रणधीर के पास दौड़ने के जूते नहीं थे। यह बात उसने कोच से छिपाई नहीं, बस पहले दिन नंगे पाँव ट्रैक पर आ गया और दौड़ लिया। यशपाल ने उस दिन उसे रोका नहीं। शाम को जब बाक़ी लड़के जा चुके थे, उसने रणधीर को रोका और पूछा कि रोज़ कितनी दूर से आता है। ‘सात किलोमीटर,’ रणधीर ने कहा। ‘पैदल?’ ‘दौड़कर।’
चौदह किलोमीटर रोज़। जाड़े में भी, बरसात में भी। सड़क सीधी थी, पक्की थी, और सुबह पाँच बजे उस पर एक भी आदमी नहीं होता था। तीन साल में उस सड़क ने रणधीर को वह चीज़ दे दी जो मैदान में किसी और लड़के के पास नहीं थी। उसके फेफड़े कभी नहीं भरते थे। यशपाल कहता था कि लड़का इंजन लेकर आया है।
ज़िले में वह जो भी दौड़ता, जीतता। और वह हमेशा एक ही तरह जीतता था। पिस्तौल की आवाज़ के साथ आगे निकल जाता और पीछे नहीं देखता। पहले दो सौ मीटर में ही दस मीटर का फ़ासला बन जाता, और फिर वह फ़ासला बढ़ता चला जाता। लोग उसे ‘आगे वाला लड़का’ कहने लगे थे। कोई यह नहीं सोचता था कि सड़क पर तीन साल दौड़ने वाले लड़के के आगे आज तक कोई था ही नहीं।
राज्य की पहली प्रतियोगिता में पाँच हज़ार मीटर था। रणधीर दस चक्कर तक आगे रहा। ग्यारहवें में दो लड़के उसके कंधे पर आ गए और आख़िरी तीन सौ मीटर में तीन लोग उसे पार कर गए। वह चौथे नंबर पर आया। अगले साल यही हुआ। उससे अगले साल भी।
तीसरी बार के बाद यशपाल ने उसे मैदान के किनारे बिठाया और सीधी बात कही। ‘तू आगे रहकर हारता है, क्योंकि तूने आज तक किसी को अपने आगे देखा ही नहीं।’ फिर उसने गिनाया। रणधीर को नहीं आता था कि किसी के कंधे के पीछे कैसे चला जाता है। उसे नहीं आता था कि मोड़ पर भीतर की लेन कैसे बचाई जाती है। और जब कोई उसे पार करता था, तो उसके पास कोई जवाब नहीं होता था, क्योंकि उसकी पूरी दौड़ एक ही रफ़्तार की थी।
इलाज एक ही था और यशपाल ने उसे छिपाया नहीं। शुरुआत धीमी करनी होगी। चौथे नंबर पर रहना होगा। पीछे रहना सीखना होगा। दस चक्कर किसी और की पीठ देखनी होगी और आख़िरी तीन सौ मीटर के लिए कुछ बचाकर रखना होगा। ‘इसमें एक पूरा सीज़न जाएगा,’ उसने कहा, ‘शायद दो। और तू वे दौड़ें हारेगा जो तू आराम से जीत सकता था।’
पहला ही ज़िला उसने चौथे नंबर पर ख़त्म किया, उसी मैदान पर जहाँ वह तीन साल से पहला आता था। भादों के बाद वाली मीट में वह पाँचवाँ आया। फिर सातवाँ। गाँव में बात फैलने में एक हफ़्ता लगा। चौपाल पर एक आदमी ने कहा कि लड़के का समय निकल गया। किसी ने उसकी माँ से पूछा कि वह अब भी सुबह क्यों जाता है।
