फ़ैसला चौपाल पर हुआ और उसमें गाँव के इकतालीस घरों में से सैंतीस के आदमी मौजूद थे। बात यह थी कि बलेसर के लड़के ने किसी दूसरी जात की लड़की से शादी कर ली थी और दोनों शहर में रह रहे थे।

यह किए हुए तीन महीने हो चुके थे और इसमें गाँव का कोई नुक़सान नहीं हुआ था। फिर भी बात उठी, और उठाने वाले वे लोग थे जिनका इससे सीधा कोई लेना-देना नहीं था। फ़ैसला यह हुआ कि बलेसर के घर से कोई लेन-देन नहीं होगा। न कोई उसके यहाँ बैठेगा, न उससे कुछ लेगा, न उसे कुछ देगा। शादी-ब्याह, मरनी-जीनी, कुछ नहीं।

यह जो होता है उसे हुक़्क़ा-पानी बंद करना कहते हैं और उस इलाक़े में यह अब भी होता था।

इसका असर एक बार में नहीं दिखता। गाँव में जो चीज़ें बिना पैसे के चलती हैं, वे पहले रुकती हैं। कोई खेत जोतने में हाथ नहीं बँटाता। कोई छत डलवाने के दिन नहीं आता। शादी में कोई नहीं जाता। महीने-दो महीने में यह उस घर को उस गाँव से बाहर कर देता है, बिना किसी को घर से निकाले।

साथ में यह भी तय हुआ कि जो इसे तोड़ेगा, उस पर भी यही लागू होगा। बलेसर साठ के ऊपर का था और उसके घर में वह, उसकी पत्नी, और उसकी विधवा बहन थी। पहले हफ़्ते में उसका दूध बिकना बंद हुआ।

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दूसरे हफ़्ते उसका बैल बीमार पड़ा और गाँव का जो आदमी जानवरों की दवा करता था उसने आने से मना कर दिया। तीसरे हफ़्ते उसकी बहन को बुख़ार हुआ और उसे साइकिल पर बिठाकर ले जाने के लिए कोई साइकिल देने को तैयार नहीं हुआ।

महादेई का घर उसी गली में तीसरा था। दरवाज़ा आमने-सामने पड़ता था। वह अकेली रहती थी। उसके आदमी को गुज़रे ग्यारह बरस हो चुके थे और उसका बेटा सूरत में था और साल में एक बार आता था। उसके पास एक भैंस थी, थोड़ी ज़मीन थी जो बटाई पर चलती थी, और एक साइकिल थी जो उसके आदमी की थी।

चौथे हफ़्ते उसने बलेसर की बहन को अपनी साइकिल दे दी। उसने यह छिपाकर नहीं किया। उसने साइकिल दिन में निकाली, गली से होकर ले गई, और बलेसर के दरवाज़े पर खड़ी कर दी। उसे गली में तीन लोगों ने देखा। शाम तक चालीस को मालूम था।

उसी शाम उसके घर दो आदमी आए और उन्होंने उसे समझाया।

उन्होंने बुरा नहीं कहा। उन्होंने कहा कि उसकी उम्र हो रही है, कि वह अकेली है, कि आगे-पीछे गाँव ही काम आता है, और कि साइकिल वापस ले आए तो बात यहीं ख़त्म हो जाएगी। महादेई ने कहा कि साइकिल उसकी है।

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उन दोनों आदमियों ने उससे यह नहीं पूछा कि वह ऐसा क्यों कर रही है, और यह अच्छा हुआ, क्योंकि इसका जवाब उसके पास भी नहीं था। उसे बलेसर से कोई ख़ास लगाव नहीं था। उसके लड़के की शादी के बारे में उसकी अपनी राय क्या थी, यह उसने कभी किसी को नहीं बताया और शायद बनाई भी नहीं थी।

यही उसका पूरा जवाब था और उसने इसके आगे कोई दलील नहीं दी। उसने न शादी की बात की, न जात की, न फ़ैसले की। अगले दिन उसका भी दूध बिकना बंद हो गया। यह उसके लिए भारी था। भैंस का दूध उसकी महीने की कमाई का बड़ा हिस्सा था और उसे बेचने की एक ही जगह थी, गाँव की दूध वाली मंडली।

उसने दूध पास वाले गाँव में ले जाना शुरू किया, तीन किलोमीटर, पैदल, सुबह चार बजे। वहाँ भाव दो रुपये कम मिलता था।

यह उसने सात महीने किया।

जाड़े में यह मुश्किल था। चार बजे अँधेरा रहता है और रास्ता खेतों के बीच से जाता है। दो बार वह गिरी। एक बार बाल्टी उलट गई और उस दिन का दूध गया, और उस दिन वह वापस आकर घर के भीतर बैठ गई और शाम तक बाहर नहीं निकली।

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इन सात महीनों में उसकी ज़मीन की बटाई करने वाले ने भी हाथ खींच लिया और उसे नया आदमी ढूँढ़ना पड़ा, जो उसे दूसरे गाँव से मिला और जिसने ज़्यादा हिस्सा माँगा। बलेसर के घर का हुक़्क़ा-पानी आठवें महीने में खुला।

इसकी वजह कोई पश्चाताप नहीं था। वजह यह थी कि उसके लड़के ने शहर से पैसा भेजकर गाँव के मंदिर की मरम्मत करवा दी, और उसके बाद यह बात आगे खींचना किसी के लिए आसान नहीं रहा। महादेई का हुक़्क़ा-पानी भी उसी दिन खुल गया, अपने आप, बिना किसी ऐलान के।

उसका दूध फिर मंडली में जाने लगा और उसे दो रुपये ज़्यादा मिलने लगे।

बलेसर ने उससे इस बारे में कभी बात नहीं की और उसने भी नहीं की। दोनों की गली एक थी और आमना-सामना रोज़ होता था, और रोज़ वही दुआ-सलाम होती थी जो पहले होती थी।

वह साइकिल बलेसर के घर पर ही रह गई। उसकी बहन उसे चलाती नहीं थी, पर वह उनके बरामदे में खड़ी रहती थी। महादेई ने उसे वापस नहीं माँगा और चार बरस बाद जब वह ख़ुद गुज़री, तब भी वह वहीं खड़ी थी।