राजा विक्रम के राज्य की उत्तरी सीमा एक घने जंगल पर ख़त्म होती थी। उस जंगल के आगे राज्य का कोई कानून नहीं चलता था। वहाँ कालू डाकू रहता था, अपने आदमियों के साथ। सालों से यही चल रहा था। जो व्यापारी उस रास्ते से जाते, वे या तो लुट जाते, या जाना ही बंद कर देते। दरबार में इस पर बात होती, और फिर बात वहीं ख़त्म हो जाती।
कालू और उसके साथियों की वजह से गाँववाले बहुत परेशान थे। उनके डर से लोग अपने घरों से बाहर नहीं निकल पाते थे। गाँवों में बार-बार लूटपाट और हिंसा के कारण लोग अशांत हो गए थे। राजा विक्रम को जब इस बारे में जानकारी मिली, तो उसने तय किया कि इस समस्या का हल निकालना चाहिए। उसने अपनी सेना को तैयार किया और गाँव के बुजुर्गों से सलाह ली। राजा विक्रम ने समझा कि केवल लड़ाई से यह समस्या हल नहीं होगी, इसलिए उसने एक और योजना बनाई।
राजा विक्रम ने सोचा कि अगर वह खुद जंगल में जाए और कालू से बातचीत करके उसे समझाने की कोशिश करे, तो शायद वह अपनी गलतियाँ सुधार ले। राजा ने अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि वे उसकी मदद के लिए तैयार रहें, लेकिन वह खुद ही कालू से बात करने जाएगा। अगले दिन सुबह, राजा अपने कुछ विश्वसनीय सिपाहियों के साथ जंगल की ओर रवाना हो गया। राजा विक्रम को अपनी योजना पर पूरा विश्वास था कि बातचीत से ही समाधान निकल सकता है।
बदलाव की शुरुआत
तीसरे दिन कालू ख़ुद सामने आया। अकेला नहीं आया था, पर उसके आदमी पेड़ों के पीछे ही रहे। विक्रम ने तलवार म्यान में ही रहने दी। उसने कहा, ‘तुम्हारे पास सत्तर आदमी हैं। मेरे पास चार हज़ार। यह गिनती तुम्हें मुझसे बेहतर पता है, वरना तुम इस जंगल के बाहर रहते।’ कालू हँसा। विक्रम ने बात पूरी की, ‘उत्तर की सड़क बारह साल से बंद है। मुझे वह खुलवानी है। तुम्हें क्या चाहिए?’
कालू ने जवाब देने में वक़्त लिया। ‘मुझे कुछ नहीं चाहिए,’ उसने कहा। ‘सड़क खुल गई तो मेरे आदमी क्या खाएँगे? यही सड़क उनकी खेती है।’ विक्रम ने कहा कि उन्हें ज़मीन दी जा सकती है। कालू ने ना में सिर हिलाया। ‘ज़मीन जोतना सीखने में एक पीढ़ी लगती है, राजा। लूटना एक दिन में आ जाता है।’ इसके बाद वह पेड़ों के पीछे लौट गया। उस दिन कोई फ़ैसला नहीं हुआ।
बरसात उतरने के बाद विक्रम ने जंगल घेरा। लड़ाई तीन दिन चली। कालू के इकतालीस आदमी मारे गए, और विक्रम के उनसठ। कालू ज़िंदा पकड़ा गया, टाँग में भाला लगने के बाद। जब उसे बाँधकर दरबार लाया गया, तो वह चल नहीं पा रहा था। उसने रास्ते भर किसी से पानी नहीं माँगा।
दरबार में कालू ने माफ़ी नहीं माँगी। अपने किए से इनकार भी नहीं किया। जब उससे पूछा गया कि उसने कितने लोगों को लूटा है, तो उसने कहा कि गिनती उसने कभी रखी ही नहीं। मंत्री ने फाँसी की सलाह दी और दरबार में ज़्यादातर सिर हिले। विक्रम ने कुछ और तय किया। कालू उसी उत्तरी सड़क पर काम करेगा, जब तक वह चलने लायक़ न हो जाए। पत्थर तोड़ना, गड्ढे भरना, बरसात में बहे हिस्से दोबारा बाँधना। बेड़ी पैर में रहेगी। मज़दूरी नहीं मिलेगी। और जो व्यापारी उस रास्ते से गुज़रेंगे, उन्हें यह नहीं बताया जाएगा कि सड़क कौन बना रहा है। कालू ने पूरी शर्त सुनी और सिर हिला दिया, जैसे उसे इससे कोई फ़र्क़ न पड़ता हो।
पहले साल वह भागने की कोशिश में दो बार पकड़ा गया। दूसरी बार उसे वापस लाने में सिपाहियों को नौ दिन लगे। तीसरी बार उसने कोशिश नहीं की। सिपाही बदलते रहे, कालू वहीं रहा। सड़क धीरे-धीरे बदली। पहले बैलगाड़ियाँ निकलने लगीं, फिर व्यापारी, फिर वे लोग भी जो बारह साल से घूमकर जाते थे। कोई उससे बात नहीं करता था। दोपहर में वह बरगद की छाँव में बैठकर रोटी खाता और फिर उठ जाता। टाँग बरसात में दर्द करती थी, हर साल पिछले साल से थोड़ा ज़्यादा। पत्थर तोड़ते-तोड़ते उसकी हथेलियाँ ऐसी हो गईं कि उन पर कुछ महसूस होना बंद हो गया।
जो देर से समझ आया
सातवें साल सावन में सड़क का एक हिस्सा पहाड़ी की तरफ़ से बैठ गया। रात में। नीचे तीन गाड़ियाँ फँस गईं और मिट्टी अब भी सरक रही थी। दोनों सिपाही मदद बुलाने गाँव की ओर भागे। कालू अकेला रह गया, बेड़ी समेत, और जंगल वहाँ से तीस क़दम दूर था। वह मलबे में उतर गया। सुबह तक खोदता रहा। तीनों गाड़ीवान बच गए, एक की कलाई टूटी हुई थी। उनमें से एक ने बाद में पूछा कि यह आदमी कौन है। सिपाही ने कहा, ‘सड़क वाला।’ गाड़ीवान ने इससे आगे नहीं पूछा।
बारह साल पूरे होने पर विक्रम ने बेड़ी खुलवा दी। कालू को कहीं भी जाने की इजाज़त थी। वह कहीं नहीं गया। सड़क के किनारे उसने एक झोपड़ी डाल ली और वही काम करता रहा, अब बिना बेड़ी के और पहले से धीमी रफ़्तार में। दिवाली के दिनों में उस रास्ते पर सबसे ज़्यादा भीड़ रहती है: गाड़ियाँ, बैल, दीयों के टोकरे, मिठाई की पेटियाँ। शाम को दोनों तरफ़ के गाँवों की रोशनी सड़क पर पड़ती है। उस भीड़ में से कोई नहीं जानता कि कालू डाकू कौन था। वह किसी को बताता भी नहीं।