बीच में वह एक बार फिसला भी। ज़िले की एक दौड़ में पिस्तौल के साथ ही वह आगे निकल गया और पूरे रास्ते आगे रहा और जीत गया, और उस दिन उसे बहुत अच्छा लगा। यशपाल ने चार दिन उससे बात नहीं की। मैदान पर आता रहा, बस देखता रहा। पाँचवें दिन उसने बस इतना कहा कि जीतना सबसे आसान चीज़ है, इसलिए सबसे पहले वही छोड़नी पड़ती है।
उन्हीं दो सालों में प्रदीप रेलवे चला गया। प्रदीप उसी मैदान का था, रणधीर से हमेशा पीछे रहता था, और उसने अपनी दौड़ में कभी कुछ नहीं बदला। खेल कोटे में उसका पाँच हज़ार का समय पंद्रह मिनट चार सेकंड था। रणधीर दो साल पहले चौदह मिनट इक्यावन सेकंड दौड़ चुका था। पर उम्र की सीमा इक्कीस थी। प्रदीप इक्कीस का था। रणधीर उस दरवाज़े से निकल चुका था और वह दरवाज़ा दोबारा नहीं खुलता।
दूसरे साल चीज़ें बदलने लगीं, और बदलाव इतने छोटे थे कि उन्हें कोई और नहीं देख सकता था। उसने किसी के कंधे के पीछे टिकना सीखा। उसने आगे वाले के पैर देखना छोड़ दिया और उसकी पीठ देखना शुरू किया, क्योंकि थकान पीठ पर पहले दिखती है। और उसने तीन सौ मीटर को अलग से दौड़ना सीखा, हफ़्ते में दो दिन, जब टाँगें पहले ही भारी हों।
बाईस की उम्र में, ओपन वर्ग में, राज्य का पाँच हज़ार मीटर उसने ग्यारह चक्कर चौथे नंबर पर रहकर दौड़ा। घंटी बजने पर वह भीतर की लेन में था और उसके आगे तीन पीठें थीं। उसने आख़िरी तीन सौ मीटर में दो को पार किया और तीसरे को आख़िरी मोड़ पर। चौदह मिनट उनतालीस सेकंड। उस दिन के बाद उसने इससे तेज़ कभी नहीं दौड़ा।
फ़ाइनल के बाद पत्रकारों ने उसे घेर लिया। किसी ने पूछा कि सबसे मुश्किल दौड़ कौन-सी रही। रणधीर ने पदक की तरफ़ नहीं देखा। उसकी नज़र स्टेडियम के गेट से बाहर जाती उस सड़क पर थी। ‘रोज़ सुबह वाली,’ उसने कहा। पत्रकार हँसे। उन्होंने इसे मज़ाक समझा। भीड़ छँटने के बाद वह उसी गेट से बाहर निकला, जूते हाथ में लिए, और नंगे पाँव सड़क पर उतर गया।
उस जीत से आगे कुछ बड़ा नहीं निकला। राष्ट्रीय शिविर में उसका नाम नहीं आया। चौबीस की उम्र में उसे रेलवे में ओपन से नौकरी मिल गई, चार सौ किलोमीटर दूर, और नौकरी के दूसरे साल उसने दौड़ना छोड़ दिया, क्योंकि जिस नौकरी में आठ घंटे खड़े रहना होता है, उसमें सुबह चार बजे उठना दो महीने चलता है, दो साल नहीं।
यशपाल के मैदान पर उसके बाद से एक नियम है। पहले साल का कोई लड़का किसी दौड़ में आगे नहीं रह सकता, न अभ्यास में, न मीट में। लड़के इसे सज़ा समझते हैं और हर सीज़न की पहली सुबह यशपाल इसे एक ही वाक्य में समझा देता है, कि जो लड़का कभी किसी के पीछे नहीं दौड़ा वह आख़िरी तीन सौ मीटर में अकेला पड़ जाता है। बाहर से आने वाली टीमें उस मैदान के नए लड़कों को धीमा समझती हैं, क्योंकि पिस्तौल की आवाज़ पर उनमें से कोई भागता नहीं।