चनेसर की माँ एक बात बार-बार कहती थीं। सच बोलने वाला कभी नहीं हारता। चनेसर छोटा था तो मान लेता था। बड़ा होने पर उसने देखा कि गाँव में झूठ बोलने वाले कई लोग बहुत आराम से जी रहे हैं, और कुछ सच बोलने वाले परेशान हैं। उसने माँ से यह कभी नहीं कहा। पर सवाल उसके मन में रह गया।

उनकी चक्की गाँव के उस सिरे पर थी जहाँ से समिति का गोदाम दिखता है। चक्की चनेसर के बाप की थी और ज़मीन जगपती की, जो उसका चाचा लगता था। किराया कभी माँगा नहीं गया और कभी दिया भी नहीं गया। गाँव में ऐसे कई हिसाब चलते हैं जो लिखे नहीं जाते।

अगहन में बुआई के वक़्त गोदाम पर भीड़ रहती है। उस साल यूरिया की गिनती में दो बोरियाँ कम निकलीं। गोदाम वाले ने पहले चुप्पी साधी, फिर तीसरे दिन नाम ले लिया। नाम बुधिया का था, जो वहाँ बोरी ढोने का काम करती थी और जिसके पास इसके अलावा कोई काम नहीं था।

इल्ज़ाम टिक गया, क्योंकि टिकने के लिए उसे किसी सबूत की ज़रूरत नहीं थी। बुधिया अकेली थी, मज़दूर थी, और गोदाम के अंदर तक जाती थी। गाँव को इतना काफ़ी लगा। दो दिन में यह बात इस तरह कही जाने लगी जैसे किसी ने उसे बोरी उठाते देख लिया हो।

चनेसर ने देखा था। पर बुधिया को नहीं। उस रात वह छत पर सो रहा था, क्योंकि नीचे कमरे में चक्की की गर्मी भरी रहती है। दो बजे के आसपास उसकी नींद ट्रैक्टर की आवाज़ से खुली। गोदाम के पीछे वाले रास्ते पर ट्रैक्टर खड़ा था और उस पर बोरियाँ चढ़ाई जा रही थीं।

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अँधेरा था, पर उतना नहीं। ट्रैक्टर जगपती का था। चढ़ाने वाला भी वही था और गोदाम वाला उसके साथ खड़ा था। चनेसर ने करवट बदल ली और सुबह तक यह सोचता रहा कि जो देखा वह ठीक से देखा या नहीं। उजाला होने पर उसने पाया कि वह ठीक से ही देखा था।

उसने पहले माँ को बताया। माँ बहुत देर तक चुप रहीं, फिर इतना बोलीं कि जगपती की ज़मीन पर उनकी चक्की खड़ी है। यह बात उन्होंने रोकने के लिए नहीं कही थी। वे बस वह हिसाब सामने रख रही थीं जो अब तक लिखा नहीं गया था।

बाप ने साफ़ मना कर दिया। उसने कहा कि बुधिया का क्या है, दो महीने में बात ठंडी हो जाएगी, और लोग भूल जाएँगे। चनेसर ने पूछा कि अगर न भूले तो। बाप ने कहा कि तब भी हमारा क्या जाता है।

समिति की बैठक इतवार को थी। चनेसर उसमें सबसे पीछे बैठा था और उसे बोलना नहीं था। जब गोदाम वाले ने बुधिया का नाम तीसरी बार लिया, तब वह खड़ा हो गया। उसने तारीख़ बताई, समय बताया, ट्रैक्टर का नंबर बताया, और यह भी बताया कि वह छत पर क्यों सोता है।

बैठक में जो हुआ, वह वैसा नहीं था जैसा ऐसी बातों में होता है। कोई चिल्लाया नहीं। जगपती ने सिर्फ़ इतना कहा कि लड़का सपना देख रहा होगा, और आधे लोगों ने सिर हिला दिया। पर बुधिया का नाम उस दिन के बाद फिर नहीं लिया गया, और गोदाम वाले का तबादला दो हफ़्ते में हो गया।

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बैठक के बाद बुधिया ने उससे बात नहीं की। वह भीड़ के साथ निकल गई। चनेसर को उस वक़्त यह बुरा लगा था। बहुत बाद में उसकी समझ में आया कि जिस पर इल्ज़ाम लगा हो, वह बचाने वाले के पास जाकर खड़ी नहीं होती, क्योंकि इससे बात और बनती है।

जगपती को कुछ नहीं हुआ। ऐसे लोगों को नहीं होता। जो हुआ वह यह कि उस महीने के आख़िर में जगपती ने पहली बार लिखित में किराया माँगा, और वह इतना था जितना कोई चक्की नहीं दे सकती। तीन महीने बाद चक्की उस ज़मीन से उठ गई।

वे बग़ल के क़स्बे में चले गए और वहाँ एक किराए की दुकान में चक्की फिर से जमाई। पत्थर वही थे, मोटर वही थी, जगह नई थी। शुरू के महीनों में काम इतना कम था कि दोपहर को मोटर बंद रखनी पड़ती थी। बाप ने चनेसर से इस बारे में कभी बात नहीं की, और यही सबसे भारी पड़ा।

बुधिया को भी गोदाम में काम वापस नहीं मिला। बरी हो जाना और साफ़ हो जाना अलग-अलग चीज़ें हैं। जिस पर एक बार नाम आ गया, उसे लोग रखते हुए हिचकते हैं। वह दूसरे गाँवों में मज़दूरी करने लगी और उसके लिए रास्ता लंबा हो गया।

एक शाम चनेसर ने माँ से पूछा कि क्या वह बात अब भी सही है। माँ ने पूछा, कौन-सी। उसने कहा, यही कि सच बोलने वाला कभी नहीं हारता। माँ ने चक्की के पत्थर पर से आटा झाड़ा और कहा कि उन्होंने कभी यह नहीं कहा था कि उसे नुक़सान नहीं होता।

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इसके बाद माँ ने वह बात दोबारा नहीं कही, न उस दिन, न बाद में। पर उन्होंने उसे छोड़ा भी नहीं। चनेसर को यह बहुत बाद में पता चला कि जो चीज़ बार-बार कही जाती है, वह मानी नहीं जा रही होती। जो मान ली जाती है, उसे कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

नई दुकान पर पहले महीने में जो थोड़े लोग आए, उनमें एक बुधिया थी। वह पाँच किलो मक्का लेकर आई थी और उसे पिसवाने के लिए तीन गाँव पार करके आई थी, जबकि उसके अपने गाँव में दो चक्कियाँ थीं। चनेसर ने पैसे लेने से मना कर दिया। बुधिया रुकी नहीं। उसने पैसे गल्ले के ऊपर वाली सिल पर रख दिए और आटा उठाकर चल दी।