने से उसमें कुछ बढ़ नहीं जाता।

उन्हीं दिनों एक सप्लायर आया जिससे उनका पहले कभी लेन-देन नहीं हुआ था। उसके पास दाल थी, अच्छी दाल, और दाम बाज़ार से आधे। सलीम ने बोरी देखी और उसे सब पता चल गया। बोरी की सिलाई नई थी और उस पर छपी तारीख़ का रंग बाक़ी छपाई से अलग था।

सप्लायर ने यह छिपाया भी नहीं। उसने कहा कि माल ख़राब नहीं है, बस पुराना है, और तारीख़ काग़ज़ की बात है। उसने यह भी कहा कि आधा बाज़ार यही करता है और सलीम को इसका अंदाज़ा है। दोनों बातें सही थीं।

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सलीम ने रात भर हिसाब लगाया। बीस बोरी पर जो बचता, उससे जाँच भी हो जाती और दो महीने की दवा भी। कोई पकड़ा नहीं जाता। दाल से किसी की जान भी नहीं जाती, ज़्यादा से ज़्यादा स्वाद ख़राब होता। सुबह उसने सप्लायर से कह दिया कि वह यह माल नहीं लेगा। वजह नहीं बताई।

सप्लायर ने बुरा नहीं माना। उसने कहा कि सोच लेना, वह हफ़्ते भर शहर में है। हफ़्ता निकल गया। सलीम ने उसे फ़ोन नहीं किया। दसवें दिन उसने बग़ल वाली दुकान पर वही बोरियाँ उतरते देखीं, वही नई सिलाई, वही नई तारीख़।

उसने अब्बा को इस बारे में नहीं बताया, इसलिए नहीं कि वे नाराज़ होते, बल्कि इसलिए कि वे कहते कि ले लो। बीमार आदमी इलाज के लिए वह भी मान जाता है जो उसने ज़िंदगी भर नहीं माना। सलीम यह नहीं चाहता था कि आख़िर में अब्बा से वही कहलवाया जाए।

जाँच तीन महीने बाद हुई, तब हुई जब मामा से पैसा आया। रिपोर्ट में जो निकला, उसका इलाज तीन महीने पहले शुरू होता तो शायद कुछ फ़र्क़ पड़ता। शायद नहीं भी पड़ता। डॉक्टर ने भी यही कहा और डॉक्टर के पास इससे बेहतर जवाब नहीं था।

अब्बा अगले जाड़े में गुज़र गए। दुकान उससे पहले ही बंद हो चुकी थी। सलीम ने शटर गिराकर ताला लगाया और चाबी अपने पास रख ली, हालाँकि दुकान किराए की थी और चाबी की उसे कोई ज़रूरत नहीं थी।

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दुकान बंद करने वाले दिन कुछ ख़ास नहीं हुआ। सामान पहले ही निकल चुका था। गल्ला ख़ाली था। बचा हुआ बोरा एक ही था और वह भी आधा। सलीम ने झाड़ू लगाई, हालाँकि उसकी ज़रूरत नहीं थी।

इसके बाद डेढ़ साल उसने अलग-अलग जगह काम किया। कहीं दो महीने, कहीं चार। हर जगह वह ठीक काम करता था और हर जगह से किसी न किसी वजह से निकल आता था। बाज़ार बड़ा है, पर उसमें ख़बर छोटी गली से भी चलती है।

जिस दिन उसे बुलावा आया, उस दिन वह अपने कमरे में था। बुलाने वाला वही थोक व्यापारी था जिसके यहाँ से अब्बा बीस साल माल लेते रहे थे। उसने सलीम को बिठाया और सीधे मतलब की बात की।

उसका गोदाम बड़ा हो चुका था और उसमें रोज़ माल उतरता था। उसे एक आदमी चाहिए था जो बोरी खोलकर देखे और जो देखे वही लिखे। उसने कहा कि यह काम करने वाले उसके पास तीन आ चुके हैं और तीनों ने सप्लायर से हिस्सा ले लिया। फिर उसने वह बात कही जो सलीम के लिए असली थी। उसने कहा कि तुम्हारे अब्बा के यहाँ से बीस साल में एक बोरी वापस नहीं आई।

तनख़्वाह ऐसी नहीं थी कि उससे कोई दुकान खड़ी हो जाए। सलीम ने फिर भी हाँ कह दी।

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गोदाम में उसका काम सुबह छह बजे शुरू होता है। माल का ट्रक लगता है, बोरियाँ उतरती हैं, और वह हुक से एक-एक बोरी खोलकर देखता है। जो ठीक है वह अंदर जाती है और जो नहीं है वह वापस ट्रक पर चढ़ जाती है, चाहे भेजने वाला कोई भी हो। इस पर झगड़े होते हैं और झगड़े में वह चुप रहता है, क्योंकि उसे बहस नहीं करनी होती। लिखना उसे ही होता है।

अब्बा की दुकान वाला स्टूल वह अपने साथ ले आया था। लकड़ी का, नीचा, जिसकी एक पाटी बरसों पहले बदली गई थी। गोदाम में बैठने की कोई और जगह नहीं है और उसे किसी और जगह की ज़रूरत भी नहीं पड़ी। सुबह छह से दोपहर तक वह उसी पर बैठता है, और शाम को उसे दीवार के साथ सीधा खड़ा करके चला आता है।